खास बातें
Mousam Benazir Noor: पश्चिम बंगाल की राजनीति में मौसम (Mousam) की तरह रंग बदलने का हुनर अगर किसी के पास है, तो वह हैं मालदा के गनी खान चौधरी परिवार की चश्म-ओ-चिराग मौसम बेनजीर नूर. पिछले कुछ वर्षों में बंगाल की राजनीति में ऐसी ‘मौसमी हवा’ कम ही देखने को मिली है, जैसी मौसम नूर के इर्द-गिर्द चलती है.
कभी कांग्रेस, कभी तृणमूल और अब फिर से कांग्रेस. 46 साल की मौसम नूर भारत की उन दुर्लभ राजनेताओं में शामिल हो गयीं हैं, जिन्हें देश की तीनों प्रमुख कार्यपालिकाओं- विधानसभा, लोकसभा और राज्यसभा का सदस्य बनने का गौरव प्राप्त है.
गनी खान की विरासत और 29 की उम्र में राजनीति में एंट्री
मौसम नूर के खून में राजनीति है. मालदा के बेताज बादशाह रहे बरकत गनी खान चौधरी की विरासत को उन्होंने बखूबी संभाला है. मां की मृत्यु के बाद, मात्र 29 साल की उम्र में उन्होंने सुजापुर विधानसभा सीट से राजनीति में कदम रखा. विधायक का कार्यकाल पूरा होने से पहले ही लोकसभा की जंग में कूद पड़ीं. मालदा उत्तर से कांग्रेस की सांसद बनीं. बहुत कम समय में वह कांग्रेस ‘हाईकमान’ की नजरों में चढ़ गयीं थीं.
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2019 का वो यू-टर्न और राज्यसभा का सफर
मौसम नूर का राजनीतिक ग्राफ 2019 में अचानक बदल गया. लोकसभा चुनाव से ठीक पहले उन्होंने कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस (TMC) का दामन थाम लिया. हालांकि, वह चुनाव हार गयीं. हार के बाद ममता बनर्जी ने 2020 में उन्हें टीएमसी कोटे से राज्यसभा भेज दिया. कार्यकाल खत्म होने से पहले ही मौसम ने एक बार फिर अपना ठिकाना बदल लिया. अपने पुराने घर यानी कांग्रेस में वापसी कर ली.
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2026 की जंग : सुजापुर छोड़ मालतीपुर को क्यों चुना?
इस बार विधानसभा चुनाव में मौसम नूर मालतीपुर सीट से मैदान में हैं. अपनी पुरानी सीट सुजापुर को छोड़ने के पीछे एक गहरी राजनीतिक चाल मानी जा रही है. सियासी गलियारों में चर्चा है कि यह केवल एक विधानसभा चुनाव नहीं है. भविष्य की बड़ी प्लानिंग है. मौसम नूर का असली लक्ष्य 2029 में दक्षिण मालदा लोकसभा सीट से दिल्ली कूच करना है. मालतीपुर की लड़ाई उनके उसी मिशन का हिस्सा है.
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Mousam Benazir Noor: राजनीति की सबसे ‘हिसाबी’ खिलाड़ी
मौसम नूर के बारे में एक बात मशहूर है कि वह राजनीति के साथ-साथ निजी जीवन में भी बेहद ‘हिसाबी’ हैं. वह कब, कहां और क्या बोलेंगी, यह सब पहले से तय होता है. घर के खर्चों से लेकर राजनीति के अगले कदम तक, वह सब कुछ बहुत सोच-समझकर और योजनाबद्ध तरीके से करती हैं. उनके विरोधी भी उन्हें पश्चिम बंगाल की राजनीति की सबसे ‘धुरंधर’ और रहस्यमयी खिलाड़ी मानते हैं, जिनके अगले कदम का अंदाजा कोई नहीं लगा पाता.
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