Kartavya Path: दिल्ली के दिल में बसा कर्तव्य पथ गणतंत्र दिवस के उत्सव का मुख्य केंद्र है, जहां से भव्य परेड निकलती है. इसे गणतंत्र दिवस की धड़कन भी कहा जा सकता है. यह मार्ग पहले राजपथ के नाम से प्रसिद्ध था. राष्ट्रपति भवन से शुरू होकर इंडिया गेट तक फैला यह करीब तीन किलोमीटर लंबा क्षेत्र, विजय चौक के साथ अपनी खास पहचान रखता है. यहीं राष्ट्रपति परेड की सलामी ग्रहण करते हैं और यहीं देश की सैन्य शक्ति का प्रदर्शन होता है. वर्ष 1911 में जब देश की राजधानी कोलकाता से दिल्ली स्थानांतरित की गयी, तब दिल्ली के ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए इस मार्ग का निर्माण हुआ.
स्वतंत्रता के बाद इसे राजपथ कहा गया, पर 2022 में सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना के तहत इसे कर्तव्य पथ नाम दिया गया. इस बदलाव का उद्देश्य ‘राज’ की जगह ‘कर्तव्य’ पर जोर देना था, जो राष्ट्र के प्रति दायित्व, सेवा और समर्पण की भावना को मजबूती से व्यक्त करता है. इसकी वास्तुकला भी अनुपम है. पूर्व-पश्चिम दिशा में फैला यह मार्ग दोनों तरफ हरे-भरे लॉन, पेड़ों की कतारों और रायसीना हिल से उतरते हुए विजय चौक तक जाता है, जहां नॉर्थ और साउथ ब्लॉक जैसे ऐतिहासिक भवन स्थित हैं. गणतंत्र दिवस परेड में कर्तव्य पथ का महत्व अतुलनीय है. छब्बीस जनवरी, 1950 को पहली परेड नेशनल स्टेडियम में आयोजित हुई थी. इसे 1951 से कर्तव्य पथ पर स्थानांतरित कर दिया गया. तब से गणतंत्र दिवस परेड का यह अहम हिस्सा बना हुआ है.
नयी दिल्ली की खासमखास इमारतों के डिजाइनरों की चर्चा तो होती रहती है, पर किसी को उस व्यक्ति का नाम तक याद नहीं रहता, जिसकी देखरेख में राजस्थान और उत्तर प्रदेश के श्रमिकों ने कर्तव्य पथ समेत नयी दिल्ली की चौड़ी-चौड़ी सुंदर सड़कों का निर्माण किया था. उस व्यक्तित्व का नाम था सरदार नारायण सिंह. जब नयी दिल्ली की प्रमुख इमारतों का निर्माण शुरू हुआ, तब देश के प्रमुख ठेकेदारों से संपर्क किया गया और सब ने सड़क बनाने के लिए अपने-अपने दावे पेश किये. उनमें से सरदार नारायण सिंह के दावे को सही माना गया. उस समय के लिहाज से उन्होंने नयी दिल्ली को बेजोड़ सड़कें दीं. तब सड़कों के नीचे भारी पत्थर डाले जाते थे. फिर रोड़ी और चारकोल से सड़कें बनायी जाती थीं, पर बीते करीब डेढ़ दशक से कर्तव्य पथ पर बिटुमिनस तकनीक से सड़कें बन रही हैं. इस तकनीक से सड़कें सस्ती और टिकाऊ बनती हैं. गणतंत्र दिवस परेड में घोड़े, हाथी, मोटरसाइकिल, सेना के ट्रक से लेकर भारी-भरकम टैंक तक निकलते हैं, पर मजाल है कि कर्तव्य पथ को कोई नुकसान हो. यह सब बिटुमिनस तकनीक की वजह से संभव होता है.
पहले परेड का रूट लंबा था, पर 13 दिसंबर, 2001 को संसद पर हुए आतंकी हमले के बाद 2002 की गणतंत्र दिवस परेड के रूट को सरकार ने बदल दिया. इस तरह परेड का रूट छोटा हो गया. तब से परेड इंडिया गेट से आइटीओ, दरियागंज होते हुए लाल किले पर समाप्त होने लगी. रूट बदले जाने से पहले परेड इंडिया गेट होते हुए कस्तूरबा गांधी मार्ग का रुख कर लेती थी. वहां से परेड कनॉट प्लेस के आउटर सर्किल का पूरा चक्कर लगाने के बाद मिंटो रोड, थॉमसन रोड, अजमेरी गेट होते हुए लाल किले पर समाप्त होती थी. इस दौरान सारे रूटों पर हजारों लोग भोर से ही जगह लेकर बैठ जाते थे.
सारे रूट पर देशभक्ति के गीत सुनाई देते. कई जगह तो परेड का आंखों देखा हाल भी सुनाया जाता था. जब परेड कनॉट प्लेस में होती, तो उत्सव जैसा माहौल बन जाता था. कदम से कदम मिलाकर चल रहे सेना और अर्धसैनिक बलों के दस्तों का दर्शक तालियां बजाकर स्वागत करते. कनॉट प्लेस आते-आते परेड में भाग लेने वाले जवान कुछ रीलैक्स भी होने लगते और दर्शकों का मुस्करा कर अभिवादन करते. परेड सिर्फ सड़कों पर बैठकर ही नहीं देखी जाती थी. कनॉट प्लेस की छतों पर भी इतने लोग मौजूद होते थे कि तिल रखने की जगह नहीं बचती थी.
कनॉट प्लेस के प्राचीन हनुमान मंदिर के महंत सुरेश शर्मा याद करते हुए बताते हैं कि लोग दिल्ली पुलिस के दस्ते और दिल्ली की झांकी का सर्वाधिक गर्मजोशी से स्वागत करते थे. परेड में जब बालवीर पुरस्कार विजेता निकलते, तो उन्हें देख लोगों के चेहरे खिल उठते थे. उस दौर में सिक्योरिटी भी कोई बहुत सख्त नहीं होती थी. तब सारे कनॉट प्लेस में स्वयंसेवी संस्थाओं की तरफ से मुफ्त जलपान की व्यवस्था हुआ करती थी. अब वर्तमान की बात. गणतंत्र दिवस के बाद कर्तव्य पथ पर ही 29 जनवरी को बीटिंग रिट्रीट समारोह होता है. कर्तव्य पथ का महत्व एक मार्ग होने तक सीमित नहीं है, यह प्रतीकात्मक रूप से आजाद भारत की यात्रा को दर्शाती है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
