मुस्लिम देश नेशनल एंथम में कर रहे अपनी धरती की वंदना, भारत में वंदे मातरम पर क्यों मचा बवाल?

Vande Mataram Controversy : भारत के इतिहास पर अगर ध्यान दें, तो वंदे मातरम वह गीत है, जिसने भारत की आजादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई थी. इस गीत ने आजादी की लड़ाई में नई ऊर्जा भरी थी, जिससे घबराकर अंग्रेजों ने इसपर प्रतिबंध लगाया और इस गीत को धर्म के खांजे में डालकर इसकी लोकप्रियता घटाने की कोशिश की. वे सफल भी रहे, क्योंकि यह गीत नेशनल एंथम नहीं बन सका और आज भी इस गीत की स्वीकार्यता 100% नहीं है. बहुसंख्यक मुसलमान इसके गायन से खुद को अलग रखता है.

Vande Mataram Controversy : देश का संविधान लागू होने के बाद वंदे मातरम, गीत के संपूर्ण हिस्से को नहीं, बल्कि कुछ छंंदों को राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकृत किया गया और इसे राष्ट्रीय गान के बराबर ही आदर दिया गया. सच्चाई यह है कि वंदे मातरम के साथ विवाद का पुराना नाता रहा है. गीत के प्रकाशन की 150वीं जयंती वर्ष में एक नया विवाद खड़ा हो गया है कि कांग्रेस पार्टी ने मुस्लिम लीग के दबाव में गीत के दो छंदों को छोड़कर बाकी को हटवा दिया.

क्या  नेहरू ने मुस्लिम तुष्टिकरण को बढ़ावा दिया ?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वंदे मातरम पर बहस के दौरान यह कहा कि कांग्रेस पार्टी और पंडित नेहरू ने मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति की और वंदे मातरम गीत, जो आजादी की लड़ाई का प्राणवायु बना था, उसे कटवा दिया और सिर्फ दो छंदों को ही राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकृत किया. दरअसल मुस्लिम लीग ने वंदे मातरम पर आपत्ति दर्ज कराई थी.

1937 में, इंडियन नेशनल कांग्रेस ने एक कमेटी बनाई थी, जिसमें मौलाना आजाद, जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस और रवींद्रनाथ टैगोर जैसे नेता शामिल थे. इस कमेटी ने गाने का रिव्यू किया और उसके बाद मुस्लिम लीग की आपत्तियों को देखते हुए वंदे मातरम के सिर्फ पहले दो छंदों को ही राष्ट्रीय गीत के तौर पर स्वीकार किया गया. हालांकि कई लोगों का यह मानना है कि सुभाषचंद्र बोस पूरे गाने को ही रखना चाहते थे, लेकिन उस वक्त की सामाजिक स्थिति और धार्मिक सद्‌भावना के लिए दो छंदों को ही स्वीकार किया गया.

क्या वर्तमान में इस विषय पर बहस बेमतलब है?

संसद में बहस के दौरान जो बातें निकलकर सामने आईं, उससे यह प्रतीत होता है कि वंदे मातरम पर बहस निरर्थक है. प्रियंका गांधी ने पीएम मोदी और उनकी सरकार पर यह आरोप लगाया कि वो देश के अहम मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए वंदे मातरम पर बहस करा रही है, जबकि यह गीत पहले से ही हमारे लिए आदर का विषय है.

वहीं एआईएमआईएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि वंदे मातरम एक खास धर्म के लोगों द्वारा गाया जाने वाला गीत है, जो इस्लाम के खिलाफ है, इसलिए हम इसे नहीं गाते हैं. लेकिन हम इसका सम्मान करते हैं, वंदे मातरम के गायन से हमारी राष्ट्रभक्ति को ना परखा जाए. भारत में रहने वाले मुसलमान जिन्ना के फाॅलोवर्स नहीं है, अन्यथा हम पाकिस्तान में होते. भारत एक सेक्यूलर मुल्क है, जहां सबको अपने धर्म के अनुसार आचरण करने की आजादी है, तो फिर यह कहना बेमतलब है कि भारत में रहना है तो वंदे मातरम गाना होगा.

क्या बीजेपी ने अपने वोटबैंक को टारगेट कर उठाया यह मुद्दा? 

वंदे मातरम पर संसद पर अभी बहस क्यों? यह बात सैद्धांतिक रूप से तो सही लगती है, लेकिन अगर इस विषय को समझने की कोशिश करें, तो हमें पता चलेगा कि यह कितना महत्वपूर्ण विषय है. वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई कहते हैं कि बीजेपी एक ऐसी पार्टी है, जो इतिहास से ऐसे विषयों को उठाकर वर्तमान में प्रस्तुत करती है, जिसका व्यापक प्रभाव उनके वोटबैंक और भविष्य पर पड़ता है. वे इसकी तैयारी भी बहुत करते हैं. इतिहास में कई ऐसी बातें हुई हैं, जो विवादित हैं.

वंदे मातरम पर मुसलमानों की आपत्ति यह है कि यह उनके एकेश्वरवाद के सिद्धांत के खिलाफ है, इसलिए वे इसके गायन से बचते हैं. वंदे मातरम के खिलाफ अंग्रेजों ने मुसलमानों के मन में शक पैदा किया और उन्हें यह बताया कि यह गाना हिंदुओं का गीत है, मुसलमानों का नहीं. धीरे–धीरे यह भावना उनके अंदर घर कर गई और जिन्ना ने उस शक को हवा दी. कांग्रेस ने गीत के सिर्फ दो छंदों को सार्वजनिक स्थलों पर गाने की अनुमति दी और जब मौलाना आजाद ने इसे गाया तो एक तरह से यह मुसलमानों के बीच भी स्वीकार्य हो गया.

मुस्लिम देशों  के नेशनल एंथम में धरती की वंदना की जाती है या नहीं?

वंदे मातरम से मुसलमानों को आपत्ति यह है कि यह गीत उनके एकेश्ववार के खिलाफ है, हालांकि 1920 में यह गीत देश में खिलाफत आंदोलन में गाया गया था, जहां मुसलमान बहुतायत में मौजूद थे. रशीद किदवई कहते हैं कि अपने देश में वंदे मातरम को लेकर विवाद है, क्योंकि यह एकेश्वरवाद के खिलाफ है, लेकिन विश्व के तमाम मुस्लिम देश जहां कि 90–95 प्रतिशत आबादी मुसलमान है, वे अपना राष्ट्रीय गीत बहुत शान से गाते हैं और उसमें उनकी भूमि की ही वंदना है.

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क्या देश में धार्मिक सहिष्णुता बनाए रखने के लिए वंदे मातरम के सिर्फ दो छंदों को स्वीकार किया गया था? 

अंग्रेज भारत का बंटवारा करना चाहते थे और इसके लिए उन्होंने हिंदू और मुसलमानों को बांटा. उनकी इस सोच को मोहम्मद अली जिन्ना ने अमली जामा पहनाया. महात्मा गांधी जैसे नेता देश में तनाव नहीं चाहते थे, इसी वजह से उन्होंने 1 जुलाई, 1939 को हरिजन पत्रिका में लिखा, ‘ मुझे कभी नहीं लगा कि यह एक हिंदू गाना है या सिर्फ हिंदुओं के लिए है. बदकिस्मती से, अब हमारे बुरे दिन आ गए हैं… मैं मिली-जुली सभा में वंदे मातरम गाने को लेकर एक भी झगड़े का रिस्क नहीं लूंगा.’ यह शब्द यह प्रमाणित करते हैं कि वंदे मातरम के जो पद हटाए गए उसके पीछे धार्मिक सद्‌भाव बनाए रखना ही था. यह एक तरह से उस वक्त की जरूरत थी, क्योंकि भारत आजादी की लड़ाई लड़ रहा था, लेकिन जिन्ना जैसे नेताओं ने इस बात का गलत फायदा उठाया. यह गीत 1905 के बंगाल विभाजन के वक्त लोगों की शक्ति बना, आजादी के वक्त आजादी के दीवानों ने इसे अपना मूलमंत्री बनाया.

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लेखक के बारे में

Author: Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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