यूरोप पर ‘हीट डोम’ का कहर : खतरे में 32.7 करोड़ आबादी और 1484.66 लाख करोड़ की संपत्ति, जर्मनी-पोलैंड में 45 डिग्री तापमान का अलर्ट

Europe Heat Dome Crisis: यूरोप में 32.7 करोड़ लोग और 1484.66 लाख करोड़ रुपए (15.6 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर) की संपत्ति ‘हीट डोम’ की चपेट में आ गयी है. जर्मनी और पोलैंड में तापमौन 45 डिग्री सेंटीग्रेड पहुंच जाने की आशंका है, जो वर्ष 2003 की त्रासदी का रिकॉर्ड तोड़ सकती है.

मिथिलेश झा

Europe Heat Dome Crisis: जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और ग्लोबल वार्मिंग के चलते पूरी दुनिया इस समय मौसम के विनाशकारी रूप का सामना कर रही है. क्लाइमामीटर (Climameter) के नवीनतम रिसर्च के अनुसार, जून के आखिरी हफ्तों में यूरोप को झुलसाने वाली अभूतपूर्व हीटवेव (लू) ने महाद्वीप के 32.7 करोड़ (327 मिलियन) लोगों और 15.6 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर (1484.66 लाख करोड़ रुपए) की संपत्ति (Assets) को सीधे तौर पर खतरे में डाल दिया.

सबसे खतरनाक गर्मी की चपेट में 26.4 करोड़ लोग

रिपोर्ट का भयावह पहलू यह है कि इस कुल आबादी में से 81 प्रतिशत यानी 26.4 करोड़ लोग और 86 प्रतिशत संपत्ति सबसे खतरनाक श्रेणी की गर्मी की चपेट में रहे. आंकड़ों की गंभीरता को इस तरह समझा जा सकता है कि यदि इस सिंगल हीटवेव की सबसे चरम श्रेणी से प्रभावित 26.4 करोड़ लोगों को मिलाकर एक नया देश बना दिया जाए, तो वह भारत, चीन, अमेरिका और इंडोनेशिया के बाद दुनिया का पांचवां सबसे अधिक आबादी वाला देश बन जाएगा. दूसरे शब्दों में, यह आबादी पश्चिमी यूरोप के सबसे बड़े शहर पेरिस की कुल जनसंख्या से 23 गुना अधिक है.

‘ब्लॉकिंग एंटी-साइक्लोन’ बना विलेन

क्लाइमामीटर के वैज्ञानिकों ने अपने शोध में पाया कि मौजूदा हीटवेव के दौरान यूरोप का तापमान 1950-1987 के कालखंड की तुलना में कम से कम 2.5 डिग्री सेंटीग्रेड अधिक गर्म दर्ज किया गया. विशेषज्ञों के मुताबिक, इस अत्यधिक गर्मी के पीछे एक दुर्लभ मौसम संबंधी परिस्थिति जिम्मेदार है, जिसे ब्लॉकिंग एंटी-साइक्लोन (Blocking Anti-Cyclone) कहा जाता है.

इसे भी पढ़ें : पृथ्वी के विनाश का कारण बन रही अमेरिकी सेना, 140 देशों से ज्यादा प्रदूषण फैलाता है पेंटागन : डॉक्युमेंट्री

हीट डोम का निर्माण करता है एंटी-साइक्लोन

यह एंटी-साइक्लोन एक जगह स्थिर होकर एक विशाल ‘हीट डोम’ (Heat Dome) का निर्माण करता है, जो पहले से ही गर्म चल रहे तापमान में ईंधन का काम करता है. चिंता की बात यह है कि वर्तमान जलवायु परिवर्तन के कारण ये ब्लॉकिंग एंटी-साइक्लोन अब पर्यावरण में बहुत अधिक समय तक टिके रहते हैं, जिसके चलते यूरोप में अत्यधिक लू (Extreme Heat) अब अतीत की तुलना में कहीं अधिक लंबी अवधि तक खिंच रही है.

इसे भी पढ़ें : जलवायु परिवर्तन से लड़ने पर खर्च होगा बंगाल बजट का 69 प्रतिशत पैसा, सुंदरवन और सौर ऊर्जा पर बड़ा ऐलान

45 डिग्री तक पहुंच सकता है पारा : विशेषज्ञ

लाइपजिग विश्वविद्यालय (University of Leipzig) के प्रसिद्ध जलवायु वैज्ञानिक डॉ कार्सन हॉस्टीन ने इस शोध के आधार पर यूरोप के भविष्य को लेकर बेहद डरावनी तस्वीर पेश की है. उन्होंने कहा कि जर्मनी इस हीटवेव के अंतिम दिन अत्यधिक तापमान की मार से सिर्फ इसलिए बच गया, क्योंकि गर्म हवाएं अनुमान से कुछ घंटे पहले ही आगे बढ़ गयीं.

इसकी वजह से वहां 41.7 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान रिकॉर्ड किया गया. अन्यथा यह आसानी से 43 डिग्री सेंटीग्रेड हो सकता था. याद रहे कि मौसम विज्ञान के अनुसार गर्मी का चरम (Climatological Maximum Warmth) अभी एक महीने बाद (जुलाई के अंत में) आना बाकी है. ऐसे में मुमकिन है कि सबसे खराब स्थिति में जर्मनी का तापमान 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाए.

इसे भी पढ़ें : 2030 तक 100% EV पार्ट्स बनाने लगेगा भारत, चुंबक और चिप के लिए चीन-ताइवान का ही सहारा

फ्रांस ने पहले ही चख लिया 44 डिग्री का स्वाद

डॉ हॉस्टीन ने इसके समर्थन में तथ्य देते हुए कहा कि फ्रांस ने इस हीटवेव के दौरान पहले ही 44 डिग्री के पार का आंकड़ा देख लिया है. यदि जुलाई के अंत में यह ‘हीट डोम’ थोड़ा और पूर्व की तरफ केंद्रित होता है, तो न केवल जर्मनी बल्कि पश्चिमी पोलैंड भी 45 डिग्री सेल्सियस की भीषण आग में झुलस सकता है, क्योंकि जर्मनी का नया सर्वकालिक रिकॉर्ड (41.7 डिग्री सेंटीग्रेड) ठीक पोलैंड की सीमा पर बना है. डॉ हॉस्टीन के मुताबिक, अब यह सवाल नहीं है कि ऐसा होगा या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि यह कब होगा.

इसे भी पढ़ें : क्लाइमेट चेंज से रोटी पर संकट, रात की गर्मी से खतरे में खाद्य सुरक्षा

70 हजार से अधिक लोगों के मारे जाने की आशंका

इस भयानक गर्मी का मानवीय पहलू बेहद दुखद है. डॉ कार्सन हॉस्टीन ने चेतावनी दी है कि पिछले 2 हफ्तों की इस भीषण गर्मी ने न केवल हजारों, बल्कि संभवतः हजारों लोगों की जान ले ली है. उन्होंने अंदेशा जताया कि जब इस हीटवेव के वास्तविक आंकड़े सामने आयेंगे, तो कुल मौतों का आंकड़ा यूरोप की वर्ष 2003 की हीटवेव (जिसमें 70,000 से अधिक लोग मारे गये थे) के रिकॉर्ड को भी पार कर जायेगा. लेकिन इस बार और वर्ष 2003 में सबसे बड़ा अंतर यह है कि इन मौतों के लिए सीधे तौर पर इंसानों द्वारा जलाया जा रहा जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) जिम्मेदार है.

इसे भी पढ़ें

बंगाल में तेजी से बदल रहा मौसम, साइलेंट किलर बना ह्यूमिड हीट, घर का तापमान 32 डिग्री सेंटीग्रेड

फीफा वर्ल्ड कप पर जलवायु परिवर्तन की मार : 4 जुलाई के वीकेंड से पहले नॉर्थ अमेरिका में लू, 5 गुणा बढ़ी गर्मी

Save River: संकट में झारखंड के जलस्रोत, सूख जाती हैं 196 में से 141 नदियों की जलधारा

हर दिन 100 गरीबों का पेट भरने वाली काजुली विश्वास की कहानी, जानें कैसे बनीं बंगाल की ‘अन्नपूर्णा’

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

Published by: Mithilesh Jha

मिथिलेश झा PrabhatKhabar.com में पश्चिम बंगाल राज्य प्रमुख (State Head) के रूप में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार हैं. उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 32 वर्षों से अधिक का व्यापक अनुभव है. उनकी रिपोर्टिंग राजनीति, सामाजिक मुद्दों, जलवायु परिवर्तन, नवीकरणीय ऊर्जा, कृषि और अन्य समसामयिक विषयों पर केंद्रित रही है, जिससे वे क्षेत्रीय पत्रकारिता में एक विश्वसनीय और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित हुए हैं. अनुभव : पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार में 3 दशक से अधिक काम करने का अनुभव है. वर्तमान भूमिका : प्रभात खबर डिजिटल (prabhatkhabar.com) में पश्चिम बंगाल के स्टेट हेड की भूमिका में हैं. वे डिजिटल न्यूज कवर करते हैं. तथ्यात्मक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता को प्राथमिकता देते हैं. वर्तमान में बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 पर पूरी तरह से फोकस्ड हैं. भौगोलिक विशेषज्ञता : उनकी रिपोर्टिंग का मुख्य फोकस पश्चिम बंगाल रहा है, साथ ही उन्होंने झारखंड और छत्तीसगढ़ की भी लंबे समय तक ग्राउंड-लेवल रिपोर्टिंग की है, जो उनकी क्षेत्रीय समझ और अनुभव को दर्शाता है. मुख्य विशेषज्ञता (Core Beats) : उनकी पत्रकारिता निम्नलिखित महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्रों में गहरी विशेषज्ञता को दर्शाती है :- राज्य राजनीति और शासन : झारखंड और पश्चिम बंगाल की राज्य की राजनीति, सरकारी नीतियों, प्रशासनिक निर्णयों और राजनीतिक घटनाक्रमों पर निरंतर और विश्लेषणात्मक कवरेज. सामाजिक मुद्दे : आम जनता से जुड़े सामाजिक मुद्दों, जनकल्याण और जमीनी समस्याओं पर केंद्रित रिपोर्टिंग. जलवायु परिवर्तन और नवीकरणीय ऊर्जा : पर्यावरणीय चुनौतियों, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और रिन्यूएबल एनर्जी पहलों पर डेटा आधारित और फील्ड रिपोर्टिंग. डाटा स्टोरीज और ग्राउंड रिपोर्टिंग : डेटा आधारित खबरें और जमीनी रिपोर्टिंग उनकी पत्रकारिता की पहचान रही है. विश्वसनीयता का आधार (Credibility Signal) : तीन दशकों से अधिक की निरंतर रिपोर्टिंग, विशेष और दीर्घकालिक कवरेज का अनुभव तथा तथ्यपरक पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्धता ने मिथिलेश झा को पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत के लिए एक भरोसेमंद और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित किया है.
और पढ़ें

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >