दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक आदमी कई दिनों से भूख हड़ताल पर बैठा रहा...
उसके हाथ में न कोई पत्थर है, न ही किसी मंच से कोई गुस्से वाला भाषण.
न कोई सड़कें बंद हैं, न कोई हिंसा.
बस एक शांत चेहरा है, एक पक्का इरादा है, और एक ही मांग है…
‘केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना चाहिए.’
यह मांग सोनम वांगचुक उठा रहे हैं.
एक इंजीनियर, एडुकेटर, और पर्यावरण कार्यकर्ता जो लद्दाख के लिए अपने विकास मॉडल के लिए दुनिया भर में जाने जाते हैं और फिल्म 3 इडियट्स के पीछे असल जिंदगी की प्रेरणाओं में से एक हैं.
लेकिन सवाल यह है: आखिर ऐसा क्या हुआ कि सोनम वांगचुक, जो कभी केंद्र सरकार के साथ बातचीत करते थे, उसी सरकार के एक सीनियर मंत्री, धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन आमरण अनशन पर बैठ गए?
कौन हैं धर्मेंद्र प्रधान?
धर्मेंद्र प्रधान भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के सबसे अनुभवी नेताओं में गिने जाते हैं. ओडिशा के तालचेर से आने वाले प्रधान ने छात्र राजनीति में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से शुरुआत की. संगठन में लगातार काम करते हुए वे भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व तक पहुंचे. सांसद रहे, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाले और आज वे केंद्रीय शिक्षा मंत्री तथा कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्री हैं.
सरकार में उनकी पहचान एक कुशल संगठनकर्ता और भरोसेमंद मंत्री की रही है. लेकिन पिछले एक वर्ष में उनकी सबसे बड़ी पहचान शिक्षा मंत्री के रूप में नहीं, बल्कि परीक्षा विवादों के केंद्र में खड़े मंत्री के रूप में बनी है.
एग्जाम से जुड़े विवादों का सिलसिला
देश में कॉम्पिटिटिव एग्जाम लाखों युवाओं के सपनों की नींव होते हैं.
लेकिन, हाल के सालों में, पेपर लीक, एग्जाम कैंसिल होने, टेक्निकल गड़बड़ियों और रिक्रूटमेंट प्रोसेस पर सवाल उठने की घटनाएं बार-बार सामने आई हैं.
यहीं पर Sonam Wangchuk की एंट्री होती है...
सालों से, सोनम वांगचुक एजुकेशन के फील्ड में अल्टरनेटिव मॉडल पर काम कर रहे हैं.
उनका मानना है कि एजुकेशन सिर्फ एग्जाम पास करने का जरिया नहीं है, बल्कि कैरेक्टर और समाज बनाने की नींव है.
जब एग्जामिनेशन सिस्टम की लगातार जांच होने लगी, तो उन्होंने इस मुद्दे को सिर्फ एक एडमिनिस्ट्रेटिव गलती के तौर पर नहीं, बल्कि देश के युवाओं के भविष्य से जुड़ा एक नैतिक संकट के तौर पर देखा.
इसीलिए उन्होंने एक आंदोलन का रास्ता चुना.
हालांकि, उनका आंदोलन एक आम पॉलिटिकल रैली जैसा नहीं था.
उन्होंने चुना-
उपवास.
शांति.
शांत विरोध.
और, सत्याग्रह...
'पैसिव रेजिस्टेंस' असल में क्या है?
भारत में विरोध की एक लंबी परंपरा रही है. यह परंपरा तलवार की ताकत पर नहीं, बल्कि नैतिक ताकत पर टिकी है.
1905 के स्वदेशी आंदोलन से लेकर महात्मा गांधी के सत्याग्रह, असहयोग आंदोलन और नमक सत्याग्रह तक, भारतीय राजनीति ने दुनिया को दिखाया है कि सत्ता में बैठे लोगों को हिंसा का सहारा लिए बिना भी झुकने के लिए मजबूर किया जा सकता है.
उपवास, बॉयकॉट, सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा- ये सभी इसी परंपरा का हिस्सा रहे हैं.
आज, सोनम वांगचुक इसी परंपरा को एक नए मुद्दे के संदर्भ में आगे बढ़ा रहे हैं.
कभी संवाद, आज टकराव
दिलचस्प बात यह है कि सोनम वांगचुक और मोदी सरकार के बीच रिश्ते हमेशा टकराव वाले नहीं रहे हैं.
कुछ साल पहले तक, उनके और सरकार के बीच बातचीत होती थी. लद्दाख से जुड़े मुद्दों पर उनकी राय सुनी जाती थी. उन्होंने जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने के बाद ,लद्दाख को मिले यूनियन टेरिटरी स्टेटस पर शुरू में हर्ष भी जताया था.
लेकिन, वह बातचीत अब टकराव में बदल गई है.
वही व्यक्ति, जो अभी जंतर-मंतर पर विरोध कर रहा है, अब शिक्षा मंत्री के इस्तीफे को अपनी मुख्य मांग बना रहा है.
इस बदलाव को सिर्फ दो लोगों के बीच के रिश्ते में बदलाव के तौर पर नहीं, बल्कि भरोसे में कमी के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है.
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धर्मेंद्र प्रधान की पुरानी राजनीतिक चुनौतियां
यह पहली बार नहीं हुआ है जब धर्मेंद्र प्रधान किसी विवाद में फंसे हों.
संसद में दिए गए कुछ बयानों को लेकर उन्हें विशेषाधिकार हनन के नोटिस का सामना करना पड़ा है.
ओडिशा की राजनीति में उनके प्रशासनिक कामकाज की भी समय-समय पर आलोचना होती रही है.
इससे पहले, व्यापम विवाद के दौरान उनके यात्रा खर्च को लेकर भी राजनीतिक आरोप लगे थे.
हालांकि, इनमें से ज्यादातर आरोप सिर्फ राजनीतिक चर्चाओं तक ही सीमित रहे और इनसे उनके राजनीतिक करियर पर कोई गंभीर असर नहीं पड़ा.
फिर भी, शिक्षा मंत्री के तौर पर उनके कार्यकाल में परीक्षाओं से जुड़ा जो विवाद सामने आया है, वह शायद उनके सार्वजनिक जीवन की सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा बन गया है.
अंतिम सवाल…
एक बात अभी से स्पष्ट है.
यह लड़ाई सोनम वांगचुक बनाम धर्मेंद्र प्रधान की नहीं है.
यह लड़ाई उस भरोसे की है, जो हर छात्र अपनी परीक्षा पर करता है.
क्योंकि किसी भी देश की सबसे बड़ी पूंजी उसकी युवा पीढ़ी होती है.
अगर छात्रों को यह भरोसा नहीं है कि उनकी मेहनत का निष्पक्ष मूल्यांकन होगा, तो सिर्फ एक परीक्षा ही नहीं, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता दांव पर लग जाएगी.
कल यह बात दूसरे राज्यों में और अलग-अलग सरकारों के खिलाफ भी फैलेगी.
और शायद यही कारण है कि जंतर-मंतर पर बैठा एक शांत उपवास आज केवल एक मंत्री से जवाब नहीं मांग रहा, बल्कि पूरे लोकतंत्र से यह पूछ रहा है-
क्या करोड़ों छात्रों का भविष्य सचमुच सुरक्षित हाथों में है?
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