भारत को अपनी डिजिटल संपदा की रक्षा करनी होगी

इतिहास गवाह है कि जो देश केवल कच्चे माल का निर्यात करते हैं, वे कभी मूल्य शृंखला के शीर्ष पर नहीं पहुंचते. लिहाजा, यदि विदेशी कंपनियां हमारे डेटा से स्वयं को शक्तिशाली बनाकर वही तकनीक हमें बेचती हैं, तो इससे एक गंभीर आर्थिक विषमता पैदा होगी. यह एक प्रकार का ‘डिजिटल उपनिवेशवाद’ है. इससे पहले कि हमारे हाथों से फिसल जाए, हमें अपनी डिजिटल संपदा की रक्षा करनी होगी.

पिछले कई महीनों से भारतीय डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर एक शांत, पर खतरनाक पैटर्न उभर रहा है. हमारे प्रमुख पोर्टलों पर अचानक चीनी आइपी एड्रेस से ट्रैफिक में भारी उछाल देखा गया है. यह व्यवहार किसी सामान्य यूजर का नहीं, बल्कि ‘ऑटोमेटेड डाटा स्क्रैपिंग’ का है. जब इन रास्तों को ब्लॉक किया जाता है, तो यही ट्रैफिक सिंगापुर और अन्य वैश्विक क्लाउड नोड्स के माध्यम से फिर से लौट आता है. यह कोई रैंडम प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक अत्यंत संगठित और औद्योगिक स्तर की डाटा माइनिंग है. यह संकेत है कि भारत का डिजिटल इकोसिस्टम बिना किसी स्पष्ट लाभ के, वैश्विक एआइ की दौड़ को ईंधन दे रहा है. आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मुख्य रूप से तीन स्तंभों पर टिका है : कंप्यूटिंग शक्ति, प्रतिभा और डाटा. कंप्यूट खरीदा जा सकता है और प्रतिभाओं को काम पर रखा जा सकता है, लेकिन डाटा वह बुनियादी तत्व है, जिसे लगातार ‘हार्वेस्ट’ करना पड़ता है.

‘स्टैनफोर्ड एआइ इंडेक्स रिपोर्ट, 2024’ स्पष्ट करती है कि जहां अमेरिका मॉडल बनाने में आगे है, वहीं चीन एआइ पेटेंट में, पर असली युद्ध डाटा के नियंत्रण का है. एआइ मॉडल्स अब स्थिर नहीं हैं, उन्हें हर पल अपडेट किया जाना आवश्यक है. वे नये व्यवहार और भाषाई लहजे को सीख रहे हैं. जो देश इन डाटा पाइपलाइनों को सुरक्षित कर लेते हैं, वे एआइ की रेस में आगे निकल रहे हैं, जबकि विदेशी प्रणालियों पर निर्भर देश रणनीतिक रूप से पिछड़ रहे हैं. भारत इस मामले में दुनिया की सबसे बड़ी ‘डाटा रिफाइनरी’ है. हमारे पास यूपीआइ के करोड़ों ट्रांजैक्शन, आधार से जुड़ी सेवाएं और ग्रामीण भारत का डिजिटल डाटा है. जितनी डाटा विविधता भारत के पास है, उतनी शायद ही किसी अन्य राष्ट्र के पास हो.

हमारी 22 आधिकारिक भाषाएं एआइ के लिए अतुलनीय खजाना हैं. इसके बावजूद, भारत के पास अभी तक अपना कोई विशाल ‘सॉवरेन फ्रंटियर मॉडल’ नहीं है. परिणामस्वरूप, हमारी अधिकांश कंपनियां और सरकारी विभाग विदेशी एआइ मॉडलों के भरोसे हैं. यहीं पर अर्थशास्त्र और भू-राजनीति का खतरनाक मेल दिखता है. एआइ की लागत आज सबसे बड़ा कारक है. जहां अमेरिकी कंपनियों के फ्लैगशिप मॉडल महंगे हैं, वहीं चीन की एआइ फर्में, अपने मॉडलों को बहुत ही कम कीमतों पर उतार रही हैं. सार्वजनिक रिपोर्ट बताती हैं कि चीनी एआइ मॉडलों का उपयोग अमेरिकी मॉडलों की तुलना में कई गुना सस्ता है. उभरते बाजारों में कंपनियां केवल तकनीकी श्रेष्ठता नहीं, किफायत देखती हैं. समय के साथ, यह ‘सस्ती विदेशी बुद्धि’ हमारे पूरे सिस्टम का आधार बन जायेगी.

इस गणना में हम एक रणनीतिक चूक कर रहे हैं. एआइ अब केवल एक सॉफ्टवेयर टूल नहीं, भविष्य का ‘कॉग्निटिव इंफ्रास्ट्रक्चर’ (संज्ञानात्मक बुनियादी ढांचा) है. यह तकनीक क्रेडिट स्कोरिंग, बीमा पॉलिसी, कृषि परामर्श और चिकित्सा निदान तक को नियंत्रित करेगी. यदि इस बुनियादी ढांचे की ‘बुद्धि’ विदेशी स्वामित्व वाली है, तो हमारे समाज के महत्वपूर्ण निर्णय लेने वाले एल्गोरिदम भी विदेशी हितों से प्रभावित होंगे. यह एक प्रकार का ‘डिजिटल उपनिवेशवाद’ है, जहां भारत अपना कच्चा माल (डाटा) मुफ्त दे रहा है और बदले में तैयार माल (एआइ मॉडल) किराये पर ले रहा है. इतिहास गवाह है कि जो देश केवल कच्चे माल का निर्यात करते हैं, वे कभी मूल्य शृंखला के शीर्ष पर नहीं पहुंचते.

यदि विदेशी कंपनियां हमारे डाटा से स्वयं को शक्तिशाली बनाकर वही तकनीक हमें बेचती हैं, तो यह एक गंभीर आर्थिक विषमता पैदा करेगा. भारत की घरेलू क्षमताएं इस निर्भरता के बोझ तले दम तोड़ देंगी. भारत सरकार ने ‘इंडिया एआइ मिशन’ के माध्यम से इस खतरे को पहचाना है. कंप्यूटिंग शक्ति के लिए फंड का आवंटन सही दिशा में कदम है, परंतु तकनीकी प्रगति की गति घातीय (एक्सपोनेंशियल) है. एआइ इकोसिस्टम बहुत जल्दी ‘लॉक-इन’ हो जाते हैं. एक बार जब कोई डेवलपर किसी विदेशी एपीआइ के इर्द-गिर्द अपना पूरा वर्कफ्लो तैयार कर लेता है, तो उसे बदलना लगभग असंभव होता है. नेटवर्क प्रभाव स्थापित होने के बाद नये खिलाड़ियों के लिए रास्ता बनाना कठिन होता है.

आज भारत के सामने दो स्पष्ट विकल्प हैं. पहला, अल्पकालिक लागत पर ध्यान दें, विदेशी एआइ का उपभोग जारी रखें और अपनी बुद्धि को आउटसोर्स कर दें. दूसरा, एआइ को एक ‘संप्रभु क्षमता’ के रूप में देखें. इसके लिए हमें राष्ट्रीय स्तर के कंप्यूट क्लस्टर्स बनाने होंगे और डाटा स्क्रैपिंग के लिए कड़े कानून लाने होंगे. हमें स्थानीय संदर्भों में प्रशिक्षित फाउंडेशन मॉडलों के विकास के लिए निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के बीच सहयोग स्थापित करना होगा. हालिया डाटा माइनिंग की घटनाएं चेतावनी है, वैश्विक ताकतें हमारे डाटा की कीमत हमसे बेहतर समझ रही हैं. आने वाली सदी उन राष्ट्रों की होगी जो डाटा से ‘बुद्धि’ का निर्माण करते हैं. भारत को अब यह तय करना है कि वह भविष्य के एआइ युग में निर्माता बनेगा या केवल एक ग्राहक. लंबे समय में, जो राष्ट्र अपनी ‘बुद्धि’ किराये पर लेते हैं, वे अंततः अपनी रणनीतिक स्वायत्तता भी खो देते हैं. इससे पहले कि हमारे हाथों से फिसल जाए, हमें अपनी डिजिटल संपदा की रक्षा करनी होगी. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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