छह मासूमों की मौत ने छोड़ा बड़ा सवाल : पर्व की परंपरा के साथ सुरक्षा कौन संभालेगा?

सुलतानगंज में करमा-धरमा पर्व के दौरान बाढ़ के पानी में डूबने से छह बच्चों की मौत हो गई. इस दुखद घटना ने बाढ़ प्रभावित इलाकों में बच्चों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. लेख में सुरक्षा उपायों और जागरूकता की आवश्यकता पर जोर दिया गया है.

सुलतानगंज : करमा-धरमा पर्व की परंपरा निभाने निकले छह बच्चों की मौत ने छह परिवारों को गहरे सदमे में डाल दिया है. साथ ही, बाढ़ के बीच बच्चों की सुरक्षा को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिये हैं. तरैटा बहियार में करीब 20-25 बच्चे स्नान के बाद कुश तोड़ने की परंपरा निभा रहे थे. किसी को अंदाजा नहीं था कि बाढ़ के पानी के नीचे गहरा गड्ढा है. एक बच्चे का पैर फिसला और उसे बचाने की कोशिश में दूसरे बच्चे भी पानी में उतरते गये. देखते ही देखते छह बच्चों की जान चली गयी.

इस घटना के बाद सबसे अहम सवाल यह है कि बच्चे जलाशय तक पहुंचे, लेकिन उनकी निगरानी के लिए कोई अभिभावक या बड़ा व्यक्ति वहां क्यों नहीं था? बाढ़ के दौरान पानी की गहराई और जमीन की स्थिति लगातार बदलती रहती है. सामान्य दिखने वाला पानी कुछ कदम आगे ही खतरनाक गहराई में बदल सकता है. ऐसे में बच्चों को अकेले पोखर, जलाशय या बाढ़ के पानी के पास जाने से रोकना परिवार और समाज, दोनों की जिम्मेदारी बन जाती है.

गांव स्तर पर पहले से तय हो सुरक्षा व्यवस्था

ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए बाढ़ प्रभावित इलाकों में खतरनाक पोखरों, गड्ढों और जलभराव वाले स्थानों को पहले से चिह्नित किया जा सकता है. इन जगहों पर बैरिकेडिंग के साथ लाल झंडे और स्पष्ट चेतावनी बोर्ड लगाये जाने चाहिए.

पर्व के दौरान पंचायत, स्थानीय प्रशासन और स्वयंसेवकों की टीम ऐसे स्थानों पर निगरानी कर सकती है. गांव में सामूहिक रूप से यह व्यवस्था भी तय की जा सकती है कि कोई बच्चा अभिभावक या किसी बड़े व्यक्ति के साथ ही स्नान अथवा पर्व की रस्म के लिए जलाशय तक जाये. इसके लिए सुरक्षित स्थान पहले से चिह्नित करना और वहां बड़ों की मौजूदगी सुनिश्चित करना जरूरी है.

पर्व से पहले गांव-गांव हो जागरूकता

प्रशासन और पंचायतों की ओर से पर्व से पहले गांव-गांव माइकिंग कर लोगों को बाढ़ के पानी, छिपे गड्ढों और पोखरों के खतरे के बारे में जागरूक किया जा सकता है. स्कूलों, आंगनबाड़ी केंद्रों और जनप्रतिनिधियों के माध्यम से बच्चों को भी समझाया जाना चाहिए कि बाढ़ का पानी स्नान या खेलने के लिए सुरक्षित नहीं है.

स्थानीय युवाओं और स्वयंसेवकों की छोटी निगरानी टीमें बनाकर पर्व के दौरान जलाशयों के आसपास तैनाती की जा सकती है. इससे बच्चों को पानी में उतरने से समय रहते रोका जा सकेगा और किसी आपात स्थिति में तत्काल मदद भी मिल सकेगी.

छह मौतों के बाद अब सबक लेने की जरूरत

तरैटा बहियार की घटना को सिर्फ एक हादसा मानकर भूल जाना इस त्रासदी से कोई सीख नहीं होगी. छह बच्चों की मौत यह सवाल छोड़ गयी है कि बाढ़ के दौरान परंपराओं के निर्वहन के लिए सुरक्षा व्यवस्था कितनी जरूरी है.

करमा-धरमा जैसी परंपराएं पीढ़ियों से चली आ रही हैं, लेकिन बदलती परिस्थितियों के बीच उनकी सुरक्षित व्यवस्था करना भी जरूरी है. इसके लिए खतरनाक जलाशयों की पहचान, बैरिकेडिंग, चेतावनी बोर्ड, निगरानी और जागरूकता जैसे कदम पर्व के बाद नहीं, बल्कि पहले से शुरू किये जाने चाहिए. ताकि किसी भी पर्व पर बच्चों की खुशियां फिर किसी जलाशय के किनारे मातम में न बदलें.

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By Shubhanka Kumar

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