मिथिलेश झा
Europe Heat Dome Crisis: जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और ग्लोबल वार्मिंग के चलते पूरी दुनिया इस समय मौसम के विनाशकारी रूप का सामना कर रही है. क्लाइमामीटर (Climameter) के नवीनतम रिसर्च के अनुसार, जून के आखिरी हफ्तों में यूरोप को झुलसाने वाली अभूतपूर्व हीटवेव (लू) ने महाद्वीप के 32.7 करोड़ (327 मिलियन) लोगों और 15.6 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर (1484.66 लाख करोड़ रुपए) की संपत्ति (Assets) को सीधे तौर पर खतरे में डाल दिया.
सबसे खतरनाक गर्मी की चपेट में 26.4 करोड़ लोग
रिपोर्ट का भयावह पहलू यह है कि इस कुल आबादी में से 81 प्रतिशत यानी 26.4 करोड़ लोग और 86 प्रतिशत संपत्ति सबसे खतरनाक श्रेणी की गर्मी की चपेट में रहे. आंकड़ों की गंभीरता को इस तरह समझा जा सकता है कि यदि इस सिंगल हीटवेव की सबसे चरम श्रेणी से प्रभावित 26.4 करोड़ लोगों को मिलाकर एक नया देश बना दिया जाए, तो वह भारत, चीन, अमेरिका और इंडोनेशिया के बाद दुनिया का पांचवां सबसे अधिक आबादी वाला देश बन जाएगा. दूसरे शब्दों में, यह आबादी पश्चिमी यूरोप के सबसे बड़े शहर पेरिस की कुल जनसंख्या से 23 गुना अधिक है.
‘ब्लॉकिंग एंटी-साइक्लोन’ बना विलेन
क्लाइमामीटर के वैज्ञानिकों ने अपने शोध में पाया कि मौजूदा हीटवेव के दौरान यूरोप का तापमान 1950-1987 के कालखंड की तुलना में कम से कम 2.5 डिग्री सेंटीग्रेड अधिक गर्म दर्ज किया गया. विशेषज्ञों के मुताबिक, इस अत्यधिक गर्मी के पीछे एक दुर्लभ मौसम संबंधी परिस्थिति जिम्मेदार है, जिसे ब्लॉकिंग एंटी-साइक्लोन (Blocking Anti-Cyclone) कहा जाता है.
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हीट डोम का निर्माण करता है एंटी-साइक्लोन
यह एंटी-साइक्लोन एक जगह स्थिर होकर एक विशाल ‘हीट डोम’ (Heat Dome) का निर्माण करता है, जो पहले से ही गर्म चल रहे तापमान में ईंधन का काम करता है. चिंता की बात यह है कि वर्तमान जलवायु परिवर्तन के कारण ये ब्लॉकिंग एंटी-साइक्लोन अब पर्यावरण में बहुत अधिक समय तक टिके रहते हैं, जिसके चलते यूरोप में अत्यधिक लू (Extreme Heat) अब अतीत की तुलना में कहीं अधिक लंबी अवधि तक खिंच रही है.
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45 डिग्री तक पहुंच सकता है पारा : विशेषज्ञ
लाइपजिग विश्वविद्यालय (University of Leipzig) के प्रसिद्ध जलवायु वैज्ञानिक डॉ कार्सन हॉस्टीन ने इस शोध के आधार पर यूरोप के भविष्य को लेकर बेहद डरावनी तस्वीर पेश की है. उन्होंने कहा कि जर्मनी इस हीटवेव के अंतिम दिन अत्यधिक तापमान की मार से सिर्फ इसलिए बच गया, क्योंकि गर्म हवाएं अनुमान से कुछ घंटे पहले ही आगे बढ़ गयीं.
इसकी वजह से वहां 41.7 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान रिकॉर्ड किया गया. अन्यथा यह आसानी से 43 डिग्री सेंटीग्रेड हो सकता था. याद रहे कि मौसम विज्ञान के अनुसार गर्मी का चरम (Climatological Maximum Warmth) अभी एक महीने बाद (जुलाई के अंत में) आना बाकी है. ऐसे में मुमकिन है कि सबसे खराब स्थिति में जर्मनी का तापमान 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाए.
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फ्रांस ने पहले ही चख लिया 44 डिग्री का स्वाद
डॉ हॉस्टीन ने इसके समर्थन में तथ्य देते हुए कहा कि फ्रांस ने इस हीटवेव के दौरान पहले ही 44 डिग्री के पार का आंकड़ा देख लिया है. यदि जुलाई के अंत में यह ‘हीट डोम’ थोड़ा और पूर्व की तरफ केंद्रित होता है, तो न केवल जर्मनी बल्कि पश्चिमी पोलैंड भी 45 डिग्री सेल्सियस की भीषण आग में झुलस सकता है, क्योंकि जर्मनी का नया सर्वकालिक रिकॉर्ड (41.7 डिग्री सेंटीग्रेड) ठीक पोलैंड की सीमा पर बना है. डॉ हॉस्टीन के मुताबिक, अब यह सवाल नहीं है कि ऐसा होगा या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि यह कब होगा.
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70 हजार से अधिक लोगों के मारे जाने की आशंका
इस भयानक गर्मी का मानवीय पहलू बेहद दुखद है. डॉ कार्सन हॉस्टीन ने चेतावनी दी है कि पिछले 2 हफ्तों की इस भीषण गर्मी ने न केवल हजारों, बल्कि संभवतः हजारों लोगों की जान ले ली है. उन्होंने अंदेशा जताया कि जब इस हीटवेव के वास्तविक आंकड़े सामने आयेंगे, तो कुल मौतों का आंकड़ा यूरोप की वर्ष 2003 की हीटवेव (जिसमें 70,000 से अधिक लोग मारे गये थे) के रिकॉर्ड को भी पार कर जायेगा. लेकिन इस बार और वर्ष 2003 में सबसे बड़ा अंतर यह है कि इन मौतों के लिए सीधे तौर पर इंसानों द्वारा जलाया जा रहा जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) जिम्मेदार है.
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