खार्ग आईलैंड: समुद्र के बीच ईरान की लाइफलाइन, US यहां हमला करने से क्यों डर रहा?

Kharg Island Iran: खार्ग आईलैंड ईरान की समुद्री सीमा से 20-25 किमी दूर है. यह कभी अमेरिका द्वारा ही बनाया गया था. आज अमेरिका जब ईरान में सबकुछ तबाह करने में जुटा है, तो वह ईरान की अर्थव्यवस्था के एक अहम स्थान पर हमला क्यों नहीं कर रहा?

Kharg Island Iran: ईरान पर हमले की वजह से पूरी दुनिया में तेल संकट खड़ा हो गया है. अमेरिका और इजरायल पिछले 10 दिनों से लगातार पश्चिम एशिया के इस देश पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं. इस संघर्ष में अब तक ईरान में 1300+ तो वहीं कुल मौतों का आंकड़ा 1700 के पार पहुंच गया है. फिर भी ईरान झुकने के लिए तैयार नहीं है. अमेरिका राजधानी तेहरान में शीर्ष नेताओं से लेकर तेल डिपो पर हमला कर रहा है, लेकिन एक छोटा सा द्वीप खार्ग आईलैंड, जो ईरान के समुद्री तट से 20 किमी दूर भी है, लेकिन अमेरिका इस पर हमला क्यों नहीं कर रहा है?

कहां है खार्ग आईलैंड?

फारस की खाड़ी के उत्तरी हिस्से में स्थित यह कोरल द्वीप ईरान की मुख्य भूमि से लगभग 25 से 30 किलोमीटर दूर है. यह 8 किमी लंबा और 4 किमी चौड़ा है. खार्ग द्वीप को अक्सर ईरान की अर्थव्यवस्था की “लाइफलाइन” कहा जाता है. पिछले कई दशकों में यहां तेल भंडारण, पाइपलाइन और निर्यात टर्मिनलों के विकास पर भारी निवेश किया गया है. ईरान के विभिन्न तेल क्षेत्रों से पाइपलाइन के जरिए कच्चा तेल यहां लाया जाता है और फिर विशाल टैंकरों के जरिए दुनिया के कई देशों को भेजा जाता है. इस द्वीप की क्षमता इतनी बड़ी है कि यहां से रोजाना करीब 70 लाख बैरल तेल लोड किया जा सकता है.

खार्ग आईलैंड पर गहरे समुद्री घाट (डीप-वॉटर डॉक) बनाए गए हैं, जहां विशाल तेल टैंकर आसानी से आकर खड़े हो सकते हैं और तेल लोड कर सकते हैं. इस द्वीप पर बड़े पैमाने पर तेल भंडारण की सुविधा भी मौजूद है, जहां करोड़ों बैरल कच्चा तेल एक साथ जमा किया जा सकता है. ईरान के सरकारी राजस्व का बड़ा हिस्सा तेल निर्यात से आता है और वह यहां से लगभग 90 प्रतिशत तेल का निर्यात करता है. 

ईरान की लाइफ लाइन- विदेशी फंडिंग का आधार भी

खार्ग द्वीप पर मौजूद सुविधाएं केवल आर्थिक ढांचे का हिस्सा ही नहीं बल्कि देश की वित्तीय स्थिरता की आधारशिला भी मानी जाती हैं. देश की आईआरजीसी, हमास, हिज्बुल्लाह और हूती विद्रोहियों को ईरान की ओर से सैन्य सहायता भी दी जाती है, ऐसी रिपोर्ट्स हमेशा आती रहती हैं. उसके लिए ईरान का आर्थिक स्रोत यहीं से पैदा होता है.  यदि यह केंद्र किसी वजह से बंद हो जाए या यहां की गतिविधियां रुक जाएं तो ईरान की अर्थव्यवस्था को भारी झटका लग सकता है. तो फिर अमेरिका इसे निशाना बनाने से क्यों हिचक रहा है?

अमेरिका ने ही किया था इसका विकास

इससे पहले कि आपको अमेरिकी हिचक समझें, यह भी जान लें कि खार्ग द्वीप का विकास 1960 के दशक में शुरू हुआ था और इसे अमेरिका ने ही विकसित किया था. अमेरिकी तेल कंपनी अमोको ने यहां आधुनिक तेल निर्यात टर्मिनल तैयार किए थे. सारा विवाद भी इसी से पैदा हो रहा है. जहां और जिस देश ने अपने तेल का राष्ट्रीयकरण किया, अमेरिका के लिए खतरा पैदा हुआ. अमेरिका ईरान से 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद बाहर हो गया. हाल ही में आपने वेनेजुएला में अमेरिकी कार्रवाई के बारे में सुना होगा, वहां भी यही कारण था. खैर, हमारा मुद्दा आज ईरान है और उसका छोटा सा आईलैंड- खार्ग.  

क्यों अटैक नहीं कर रहा है अमेरिका?

खार्ग द्वीप केवल तेल निर्यात का केंद्र ही नहीं है, बल्कि यह ईरान के ऊर्जा नेटवर्क का महत्वपूर्ण हिस्सा है. यहां से कई पाइपलाइनें और समुद्री मार्ग जुड़े हुए हैं, जो देश के अन्य तेल क्षेत्रों से उत्पादन को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने में मदद करते हैं. यही कारण है कि यह छोटा सा द्वीप वैश्विक ऊर्जा राजनीति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

खार्ग आइलैंड का महत्व केवल ईरान तक सीमित नहीं है. यह वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है. फारस की खाड़ी से दुनिया के कई देशों को तेल की आपूर्ति होती है और इसी क्षेत्र में दुनिया का सबसे संवेदनशील समुद्री मार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज स्थित है. अगर खार्ग द्वीप या आसपास के समुद्री मार्गों में किसी भी तरह की सैन्य कार्रवाई होती है तो वैश्विक तेल बाजार में तुरंत असर दिख सकता है. 

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कई ऊर्जा विश्लेषकों का मानना है कि इस क्षेत्र में संघर्ष बढ़ने से कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आ सकता है. इससे दुनिया की अर्थव्यवस्था पर भी दबाव बढ़ सकता है. तेल की कीमतें वैसे भी बढ़ चुकी हैं. 2022 के बाद पहली बार 100 डॉलर प्रति बैरल का आंकड़ा पार कर चुका है. इसी वजह से अमेरिका और इजरायल के लिए भी यह द्वीप एक तरह की ‘रेड लाइन’ माना जाता है. 

वहीं, कुछ विशेषज्ञों के अनुसार, यहां हमला करने से विश्व युद्ध भी शुरू हो सकता है. अभी ईरान केवल मिडिल ईस्ट के देशों पर ही हमला कर रहा है. अगर खार्ग आईलैंड को नुकसान पहुंचा, तो वह अपनी लांग रेंज मिसाइलों का उपयोग कर सकता है. ईरान के पास 2000 किमी तक मार करने वाली मिसाइलें हैं, जिनकी जद में यूरोप के कई देश आते हैं.

तो अमेरिका के पास क्या विकल्प हैं?

कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि अमेरिकी रणनीतिक हलकों में खार्ग द्वीप को लेकर अलग तरह की योजनाओं पर चर्चा हो रही है. कुछ रणनीतिक रिपोर्टों में यह संभावना जताई गई है कि अमेरिका ईरान की आर्थिक क्षमता कमजोर करने के लिए इस द्वीप की नाकेबंदी या विशेष सैन्य अभियान पर विचार कर सकता है. यदि ऐसा होता है तो ईरान के तेल निर्यात पर बड़ा असर पड़ सकता है.

द्वीप पर नियंत्रण हासिल करने से ईरान के लिए युद्ध के खर्च और घरेलू आर्थिक जरूरतों को पूरा करना मुश्किल हो सकता है. हालांकि ऐसा कदम उठाना बेहद जोखिम भरा माना जाता है, क्योंकि इससे पूरे क्षेत्र में तनाव और बढ़ सकता है. वैसे भी ईरान मिडिल ईस्ट के अन्य देशों पर हमला कर ही रहा है. वह जवाबी हमला उसी अंदाज में कर रहा है. जैसे उसके वाटर प्लांट पर अटैक हुआ, तो उसने बहरीन में मिसाइल दाग दी. ऐसे में खार्ग में कोई अटैक, ईरान की ओर से कड़ा सैन्य जवाब को आमंत्रित करेगा.

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परमाणु तनाव बढ़ने की आशंका

वहीं, कुछ सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ईरान की आर्थिक लाइफलाइन पर सीधा दबाव बनाया गया तो वह अपनी सुरक्षा रणनीति को और आक्रामक बना सकता है. ऐसे में उसके परमाणु कार्यक्रम को लेकर अंतरराष्ट्रीय चिंता भी बढ़ सकती है. अमेरिकी हमलों का सारा आधार भी परमाणु ही है. माना जाता है कि ईरान के पास उच्च स्तर तक समृद्ध यूरेनियम का भंडार मौजूद है, जिसे सैद्धांतिक रूप से परमाणु हथियार बनाने में इस्तेमाल किया जा सकता है.

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By Anant narayan shukla

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उत्तर प्रदेश के भदोही जिले के रहने वाले अनन्त ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की है. उन्होंने 2024 में अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत प्रभात खबर में खेल पत्रकार के रूप में की थी, जहां उन्होंने करीब एक वर्ष तक क्रिकेट और अन्य खेलों से जुड़ी खबरों को कवर किया. बाद में अपनी रुचि और विशेषज्ञता के चलते उन्होंने अंतरराष्ट्रीय डेस्क का रुख किया और आज वैश्विक राजनीति व भू-राजनीति के प्रमुख विषयों पर लेखन कर रहे हैं.

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