Bihar News: मछली उत्पादन में बिहार ने रचा नया इतिहास, 10 साल में दोगुनी हुई पैदावार, कैसे चौथे नंबर पर जमाया कब्जा?

Bihar News: कभी मछली उत्पादन में देश में नौवें पायदान पर खड़ा बिहार आज चौथे नंबर पर पहुंच चुका है. यह सिर्फ आंकड़ों की छलांग नहीं, बल्कि तकनीक, नीति और किसानों की मेहनत से बदली तस्वीर की कहानी है.

By Pratyush Prashant | January 11, 2026 11:30 AM

Bihar News: बिहार ने मछली उत्पादन के क्षेत्र में ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज करते हुए देश में चौथा स्थान हासिल कर लिया है. वित्तीय वर्ष 2024-25 में राज्य में कुल 9.59 लाख टन मछलियों का उत्पादन हुआ है.

डेयरी, मत्स्य एवं पशु संसाधन विभाग की सतत पहल और आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल से यह संभव हो सका है. पिछले दस वर्षों में बिहार ने मछली उत्पादन में लगभग 100 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की है, जो राज्य की कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है.

नौवें से चौथे पायदान तक का सफर

वर्ष 2013-14 में बिहार मछली उत्पादन के मामले में देश में नौवें स्थान पर था. इसके बाद सरकार की योजनाओं, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और तकनीकी सहयोग से मत्स्यपालन को नया आयाम मिला. वर्ष 2023-24 में बिहार चौथे स्थान पर पहुंचा और 2024-25 में 9.59 लाख टन उत्पादन के साथ इस स्थिति को और मजबूत कर लिया. यह बदलाव दिखाता है कि राज्य ने परंपरागत तरीकों से आगे बढ़कर वैज्ञानिक मत्स्यपालन की दिशा में ठोस कदम उठाए हैं.

वैज्ञानिक तालाबों से बदली तस्वीर

बिहार में 7,575.12 हेक्टेयर क्षेत्र में वैज्ञानिक पद्धति से तालाबों का निर्माण कर तकनीकी आधारित मत्स्य उत्पादन किया जा रहा है. इससे उत्पादन क्षमता में वृद्धि के साथ-साथ मछलियों की गुणवत्ता भी बेहतर हुई है. भौगोलिक विविधताओं वाले प्रदेश में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार तकनीकों का इस्तेमाल कर मत्स्यपालकों को नई संभावनाएं दी गई हैं.

बायोफ्लॉक तकनीक से कम जगह में ज्यादा उत्पादन

बायोफ्लॉक तकनीक ने बिहार में मछली उत्पादन की परिभाषा ही बदल दी है. इस तकनीक के जरिए कम स्थान और कम लागत में अधिक मछलियों का उत्पादन संभव हो रहा है. राज्य में अब तक 764 बायोफ्लॉक संरचनाएं स्थापित की जा चुकी हैं. शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों में भी लोग इस तकनीक के जरिए मत्स्यपालन को स्वरोजगार के रूप में अपना रहे हैं.

आरएएस तकनीक से पानी की बचत और अधिक उत्पादन

री-सर्कुलेटिंग एक्वाकल्चर सिस्टम यानी आरएएस तकनीक से 90 प्रतिशत तक पानी की बचत हो रही है. इसके साथ ही उच्च सघन मत्स्यपालन संभव हो रहा है, जिससे कम संसाधनों में अधिक उत्पादन लिया जा सकता है. यह तकनीक खासकर उन क्षेत्रों में कारगर साबित हो रही है, जहां पानी की उपलब्धता सीमित है.

मछली उत्पादन में बढ़ोतरी से हजारों किसानों और युवाओं को रोजगार और आय का नया स्रोत मिला है. मत्स्यपालन अब सिर्फ पारंपरिक पेशा नहीं रहा, बल्कि एक संगठित और तकनीक आधारित उद्योग के रूप में उभर रहा है.

राष्ट्रीय स्तर पर बिहार की मजबूत पहचान

देश में चौथे स्थान पर पहुंचना बिहार के लिए सिर्फ उपलब्धि नहीं, बल्कि पहचान भी है. यह साबित करता है कि सही नीतियों, तकनीक और इच्छाशक्ति से बिहार कृषि और पशुपालन से जुड़े क्षेत्रों में राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत उपस्थिति दर्ज करा सकता है.

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