क्या थी दिल्ली सरकार की शराब नीति, जिसने अरविंद केजरीवाल को पहुंचाया था जेल, अब हुए बरी

Arvind Kejriwal :  शराब घोटाला से जुड़े मनी लाॅड्रिंग मामले में दिल्ली के पूर्व सीएम अरविंद केजरीवाल की ईडी ने 21 मार्च 2024 को गिरफ्तारी की थी. उस वक्त यह मामला खासा चर्चा में था, क्योंकि अरविंद केजरीवाल ने गिरफ्तारी के बाद भी इस्तीफा नहीं दिया था और एक तरह से जेल से ही सरकार चला रहे थे. उस वक्त विपक्ष में रही बीजेपी ने इस मामले को खूब उठाया था और इसे भ्रष्टाचार का बड़ा मामला बताया था. केजरीवाल की छवि को इस घोटाले से बहुत नुकसान हुआ और अगर यह कहा जाए कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में उन्हें जो हार मिली उसमें इस घोटाले की बड़ी भूमिका थी, तो गलत नहीं होगा. उसी शराब घोटाले के चार्टशीट पर संज्ञान लेने से दिल्ली की एक अदालत ने मना कर दिया और मामले के सभी 23 आरोपियों को बरी कर दिया है.

Arvind Kejriwal : दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट ने शुक्रवार को शराब घोटाला मामले में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया सहित सभी 23 आरोपियों को बरी कर दिया. सभी आरोपियों को बरी करते हुए कोर्ट ने कहा कि सीबीआई ने जो चार्टशीट दाखिल की है उसमें कई कमियां हैं. इसी वजह से कोर्ट ने सीबीआई के चार्टशीट पर संज्ञान लेने से मना कर दिया. कोर्ट ने कहा कि चार्टशीट में जो बातें कही गई हैं, उनसे सबूतों का मेल नहीं बैठता है.

कोर्ट द्वारा क्लीन चिट मिलने के बाद अरविंद केजरीवाल मीडिया के सामने फफक कर रो पड़े और कहा कि मैं भ्रष्ट नहीं हूं मैं और मेरी पार्टी आम आदमी पार्टी कट्टर ईमानदार है. उन्होंने कहा कि शराब घोटाले में हमारा नाम आना एक राजनीतिक साजिश थी. आइए समझते हैं क्या था पूरा मामला और कोर्ट ने क्यों सभी आरोपियों को बरी कर दिया…

क्या थी दिल्ली की नयी शराब नीति जिसपर हुआ था बवाल ?

साल 2021–22 में दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार राजस्व में वृद्धि के  लिए नयी शराब नीति  लेकर आई थी. इस नीति के तहत सरकार ने खुदरा शराब की बिक्री का पूरी तरह से निजीकरण कर दिया था और निजी कंपनियों को लाइसेंस देकर राजस्व जुटाने की पहल की गई थी.

इस नयी शराब नीति का उद्देश्य शराब बिक्री में सरकारी दखल कम करना, निजी दुकानों को बढ़ावा देना, राजस्व की वृद्धि और अवैध शराब की बिक्री को बंद करना था. इस नीति के तहत सरकारी शराब दुकानों को बंद कर दिया गया और दिल्ली शहर को जोन में बांटकर निजी कंपनियों को लाइसेंस दिया गया. इसके साथ ही सरकार ने यह अनुमति दी कि दुकानदार छूट और ऑफर दे सकते हैं.

सरकार पर क्या लगे आरोप?

अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसौदिया

दिल्ली तत्कालीन एलजी वीके सक्सेना ने अरविंद केजरीवाल सरकार की नयी शराब नीति पर सवाल उठाए थे और जांच के आदेश दिए थे, जिसके बाद सीबीआई ने मामले की जांच शुरू की थी और बाद में इस घोटाले की जांच में ईडी भी शामिल हुआ था. जांच में यह बात सामने आयी कि कुछ शराब व्यापारियों को लाइसेंस देने के लिए नियम बदले गए और उसके बदले में उनसे रिश्वत लिया गया.

जांच एजेंसियों ने यह आरोप लगाया कि रिश्वत लेने के लिए कई शर्तों में भी ढील दी गई थी. अरविंद केजरीवाल की सरकार पर यह आरोप लगा कि हवाला और शेल कंपनियों (नकली कंपनियां, जो सिर्फ कागजों पर चलती हैं) के जरिए पैसों का लेन–देन हुआ और पैसे का हस्तांतरण किया गया. एक साउथ ग्रुप के जरिए बड़े पैमाने पर पैसे देने का आरोप भी लगा.

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किसके खिलाफ हुई कार्रवाई?

शराब घोटाला के सामने आने के बाद विपक्ष हमलावर हो गया और अरविंद केजरीवाल से इस मामले में जिम्मेदारी तय करने को कहा. जांच के दौरान सबसे पहले उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया की गिरफ्तारी हुई क्योंकि आबकारी विभाग उनके ही पास था. इस केस में मनी लाॅड्रिंग के मामले में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी हुई और उनपर यह आरोप लगा कि लाइसेंस देने के दौरान जो रिश्वत की लेन–देन हुई उसमें सिसौदिया और केजरीवाल दोनों की भूमिका थी. इनके अलावा भी कई और लोगों पर इस पूरे मामले में शामिल होने का आरोप लगा जिनकी कुल संख्या 23 थी. शराब नीति को लेकर जब विवाद बढ़ा, तो सरकार ने 2022 में ही इसे रद्द कर दिया था, लेकिन तबतक मामला बहुत तूल पकड़ चुका था.

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लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

राजनीति,सामाजिक, इतिहास, खेल और महिला संबंधी विषयों पर गहन लेखन किया है. तथ्यपरक रिपोर्टिंग और विश्लेषणात्मक लेखन में रुचि. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक. IM4Change, झारखंड सरकार तथा सेव द चिल्ड्रन के फेलो के रूप में कार्य किया है. पत्रकारिता के प्रति जुनून है. प्रिंट एवं डिजिटल मीडिया में 20 वर्षों से अधिक का अनुभव.

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