बिहारी गौरव के लिए डॉ सच्चिदानंद सिन्हा ने चलाया था अभियान, तब जाकर फिर से गठित हुआ था बिहार राज्य

History of Bihar : 1912 में जब बंगाल प्रेसीडेंसी से बिहार को अलग करके एक स्वतंत्र राज्य बना दिया गया, तो बिहारी अस्मिता की जीत हुई थी, लेकिन इस अस्मिता को जीवित करने और बिहार को एक बार फिर गौरवशाली इतिहास से जोड़ने के लिए प्रबुद्ध बिहारियों ने काफी प्रयास किया. बिहारी अस्मिता की रक्षा और उसके पुनर्जागरण के लिए डॉ सच्चिदानंद सिन्हा के नेतृत्व में बिहार के एलीट क्लास ने अहम भूमिका निभाई. इस एलीट क्लास में कायस्थों और मुसलमानों की भूमिका बहुत उल्लेखनीय है.

History of Bihar : बिहार यानी मगध का इतिहास काफी समृद्धशाली रहा है, लेकिन कालांतर में कई ऐसी घटनाएं हुईं, जिसने बिहार को दबा कुचला राज्य बना दिया. स्थिति इतनी खराब हो गई कि बिहार का अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व ही नहीं बचा और यह बंगाल प्रेसीडेंसी का हिस्सा बनकर रहा गया, जहां बिहारियों और बिहार के संसाधनों का महज दुरुपयोग हुआ. उस दौर में डॉ सच्चिदानंद सिन्हा हुए जिन्होंने बिहारी अस्मिता की लड़ाई लड़ी और बिहारी गौरव को जगाकर बिहार को राज्य का दर्जा वापस दिलाया.

कौन थे डॉ सच्चिदानंद सिन्हा

डॉ सच्चिदानंद सिन्हा का जन्म ब्रिटिश राज्य में बिहार के शाहाबाद जिले में हुआ था. अब शाहाबाद जिला अस्तित्व में नहीं है, अब उनका गांव बिहार के बक्सर जिले में आता है. डॉ सच्चिदानंद सिन्हा ने काफी उम्र में लंदन का रुख किया और वहां से वकालत की पढ़ाई करके लौटे. उन्होंने 10 साल तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय में वकालत की प्रैक्टिस की थी, उसके बाद वे ब्रिटिश शासन में 1921 में बिहार के कानून मंत्री भी रहे थे. डॉ सच्चिदानंद सिन्हा के पिता बख्शी शिव प्रताप सिन्हा डुमरांव महाराज के तहसीलदार थे. उन्हें भारत की संविधान सभा का प्रथम अध्यक्ष होने का गौरव भी प्राप्त है.

बिहार को बंगाल प्रेसीडेंसी से अलग करने की जरूरत क्यों पड़ी?

बिहार राज्य की प्राचीन काल से अपनी पहचान रही है और यहां की भाषा, संस्कृति भी काफी समृद्ध है. ब्रिटिश काल में बिहार को बंगाल प्रेसीडेंसी का हिस्सा बना दिया गया, जिसकी वजह से बिहार की अपनी पहचान और संस्कृति सबकुछ समाप्त हो गई. इस संबंध में बात करते हुए Bihar Institute of Public Finance and Policy के प्रोफेसर और प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डॉ बख्शी अमित कुमार सिन्हा ने कहा कि बंगाल प्रेसीडेंसी से बिहार को अलग करने की मांग इसलिए उठी क्योंकि बंगाल प्रेसीडेंसी में प्रोडक्शन पर परमानेंट सेटलमेंट लागू था. परमानेंट सेटलमेंट का अर्थ यह था कि राजस्व तय कर दिया गया था. इसका अर्थ यह था कि फसल चाहे जैसी भी हो, किसानों को एक तय रकम कर के रूप में जमींदारों के जरिए ब्रिटिश सरकार को देनी पड़ती थी. इसका परिणाम यह हुआ कि ब्रिटिश सरकार को तो एक तय रकम मिलने लगी और जमींदारों को भी भूमि का स्थायी अधिकार मिल गया, लेकिन किसान बेहाल हो गए. उन्हें किसी भी कीमत पर निर्धारित कर चुकाना पड़ता था. इससे किसानों के अंदर रोष फैल गया था. बिहार अलग राज्य की मांग की दूसरी सबसे बड़ी वजह यह थी कि बंगाल प्रेसीडेंसी में जो कुछ भी विकास हो रहा था वह बंगाल केंद्रित था, इसमें कोलकाता पर फोकस था. बिहार में विकास की रोशनी नहीं पहुंच पा रही थी और बिहार का इलाका पिछड़ता जा रहा था, गरीबी बढ़ रही थी. तीसरी वजह यह थी कि उच्च पदों पर सिर्फ बंगालियों की ही नियुक्ति होती थी, बिहारियों को वहां भागीदारी ना के बराबर मिलता था और अगर मिलता भी था, तो वह काफी कम था. इसकी वजह यह थी कि बिहार में शिक्षा का अभाव था. उच्च शिक्षा के कोई भी संस्थान बिहार में नहीं थे.

डॉ सच्चिदानंद सिन्हा बिहार अलग राज्य के लिए बिहारी अस्मिता को जगाया

डॉ सच्चिदानंद सिन्हा जो एक पढ़े-लिखे बिहारी थे और उनके अंदर बिहारी अस्मिता को जगाकर रखने की भावना थी. उन्होंने यह महसूस किया कि बंगाल प्रेसीडेंसी का हिस्सा बनने से बिहारियों का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त होता जा रहा है. बिहारियों को ना तो विकास में हिस्सेदारी मिल रही है और ना ही उनकी भाषा और संस्कृति सुरक्षित बच रही है. तब उन्होंने बिहारी पहचान बिहारी अस्मिता की बात उठाई, जिसका समर्थन उस समय के शिक्षित परिवारों ने किया. बिहार अलग राज्य के आंदोलन में जिन्होंने उनका बढ़-चढ़कर साथ दिया, उनमें प्रमुख थे महेश नारायण, रायबहादुर कृष्ण सहाय और किशोरीलाल. डॉ बख्शी अमित कुमार सिन्हा बताते हैं कि The Partition of Bengal or the Separation
of Behar? इस पुस्तक को डॉ सच्चिदानंद सिन्हा और महेश नारायण ने तब लिखा जब बंगाल विभाजन की बात हो रही थी. इस पुस्तक को एक तरह से बिहार को बंगाल प्रेसीडेंसी से अलग करने की बौद्धिक नींव कहा जा सकता है. इस पुस्तक में यह बताया गया है कि बंगाल के साथ बिहार को रखने पर प्रशासनिक परेशानियां आती हैं और प्रदेश का विकास नहीं हो पा रहा है. उन्होंने यह बताया कि बिहार को बंगाल से अलग करना केवल राजनीतिक रूप से उचित नहीं, बल्कि यह ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से भी आवश्यक था इसके पीछे उन्होंने यह तर्क दिया कि दोनों प्रदेशों की संस्कृति में अंतर है. भाषाई भिन्नता है और बंगाल प्रेसीडेंसी का हिस्सा होने की वजह से बिहार पिछड़ता जा रहा है. इस पुस्तक पर इंग्लैंड में भी चर्चा हुई. डॉ सच्चिदानंद सिन्हा ने इस बात पर जोर दिया कि बिहार के विकास के लिए यह जरूरी है कि उसका एक स्वतंत्र अस्तित्व हो. डॉ सच्चिदानंद सिन्हा के प्रयासों को उस वक्त के अखबारों का भी सहयोग मिला.

डॉ सच्चिदानंद सिन्हा के आंदोलन को इमाम ब्रदर्स ने भी दिया भरपूर सहयोग

डॉ सच्चिदानंद सिन्हा ने बिहार अलग राज्य के गठन को लेकर जो आंदोलन चलाया उसे समाज के पढ़े-लिखे लोगों का भरपूर साथ मिला. बिहार के पढ़े-लिखे मुसलमान भी इसमें आगे आए और आंदोलन को विभिन्न तरीकों से समर्थन दिया. इसमें इमाम ब्रदर्स का नाम सबसे प्रमुख है, जिन्होंने आंदोलन का पूरा साथ दिया. इमाम ब्रदर्स सर अली इमाम और इमाम हसन ने ब्रिटिश सरकार को भेजे जाने वाले हर पत्र और ज्ञापन में साइन करके आंदोलन को अपना समर्थन दिया. इतना ही नहीं इन दोनों भाइयों ने उर्दू अखबारों के जरिए भी आंदोलन को समर्थन दिया और बिहारी अस्मिता की रक्षा के लिए लोगों को जागरूक किया. इन्होंने हरसंभव यह कोशिश की कि बिहार अलग राज्य के आंदोलन को समाज के हर वर्ग का समर्थन मिले और इसमें मुसलमान कहीं से भी पीछे ना रहें.

Also Read : कानूनन क्या होगी बच्चे की जाति अगर माता-पिता अलग जाति के हैं और परिस्थितियां कुछ इस तरह की हैं…

क्या आप जानते हैं बिहार राज्य का नाम बिहार कब पड़ा? यहां पढ़ें पूरी कहानी

Magadha Empire : सुनिए मगध की कहानी, एक था राजा बिम्बिसार जिसने साम्राज्य विस्तार के लिए वैवाहिक गठबंधन किया

Magadha Empire : अजातशत्रु के बेटे उदयिन ने की थी पटालिपुत्र की स्थापना, लेकिन अन्य शासक निकले नाकाबिल

History of Munda Tribes 2 : मगध से झारखंड की ओर साथ आए थे मुंडा और संताल

Lalit Narayan Mishra Assassination : बिहार की राजनीति में हुई सबसे रहस्यमयी हत्या, जिसका सच अबतक नहीं आया सामने!

विभिन्न विषयों पर एक्सप्लेनर पढ़ने के लिए क्लिक करें

प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी

लेखक के बारे में

By Rajneesh anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

Read More
ePaper

अपने दैनिक समाचार अनुभव को और बेहतरीन बनाएं

सिर्फ ₹399 ₹149

एक साल के लिए

आज ही सब्सक्राइब करें

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >