आर्थिक वृद्धि की राह में रोड़ा बना अमेरिका और ईरान युद्ध

US-Iran war : उच्च तेल कीमतों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर तत्काल प्रभाव पड़ता है. शहरी आवागमन से लेकर खाद्य और विनिर्मित वस्तुओं की ढुलाई तक परिवहन लागत बढ़ जाती है. उर्वरक और पेट्रोकेमिकल की कीमतें बढ़ती हैं, जिससे किसानों और उद्योगों के लिए इनपुट लागत बढ़ जाती है.

US-Iran war : अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध वैश्विक अर्थव्यवस्था को जिस तरह झकझोर रहा है, वैसा 1970 के दशक के बड़े तेल झटकों और खाड़ी युद्ध के दौर के बाद शायद ही देखा गया हो. इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण कच्चे तेल की कीमतों में आया तेज उछाल है. पर इसके पीछे डगमगाते बाजारों, कमजोर आपूर्ति शृंखलाओं और बढ़ती महंगाई के नये खतरे की बड़ी कहानी छिपी है. मौजूदा उथल-पुथल के केंद्र में तेल है, क्योंकि यह अब भी वैश्विक उत्पादन का सबसे महत्वपूर्ण घटक है. जैसे-जैसे लड़ाई तेज हुई है और खाड़ी क्षेत्र के समुद्री मार्ग, जिनमें होर्मुज जलडमरूमध्य महत्वपूर्ण है, खतरे में आये हैं, कच्चे तेल की कीमत तेजी से बढ़ गयी है.


शेयर बाजार के व्यापारी केवल आपूर्ति में व्यवधानों पर ही नहीं, इस जोखिम पर भी प्रतिक्रिया दे रहे हैं कि लंबे समय तक तेल टैंकर संकरे समुद्री मार्गों से गुजरेंगे, ऐसे में, अधिक बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया जा सकता है, और यह आशंका भी है कि इस अस्थिर माहौल में कुछ उत्पादक जानबूझकर उत्पादन कम कर दें. दुनियाभर में चलने वाले हर बैरल तेल पर एक महत्वपूर्ण ‘युद्ध प्रीमियम’ जुड़ गया है. भौतिक आपूर्ति भले अभी गंभीर रूप से सीमित न हुई हो, बीमा लागत बढ़ गयी है, शिपिंग दरें चढ़ गयी हैं और वायदा बाजार चिंता के संकेत दे रहे हैं. भारत के लिए यह सीधे तौर पर असर डालने वाली स्थिति है.

दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में से एक होने के कारण भारत इसके प्रति संवेदनशील है. कच्चे तेल की कीमत में वृद्धि देश का आयात बिल बढ़ा देती है और व्यापार की शर्तें बिगाड़ती है. जब यह वृद्धि अचानक और बड़ी होती है, तब जल्दी ही चालू खाते के घाटे में वृद्धि, रुपये पर दबाव और नीति-निर्माताओं के लिए विकास, महंगाई और बाहरी स्थिरता के बीच संतुलन बनाना और कठिन बना देती है. उच्च तेल कीमतों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर तत्काल प्रभाव पड़ता है. शहरी आवागमन से लेकर खाद्य और विनिर्मित वस्तुओं की ढुलाई तक परिवहन लागत बढ़ जाती है. उर्वरक और पेट्रोकेमिकल की कीमतें बढ़ती हैं, जिससे किसानों और उद्योगों के लिए इनपुट लागत बढ़ जाती है.

एयरलाइंस, लॉजिस्टिक्स कंपनियां, सीमेंट उत्पादक और अन्य ऊर्जा गहन क्षेत्र मुनाफे के दबाव में आ जाते हैं, और बढ़ी हुई लागतों का कुछ हिस्सा अंततः उपभोक्ताओं पर डाल दिया जाता है. पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों को भले अस्थायी रूप से स्थिर रखा जाये, इससे समस्या समाप्त नहीं होती. तेल की खुदरा कीमतों को स्थिर रखने का मतलब अक्सर सरकारी तेल कंपनियों पर निर्भर होना होता है. यदि ये कंपनियां लागत से कम पर ईंधन बेचती हैं, तो उनकी बैलेंस शीट पर घाटा बढ़ता है, जब तक कि सरकार उनकी भरपाई न करे या कीमत बढ़ाने की अनुमति न दे. केंद्र और राज्य सरकारें उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए ईंधन कर कम कर सकती हैं, पर इससे तुरंत उनके राजकोषीय संसाधनों पर असर पड़ता है. यह झटका व्यवस्था में कहीं न कहीं दिखाई देता है- कंपनियों के वित्तीय हालात में, सरकारी खातों में, या घरों और व्यवसायों की जेब में.


वित्तीय बाजारों के लिए भी समय अनुकूल नहीं है. युद्ध से पहले निवेशक एक ऐसी दुनिया की उम्मीद कर रहे थे, जिसमें वृद्धि धीमी पर सकारात्मक हो, महंगाई धीरे-धीरे घटे और प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में ब्याज दरों में कटौती की संभावना बने. युद्ध ने इस पूरी कहानी को एक झटके में उलट दिया है. वैश्विक शेयर बाजारों में तेज गिरावट आयी है, क्योंकि निवेशक आय के अनुमान, जोखिम प्रीमियम और संभावित ब्याज दर वृद्धि को फिर से आंकने में लगे हैं. शेयर बाजार में यह बिकवाली भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं में अधिक तीव्र रही है, जो ऊर्जा की बड़ी आयातक हैं. भारतीय शेयर बाजार पहले घरेलू विकास के प्रति आशावादी थे, पर युद्ध ने उस पर विराम लगा दिया है.

कीमतों और सूचकांकों से परे यह संघर्ष वैश्विक व्यापार को भी प्रभावित कर रहा है. युद्ध के समय जहाजों की आवाजाही बदल जाती है, बीमा कंपनियां अधिक सावधान हो जाती हैं और व्यापार वित्त अधिक महंगा हो जाता है. तेल टैंकर पहले ही केप ऑफ गुड होप जैसे लंबे मार्गों से भेजे जा रहे हैं, जिससे समय और लागत में वृद्धि हुई है. कुछ निर्यातक उत्पादन रोक सकते हैं, जबकि आयातक अपने आपूर्तिकर्ताओं में विविधता बढ़ाने की कोशिश करते हैं. ये बदलाव ऊर्जा गहन और पेट्रोकेमिकल आधारित कई आपूर्ति शृंखलाओं को भी प्रभावित करते हैं. उर्वरकों और प्लास्टिक से लेकर सिंथेटिक फाइबर और औद्योगिक रसायनों तक आधुनिक विनिर्माण के कई मूलभूत घटक सस्ते व स्थिर तेल-गैस पर निर्भर करते हैं. जब यह आधार हिलता है, तो हर क्षेत्र में लागत बढ़ती है, जिससे खाद्य पदार्थों, कपड़ों, इलेक्ट्रॉनिक्स और अनगिनत अन्य वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाती हैं.


अंततः ध्यान महंगाई पर जाता है. दुनियाभर के जिन केंद्रीय बैंकों ने पिछले दो वर्षों में महंगाई कम करने के लिए प्रयास किये हैं, उनके लिए यह झटका उन प्रयासों को कमजोर कर देता है. जितने समय तक कच्चे तेल की कीमत ऊंची बनी रहती है, ऊंची कीमतों के भविष्य की अपेक्षाओं और वेतन मांगों में स्थायी रूप से शामिल होने का जोखिम उतना ही होता है. यह एक हल्के स्टैगफ्लेशन की स्थिति बना सकता है, जहां आर्थिक वृद्धि धीमी होती है, पर महंगाई अपेक्षा के अनुसार तेजी से कम नहीं होती. ऐसे में मौद्रिक नीति को फिर से व्यवस्थित करना पड़ सकता है. केंद्रीय बैंक भू-राजनीतिक झटके के बीच आर्थिक गतिविधि को सहारा देने को प्राथमिकता दें, या दूसरे दौर की महंगाई को नियंत्रित करने के लिए लंबे समय तक ब्याज दरें ऊंची रखें? दोनों विकल्प आकर्षक नहीं हैं, और हर देश के लिए इनका संतुलन अलग होगा.

भारत जैसे देश के लिए ये समझौते जोखिम भरे और अनिश्चित हैं. तनाव में शीघ्र कमी की उम्मीद, प्रमुख समुद्री मार्गों की विश्वसनीय सुरक्षा, और बड़े उत्पादकों व उपभोक्ताओं द्वारा समन्वित कार्रवाई बाजारों को शांत कर सकती है, पर इसकी कोई निश्चितता नहीं है. यदि संघर्ष लंबा खिंचता है, तो आज की घबराहट अधिक स्थायी आर्थिक झटके में बदल सकती है. अमेरिका-ईरान युद्ध ने यह उजागर कर दिया है कि अस्थिर क्षेत्र से आने वाले जीवाश्म ईंधन प्रवाह पर निर्भर दुनिया कितनी नाजुक है. ऊर्जा सुरक्षा, व्यापक आर्थिक स्थिरता और भू-राजनीतिक जोखिम अब एक ही कहानी में मिल गये हैं- और भारत खुद को असहज रूप से उसी का सामना करते हुए पा रहा है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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By अभिजीत मुखोपाध्याय

अभिजीत मुखोपाध्याय is a contributor at Prabhat Khabar.

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