वीर कुंवर सिंह यूनिवर्सिटी के स्नातकोत्तर मनोविज्ञान विभाग में गुरु पूर्णिमा और भारतीय मनोविज्ञान दिवस के अवसर पर "मानव उत्थान में भारतीय मनोविज्ञान की भूमिका" विषय पर आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी एवं भाषण प्रतियोगिता का गुरुवार को सफलतापूर्वक समापन हुआ. कार्यक्रम की अध्यक्षता विभागाध्यक्ष प्रो. यशवंत कुमार ने की.
अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. यशवंत कुमार ने कहा कि भारतीय मनोविज्ञान केवल मन का वैज्ञानिक अध्ययन नहीं है, बल्कि आत्मज्ञान, आंतरिक शांति और समग्र जीवन शैली का मार्ग प्रशस्त करता है. उन्होंने कहा कि बाहरी दुनिया की अपेक्षा स्वयं को पहचानना और समझना अधिक आवश्यक है, तभी जीवन में वास्तविक संतुलन और संतुष्टि प्राप्त की जा सकती है.
भारतीय मनोविज्ञान और पाश्चात्य विचार की तुलना
मुख्य अतिथि एवं भोजपुरी विभागाध्यक्ष प्रो. दिवाकर पाण्डेय ने भोजपुरी भाषा में भारतीय मनोविज्ञान की अवधारणाओं को सरल ढंग से प्रस्तुत करते हुए बताया कि इसकी मूल आधारशिला चेतना, त्रिगुण और आत्म-साक्षात्कार है. उन्होंने सांख्य दर्शन के अनुसार सत्व, रजस और तमस के मानव व्यवहार पर प्रभाव की चर्चा की.
साथ ही सिगमंड फ्रायड, कार्ल युंग एवं अल्फ्रेड एडलर जैसे पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों के योगदान का उल्लेख करते हुए भारतीय और पाश्चात्य मनोविज्ञान की तुलनात्मक व्याख्या की.
मानसिक स्वास्थ्य और भगवद्गीता के सिद्धांत
संगोष्ठी की विषय विशेषज्ञ एवं विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. लतिका वर्मा ने कहा कि भारतीय मनोविज्ञान में मानसिक स्वास्थ्य का आधार त्रिगुण सिद्धांत, अंतःचेतना का विकास तथा मन-शरीर का संतुलन है.
उन्होंने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य केवल रोगों की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि भावनात्मक संतुलन, कार्यकुशलता और जीवन संतुष्टि की अवस्था है. मानसिक विकारों के उपचार में संतुलित आहार, स्वस्थ जीवनशैली और औषधीय जड़ी-बूटियों की उपयोगिता भी उन्होंने रेखांकित की.
भारतीय मनोविज्ञान के विद्वान डॉ. वाचस्पति दूबे ने कहा कि भगवद्गीता मानसिक स्वास्थ्य और तनाव प्रबंधन की प्राचीन एवं प्रभावी मार्गदर्शिका है.
उन्होंने कर्मयोग, ध्यानयोग और स्थितप्रज्ञता के सिद्धांतों को मानसिक शांति का आधार बताते हुए कहा कि जीवन के उतार-चढ़ाव ऋतुओं की भांति अस्थायी होते हैं, जिन्हें धैर्यपूर्वक स्वीकार करना चाहिए. उन्होंने आयुर्वेद में शुद्ध आहार एवं नियमित दिनचर्या की महत्ता पर भी प्रकाश डाला.
भविष्य की संभावनाएं और भाषण प्रतियोगिता के विजेता
डॉ. प्रियंका पाठक ने कहा कि भारतीय मनोविज्ञान का भविष्य प्राचीन भारतीय दर्शन और आधुनिक विज्ञान के समन्वय पर आधारित है.
उन्होंने कहा कि आने वाले समय में योग, ध्यान, वेदांत आधारित जीवनशैली और स्वदेशी मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण विश्व के लिए मानसिक स्वास्थ्य का प्रभावी विकल्प बनेंगे. उन्होंने नैदानिक मनोविज्ञान के क्षेत्र में रोजगार की बढ़ती संभावनाओं का भी उल्लेख किया.
कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. प्रीतिका ने किया. उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने के लिए ध्यान, गहरी श्वास, नियमित सैर, शारीरिक सक्रियता, कृतज्ञता, डिजिटल डिटॉक्स तथा पर्याप्त नींद जैसी दैनिक आदतों को अपनाने पर बल दिया.
संगोष्ठी के अंतर्गत आयोजित भाषण प्रतियोगिता में रुद्रांश (शोधार्थी) ने प्रथम, जूली (पीजी सेमेस्टर-3) ने द्वितीय तथा अमित (शोधार्थी) ने तृतीय स्थान प्राप्त किया. कार्यक्रम में स्नातकोत्तर एवं पीएच.डी. के विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया.
आयोजन के समापन पर प्रतिभागियों एवं विजेताओं को बधाई देते हुए भारतीय मनोविज्ञान के अध्ययन एवं अनुसंधान को समाजोपयोगी बनाने का आह्वान किया गया.
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