–डॉ संजय भारद्वाज–
(प्रोफेसर,स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज, जेएनयू)
Raisina Dialogue : वैश्विक उथल-पुथल के माहौल में नयी दिल्ली में संपन्न 11वें रायसीना डायलॉग को रेखांकित किये जाने की जरूरत है. रायसीना डायलॉग भारत के वैश्विक विमर्श का मंच है, और इसे जर्मनी के म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन तथा सिंगापुर के शांगरी-ला संवाद के समकक्ष माना जाता है. साउथ ब्लॉक चूंकि रायसीना हिल्स पर है, इसलिए इस संवाद को रायसीना डायलॉग कहा जाता है. भारत दुनिया को और दुनिया भारत को कैसे देखता है, यह संवाद इस पर केंद्रित होता है. ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन और भारत का विदेश मंत्रालय इसका आयोजन करता है. इसकी शुरुआत 2016 में हुई थी, जिसमें 33 देशों के कुल सौ वक्ताओं की हिस्सेदारी थी.
इसके तहत विश्व के प्रमुख देशों के अतिरिक्त, दक्षिण एशियाई, पश्चिम एशियाई और मध्य एशियाई देशों से नियमित संवाद होता है. जिसमें सांस्कृतिक, व्यापारिक और भौगोलिक जुड़ाव के साथ मुख्य ग्लोबल कॉमर्स व ग्लोबल गुड्स के मुद्दों पर गंभीर विचार होते हैं. भारत की वरीयता में खाद्यान्न, ऊर्जा एवं स्वास्थ्य सुरक्षा हमेशा रहती है. इस वर्ष के रायसीना संवाद का थीम था : ‘संस्कार-कथन, सामंजस्य, उन्नति’. यह थीम दर्शाती थी कि सभ्यताएं किस प्रकार विविधता को स्वीकार कर और प्रगति की ओर अग्रसर होते हुए अपनी पहचान स्थापित करती हैं.
यह बहुत उथल-पुथल वाला समय है. पहले उदारवादी विचारधारा थी. पर अब यह नयी यथार्थवादी विचारधारा में तब्दील हो रही है. वैश्विक सस्थाएं टूट-बिखर रही हैं. शक्तिशाली देश कानून तोड़ रहे हैं और उन्होंने संयुक्त राष्ट्र को अपने हित में अपने नियंत्रण में रखा है. ऐसे में, आपसी संवाद जरूरी है. हमारे प्रधानमंत्री कहते हैं कि यह युद्ध का समय नहीं है. कोई भी विवाद कूटनीति और संवाद से ही हल हो सकता है, क्योंकि हम कानून के शासन में विश्वास करते हैं. हम बहुविश्ववाद और यूएन चार्टर में विश्वास रखते हैं. हमारी विदेश नीति बेहद स्वतंत्र है, जिसमें रणनीतिक स्वायत्तता के साथ बहुपक्षीय नीति पर बल दिया जाता है. हम क्वाड के भी सदस्य हैं, एससीओ के भी और ब्रिक्स के भी.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रायसीना डायलॉग के उद्घाटन सत्र में शामिल हुए, जबकि फिनलैंड के राष्ट्रपति एलेक्जेंडर स्टब मुख्य अतिथि थे. उन्होंने कहा कि वैश्विक राजनीति में पश्चिमी प्रभुत्व का युग समाप्त हो रहा है तथा भारत और ग्लोबल साउथ अगली अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायेंगे. भारत द्वारा लिये गये नीतिगत निर्णय ही भविष्य की दिशा निर्धारित करेंगे. चर्चा में दुनियाभर की हस्तियों ने जिन मुद्दों पर अपने विचार रखे, वे थे- विवादित सीमाएं : शक्ति, ध्रुवीकरण और परिधि, साझा संसाधनों का पुनर्निर्माण : नये समूह, नये संरक्षक, नये रास्ते, तथा शुल्क के दौर में व्यापार : पुनर्प्राप्ति, सुगमता और पुनर्निर्माण इत्यादि.
आज दुनिया टेक्नोपोलर विश्व की ओर जा रही है. इसमें एआइ, साइबर सुरक्षा और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की बड़ी भूमिका है. अभी जो पश्चिम एशिया का संकट है, उसका असर विकासशील देशों पर सबसे ज्यादा पड़ रहा है और पड़ने वाला है. इन्हीं सब को देखते हुए कदम उठाये जा रहे हैं. सेमीकंडक्टर चेन में कुछ देशों का एकाधिकार था. पर वैश्विक दक्षिण के देश इस क्षेत्र में अपनी बढ़त स्थापित कर रहे हैं और अपनी साझेदारी बढ़ा रहे हैं. वैश्विक उत्तर तथा वैश्विक दक्षिण में जो डिजिटल गैप है, उसे मिटाने की जरूरत है.
जी-20 सम्मेलन में भी भारत ने ये बातें मजबूती से रखी थीं. संवाद के पहले दिन जलवायु न्याय, नवीकरणीय ऊर्जा आदि पर बात हुई, दूसरे दिन बढ़ती तकनीकी प्रतिस्पर्धा, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, क्रिटिकल मिनरल्स, एआइ, डिजिटल गैप भरने आदि पर चर्चा हुई, तो तीसरे दिन हिंद-प्रशांत, हिंद महासागर, अरब सागर, भूमध्यसागर की सुरक्षा आदि पर बात हुई. इस बार के डायलॉग में विज्ञान और प्रौद्योगिकी को विदेश नीति के साथ एकीकृत करने के लिए एक नया ढांचा शुरू किया गया, जिसमें एआइ शासन, सेमीकंडक्टर आपूर्ति शृंखलाओं तथा विकासशील देशों हेतु भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर विशेष ध्यान देने की बात कही गयी.
संवाद में एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के उदय को स्वीकार किया गया, जिसमें ग्लोबल साउथ भविष्य की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. वर्तमान भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को दर्शाने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की प्रबल मांग की गयी, जिसमें भारत की स्थायी सदस्यता के लिए बढ़ता समर्थन भी शामिल है. फिनलैंड के राष्ट्रपति का कहना था कि संयुक्त राष्ट्र में सुधार जरूरी है और भारत संयुक्त राष्ट्र में स्थायी सदस्यता के लिए सबसे ज्यादा डिजर्व करता है. ऐसे ही, हिंद महासागर, लाल सागर और हिंद-प्रशांत में बढ़ते तनाव के बीच वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं, समुद्र के नीचे संचार केबलों तथा समुद्री मार्गों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान देने की बात कही गयी.
ईरान और पश्चिम एशिया में तनाव के बीच विदेश मंत्री जयशंकर ने ईरान के विदेश मंत्री से मुलाकात की. एक सत्र में बोलते हुए विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने कहा कि वैश्विक विकास वित्तपोषण नीति में सुधार की आवश्यकता है. संवाद के अंतिम दिन विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा कि भारत का उत्थान दूसरों की गलतियों से नहीं, इसकी अपनी शक्तियों से निर्धारित होगा. इस संवाद में सेशेल्स, मॉरीशस तथा श्रीलंका के विदेश मत्रियों और ऑस्ट्रेलिया के पूर्व विदेश मंत्री ने हिंद महासागर के भविष्य पर अपने विचार रखे. वक्ताओं ने कहा कि हिंद महासागर के देशों को भारत के विकास से लाभ होगा, और भारत के साथ काम करने वाले देशों को और भी अधिक फायदा होगा. प्रधानमंत्री की आर्थिक परिषद के सदस्य संजीव सान्याल और नीति विशेषज्ञ ने भारत की नौसैनिक रणनीति, तकनीकी क्षमताओं और क्षेत्र में बदलते सुरक्षा परिदृश्य पर बात की. उन्होंने कहा कि भारत को मजबूत समुद्री चेतना विकसित करनी होगी.
यह भी कहा कि भारत को अपनी प्राचीन समुद्री परंपराओं से फिर जुड़ना चाहिए और उन्हें आधुनिक तकनीक तथा रणनीति के साथ जोड़कर हिंद-प्रशांत में अपने हितों की रक्षा करनी चाहिए. इस चर्चा में साफ हुआ कि वैश्विक व्यापार मार्गों, ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय भू-राजनीति के समुद्र की ओर बढ़ते रुझान के बीच भारत के लिए समुद्री शक्ति कितनी महत्वपूर्ण हो गयी है. ऑस्ट्रेलिया ने रायसीना डायलॉग की सराहना करते हुए इसे शानदार बताया है, और यही इसका महत्व बताने के लिए काफी है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
