आजादी की लड़ाई के विलक्षण नायक थे सुभाषचंद्र बोस

Subhash Chandra Bose: नेताजी सुभाष चंद्र बोस की लड़ाई भले ही अधूरी रही हो, लेकिन हर जगह उन्होंने अपनी स्वतंत्र पहचान बनायी. देश की आजादी के बाद जब-जब सुदृढ़ नेतृत्व की बात चली, तो लोगों को नेताजी सुभाषचंद्र बोस की याद आयी. यही सुभाषचंद्र बोस की लोकप्रियता और उनकी प्रासंगिकता के बारे में बताने के लिए काफी है.

सुब्रत मुखर्जी, सेवानिवृत्त प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय

Subhash Chandra Bose: वर्ष 1897 में आज ही के दिन कटक में पैदा हुए सुभाष चंद्र बोस आजादी की लड़ाई के बहुचर्चित सेनानी थे, जिन्होंने कांग्रेस पार्टी में भी अपना अमूल्य योगदान दिया. मैट्रिक की परीक्षा में तत्कालीन कलकत्ता प्रांत में सर्वोच्च स्थान पाने वाले और इंग्लैंड में प्रतिष्ठित आइसीएस परीक्षा में चौथे स्थान पर रहने वाले सुभाष चंद्र बोस बेहद प्रतिभाशाली थे. अगर देश की तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों के कारण उन्हें अपना उज्ज्वल भविष्य छोड़ कर आजादी की लड़ाई में न कूदना पड़ता, तो कहना मुश्किल है कि उनके जीवन की दिशा किस तरफ जाती. लेकिन उनकी प्रतिभा और तेजस्विता को देखते हुए यह तो तय है कि वह जिस भी क्षेत्र में रहते, वहां अपनी अलग पहचान बनाने में सफल रहते.

उन्नीसवीं शताब्दी में भारत के राजनीतिक विमर्श में सामाजिक बुराइयों को दूर करने पर जोर दिया जा रहा था. राजा राममोहन राय सामाजिक बुराइयों के उन्मूलन के पक्ष में थे. लेकिन 1885 में कांग्रेस के गठन के बाद भारतीयों में राजनीतिक चेतना ने जोर पकड़ा. पंडित बालगंगाधर तिलक पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने सामाजिक बुराइयां दूर करने के बजाय आजादी की लड़ाई को प्राथमिकता दी. वह देश में व्याप्त सामाजिक बुराइयों से भलीभांति अवगत थे और यह भी जानते थे कि अगर इनके उन्मूलन पर जोर दिया गया, तो आजादी की लड़ाई पीछे छूट जाएगी. तिलक का बहुचर्चित नारा था, ‘स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है.’ वर्ष 1927 तक कांग्रेस ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका की तरह भारत को भी डोमिनियन स्टेट की मान्यता देने की अंग्रेजों से मांग कर रही थी.

डॉ भीमराव आंबेडकर भी इससे सहमत थे, क्योंकि इसमें वंचित समुदायों के हितों की चिंता थी. वर्ष 1928 में कोलकाता में आयोजित कांग्रेस के सत्र में सुभाष चंद्र बोस ने डोमिनियन स्टेट पर बनी सहमति पर सवाल उठाते हुए देश की आजादी की मांग की तथा ब्रिटिश डोमिनियन स्टेट से संबंध तोड़ लेने के लिए कहा. उनका कहना था कि ब्रिटिशों की यह व्यवस्था साम्राज्यवादी है, जिसमें एक नस्ल को दूसरी नस्ल से श्रेष्ठ समझा जाता है. जवाहरलाल नेहरू ने सुभाष चंद्र बोस के रवैये से सहमति जतायी. लेकिन महात्मा गांधी अब भी डोमिनियन स्टेट के पक्ष में थे. हालांकि उन्होंने कहा कि डोमिनियन स्टेट और स्वतंत्रता में तुलना करना गलत होगा, क्योंकि डोमिनियन स्टेट में अपमान का भाव जुड़ा है, जबकि आजादी का मतलब है विजय.

मार्च, 1939 में सुभाष चंद्र बोस जब कांग्रेस के अध्यक्ष बने, तब उन्होंने महात्मा गांधी को लिखी एक चिट्ठी में कहा कि पूर्ण स्वराज्य के लिए अंग्रेजों पर दबाव बनाने का समय आ गया है. उल्लेखनीय है कि जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस ने 31 दिसंबर, 1929 और एक जनवरी, 1930 को लाहौर में रावी नदी के तट पर पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव किया था. नेताजी का मानना था कि अंतराष्ट्रीय संकट के कारण भारत के सामने यह अवसर आया है कि वह आजादी प्राप्त करने के लिए ब्रिटिश शासक पर दबाव डाले. हालांकि महात्मा गांधी ने उनका प्रस्ताव खारिज कर दिया, क्योंकि उनका मानना था कि जन आंदोलन के लिए यह उपयुक्त समय नहीं है. हालांकि 1940 की गर्मियों में लिनलिथगो ने दूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद भारत को डोमिनियन स्टेट का दर्जा देने का प्रस्ताव रखा. लेकिन गांधी ने उसे खारिज करते हुए कहा कि अब आजादी के सिवा कुछ भी मंजूर नहीं है. बाद में नेताजी ने कांग्रेस छोड़ी और फॉरवर्ड ब्लॉक बनाया. लेकिन गतानुगतिक राजनीति के लिए वह नहीं बने थे, इसलिए ब्रिटिश साम्राज्यवाद से बड़ी लड़ाई लड़ने के अभियान में देश से बाहर निकले. वर्ष 1943 में सिंगापुर में उन्होंने आजाद हिंद सेना का गठन किया. लेकिन एक विमान दुर्घटना ने उन्हें हमसे छीन लिया.

नेताजी सुभाष चंद्र बोस की लड़ाई भले ही अधूरी रही हो, लेकिन हर जगह उन्होंने अपनी स्वतंत्र पहचान बनायी. इतिहासकारों ने कांग्रेस में सुभाष बनाम महात्मा गांधी और सुभाष बनाम नेहरू की असहमतियों के बारे में बताया है. वास्तविक अर्थों में सुभाष के दोनों से ही अच्छे संबंध थे. लेकिन स्वतंत्रचेता सुभाष की कार्यशैली अलग थी. आजाद हिंद सेना का गठन उनका एक बहुत बड़ा कदम था, और भारत से बाहर रहते हुए भी भारतीयों में उनकी लोकप्रियता असीम थी. यह भी आकस्मिक नहीं है कि देश की आजादी के बाद जब-जब सुदृढ़ नेतृत्व की बात चली, तो लोगों को नेताजी सुभाषचंद्र बोस की याद आयी. यही सुभाषचंद्र बोस की लोकप्रियता और उनकी प्रासंगिकता के बारे में बताने के लिए काफी है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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