मार्च में ही पड़ने लगी है झुलसाने वाली गर्मी

Climate Change : ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के हालिया अध्ययन में इस बात का खुलासा हुआ है. इस अध्ययन की मानें, तो भारत, नाइजीरिया, इंडोनेशिया, पाकिस्तान, बांग्लादेश और फिलीपींस इससे सर्वाधिक प्रभावित होंगे.

Climate Change : मार्च में ही देशभर में जिस तरह झुलसाने वाली गर्मी पड़ रही है, वह अत्यंत चिंता वाली बात है. भीषण गर्मी, सूखे और आग की घटनाओं ने चेतावनी दे दी है कि आने वाले दिनों में बढ़ता तापमान हमें और रुलाने वाला है. यह भी चिंताजनक है कि 2050 तक गर्मी खतरनाक स्तर तक पहुंच सकती है. ऐसी स्थिति में दुनिया के लगभग 41 प्रतिशत लोग इसका सामना करने को अभिशप्त होंगे. यह स्थिति तब उत्पन्न होगी, जब दुनिया का औसत तापमान औद्योगिक युग से दो डिग्री सेल्सियस बढ़ जायेगा.

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के हालिया अध्ययन में इस बात का खुलासा हुआ है. इस अध्ययन की मानें, तो भारत, नाइजीरिया, इंडोनेशिया, पाकिस्तान, बांग्लादेश और फिलीपींस इससे सर्वाधिक प्रभावित होंगे. वहीं ब्राजील और दक्षिणी सूडान जैसे देशों के तापमान में सबसे तेज उछाल आने की संभावना है. एशिया प्रशांत डिजास्टर रिपोर्ट, 2025 के अनुसार, फिजी, पापुआ न्यू गिनी और मार्शल जैसे द्वीपीय देशों में भी भविष्य में गर्मी का खतरा मध्यम से उच्च स्तर तक बढ़ सकता है.


जानकारों का मानना है कि ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी का यह अध्ययन भारत जैसे विकासशील देशों के लिए गंभीर चेतावनी है, जहां गर्मी केवल मौसम नहीं, बल्कि एक सार्वजनिक गंभीर स्वास्थ्य संकट बनती जा रही है. भारत की विशाल जनसंख्या और पहले से ही गर्म जलवायु इसे और संवेदनशील बनाती है. इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन के अनुसार, भारत में गर्मी के कारण उत्पादकता में भारी कमी आयेगी और इस कारण जीडीपी में 4.5 प्रतिशत तक की कमी आने की आशंका है.

वैज्ञानिकों ने तो अमेरिका, चीन और भारत में गर्मी के अतिरिक्त दिनों की संख्या 23 से 30 होने की आशंका भी जतायी है. भारत ही नहीं, दुनिया के कई विकासशील देश भीषण गर्मी की मार से त्रस्त हैं. दुनिया के शोध अध्ययनों ने यह साबित कर दिया है कि गर्मी की मार से तपने वाले देशों की सूची में भारत सबसे ऊपर है और देश के आधे से अधिक जिलों पर भीषण गर्मी का साया मंडरा रहा है.

यह निष्कर्ष ‘नेचर सस्टेनेबिलिटी’ जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट और ‘काउंसिल ऑन एनर्जी एनवायरनमेंट एंड वाटर (सीइइडब्ल्यू)’ के अध्ययन में सामने आया है. इस रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक और डरावना पहलू सबसे गर्म रातों की तादाद में होने वाली बढ़ोतरी है. रात के तापमान का सामान्य से अधिक रहने के कारण हमारे शरीर को पूरे दिन की थकान से उबर पाने का समय नहीं मिल पाता है. इससे हीट स्ट्रोक और हृदयाघात की आशंका अधिक रहती है.


आज हम गर्मी के भयावह रूप की चर्चा करते समय पर्यावरण में वृक्षों की महत्ता को क्यों नकार रहे हैं, यह समझ से परे है. जबकि गर्मी से बचाने में वृक्षों का योगदान जगजाहिर है. दुखद है कि विकास के नाम पर पूरे देश में हर वर्ष लाखों हरे-भरे पेड़ों की बलि दी जा रही है. राजस्थान में ग्रीन एनर्जी के नाम पर लाखों की तादाद में खेजड़ी के पेड़ों को काटा जा रहा है. इस कारण बीकानेर का तापमान सात डिग्री तक बढ़ गया है.

सीइइडब्ल्यू के अध्ययन की मानें, तो देश में गर्मी के सर्वाधिक जोखिम वाले राज्यों में दिल्ली, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, गोवा, केरल, राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक और तमिलनाडु शामिल हैं. देश में गर्मी के 417 जिले उच्च जोखिम की श्रेणी में हैं, जबकि 201 जिले मध्यम जोखिम का सामना कर रहे हैं. हालत यह है कि अब उत्तर भारत के शुष्क माने जाने वाले जिलों में देश के तटीय इलाकों में रहने वाली उमस देखी जा रही है और सिंधु तथा गांगेय के मैदानी क्षेत्रों में बीते एक दशक के सापेक्ष में आद्रता में 10 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.

वहीं दिल्ली सहित कानपुर, वाराणसी, जयपुर में आद्रता के स्तर का यह आंकड़ा 30 प्रतिशत से बढ़कर 40-50 प्रतिशत तक पहुंच गया है. बढ़ती गर्मी के जोखिम के चंगुल में शहर ही नहीं हैं, उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और केरल के ग्रामीण अंचल भी हैं.


बढ़ते तापमान का सर्वाधिक असर खेतिहर मजदूरों पर पड़ता है. इस बारे में यूएनइएससीएपी (एशिया और प्रशांत के लिए संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक आयोग) का कहना है कि खेतिहर मजदूरों में हीट स्ट्रेस, डिहाइड्रेशन, गर्मी से जुड़ी बीमारियां अधिक होती हैं. छाया, पीने का पानी और आराम के क्षणों की कमी स्थिति को और विषम बना देती है. खासकर प्रवासी और असंगठित मजदूरों के मामले में पहचान का संकट इसका एक अहम कारण है. यह भी कि उन्हें समय पर पर्याप्त इलाज नहीं मिल पाता है. संयुक्त राष्ट्र संगठन ने जोर देकर कहा है कि बढ़ती गर्मी से सुरक्षा के लिए तुरंत ठोस कदम उठाने की जरूरत है.

इसके लिए मौसम व जलवायु जोखिम की अधिक सटीक जानकारी को निर्णय प्रणाली और अर्ली वार्निंग सिस्टम में शामिल करना होगा. साथ ही, विभिन्न क्षेत्रों के बीच बेहतर योजना और इस दिशा में सार्वजनिक निवेश को भी बढ़ावा देना बेहद जरूरी है. यह महज एक चुनौती नहीं, भविष्य की सुरक्षा का प्रश्न भी है. बढ़ती गर्मी अब केवल मौसम की समस्या नहीं, एशिया-प्रशांत की खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका का सीधा संकट बनती जा रही है. ऐसी स्थिति में भारत और उच्च जोखिम वाले देशों के लिए अब कृषि प्रणाली को बदलना और उन्हें गर्मी के अनुकूल बनाना अनिवार्य हो चला है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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By ज्ञानेंद्र रावत

ज्ञानेंद्र रावत is a contributor at Prabhat Khabar.

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