राजगीर कॉलेज में प्रेमचंद जयंती पर विशेष व्याख्यान, छात्रों ने विचार प्रस्तुति प्रतियोगिता में दिखाया दम

राजगीर के राजकीय डिग्री महाविद्यालय में युगप्रवर्तक मुंशी प्रेमचंद की जयंती पर एक विशेष व्याख्यान और विचार प्रस्तुति प्रतियोगिता का आयोजन किया गया. इस कार्यक्रम में छात्रों ने प्रेमचंद के साहित्यिक योगदान और समाज पर उनके प्रभाव पर अपने विचार व्यक्त किए.

राजगीर के राजकीय डिग्री महाविद्यालय में शुक्रवार को हिंदी साहित्य के युगप्रवर्तक मुंशी प्रेमचंद की जयंती पर विशेष व्याख्यान एवं विचार प्रस्तुति प्रतियोगिता का आयोजन किया गया. कार्यक्रम का शुभारंभ नव नालंदा महाविहार समविश्वविद्यालय, नालंदा के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. हरे कृष्ण तिवारी तथा महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. आनंद प्रकाश गुप्ता ने दीप प्रज्वलित कर किया. इसके बाद अतिथियों ने प्रेमचंद के तैलचित्र पर माल्यार्पण एवं पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी.

मुख्य अतिथि प्रो. हरे कृष्ण तिवारी के विचार

मुख्य अतिथि प्रो. हरे कृष्ण तिवारी ने कहा कि प्रेमचंद के आगमन से पूर्व कथा-साहित्य मुख्यतः मनोरंजन का माध्यम था, लेकिन उन्होंने साहित्य को समाज की वास्तविक समस्याओं से जोड़कर नई दिशा प्रदान की. पहली बार किसानों, मजदूरों, महिलाओं और वंचित वर्ग की पीड़ा को साहित्य में सशक्त अभिव्यक्ति मिली.

उन्होंने कहा कि प्रेमचंद की भाषा सरल, सहज और जनभाषा थी, इसलिए उनकी रचनाएं आज भी आम पाठकों के बीच उतनी ही लोकप्रिय हैं. उन्होंने बताया कि "गोदान" में कृषक जीवन की त्रासदी का मार्मिक चित्रण है, जबकि "कफन", "पूस की रात", "बड़े घर की बेटी" और "ठाकुर का कुआँ" जैसी कहानियां सामाजिक विसंगतियों पर तीखा प्रहार करती हैं.

"दो बैलों की कथा" में प्रतीकात्मकता के माध्यम से मानवीय मूल्यों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है. उन्होंने कहा कि साहित्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज में जागृति और परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करना भी है.

प्राचार्य डॉ. आनंद प्रकाश गुप्ता का संबोधन

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्राचार्य डॉ. आनंद प्रकाश गुप्ता ने कहा कि प्रेमचंद का पहला कहानी-संग्रह "सोज़े वतन" को अंग्रेजी सरकार ने उसकी राष्ट्रवादी चेतना के कारण जब्त कर लिया था.

"पंच परमेश्वर" जैसी रचना न्याय, नैतिकता और निष्पक्ष निर्णय का सशक्त संदेश देती है. उन्होंने कहा कि प्रेमचंद ने उस दौर में पंचायत व्यवस्था की कल्पना को साहित्य में स्थान दिया, जब देश में पंचायती राज व्यवस्था अस्तित्व में भी नहीं थी.

उनकी रचनाएं आज भी सामाजिक कुरीतियों और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा देती हैं. इस अवसर पर डॉ. सोनू शंकर, डॉ. धीरेंद्र उपाध्याय, डॉ. सुभाष कुमार सहित अन्य वक्ताओं ने भी प्रेमचंद के साहित्यिक योगदान पर विचार व्यक्त किए.

विचार प्रस्तुति प्रतियोगिता और पुरस्कार वितरण

आयोजित विचार प्रस्तुति प्रतियोगिता में निवेदिता राज ने प्रथम, संजना कुमारी एवं राजकुमार ने संयुक्त रूप से द्वितीय तथा प्रेम शंकर ने तृतीय स्थान प्राप्त किया. धन्यवाद ज्ञापन डॉ. शारदा कुमारी ने किया. इस मौके पर डॉ. अमर कुमार, डॉ. रूपम शर्मा, डॉ. सत्येन्द्र प्रसाद, डॉ. गौतम कुमार, राहुल प्रकाश, नितिशा गुड़िया समेत महाविद्यालय के शिक्षक, कर्मचारी एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे.


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By Ramvilas prasad

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