रवीन्द्र त्रिपाठी, फिल्म समीक्षक
भारत के संविधान ने देश की स्त्रियों को कई ऐसे लोकतांत्रिक अधिकार दिये हैं, जो पहले उनके पास नहीं थे. नारीवाद जैसी धारणा भी पिछले कई बरसों में बलवती होती गयी है, जो पितृसत्तात्मक सत्ता को चुनौती देती रही है. पर इसका अर्थ यह नहीं है कि आज के भारत में महिलाएं पूरी तरह सुरक्षित हैं. कुछ मामलों में वे पहले से ज्यादा वेध्य और असुरक्षित होती जा रही हैं. अनुभव सिन्हा की नयी फिल्म ‘अस्सी’ इसी की कथा है. हालांकि यह सिर्फ विषय की वजह से हमें नहीं झकझोरती, बल्कि अपनी कलात्मक विशिष्टताओं के कारण भी इसमें ऐसी उत्कृष्टताएं आ गयी हैं, जो हाल की बहुत कम फिल्मों में दिखी हैं. हमारे शहर, खासकर बड़े महानगर, किस प्रकार गाड़ियों की बहुतायत से लगातार आत्मिक स्तर पर कुचले जा रहे हैं और उनमें संवेदनहीनता बढ़ती जा रही है, उसे भी यह रेखांकित करती है.
कहानी शुरू होती है परिमा (कनी कुस्रुती) से, जो एक स्कूल में पढ़ाती है. उसके दो बच्चे हैं, एक बेटी और एक बेटा. पति (जीशान अयूब) एक डिपार्टमेंटल स्टोर में काम करता है. उसका मित्र कार्तिक (कुमुद मिश्रा) भी उसके साथ ही काम करता है. कार्तिक की पत्नी का निधन हो चुका है और वह अपनी बीमार पत्नी को देखने भी नहीं गया था. एक दिन परिमा जब रात में घर लौट रही होती है, तब एक बड़ी कार में सवार कुछ युवक उसे उठा लेते हैं और उसके साथ दुष्कर्म करते हैं. इसके बाद शुरू होते हैं वे तमाम झमेले, जो इस तरह की पीड़िताओं के साथ होते रहे हैं.
यानी पीड़िता को न्याय मिलने में बाधाएं- पुलिस ठीक से तहकीकात नहीं करती, जिस गाड़ी में चोरी होती है, उसे पहले ही चोरी की गयी बता दिया जाता है, थाने से सीसीटीवी फुटेज या तो गायब हो जाते हैं या कह दिया जाता है कि बंदरों ने तार काट दिये थे आदि. पीड़ित महिला को अदालत में फिर से त्रासद प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है, क्योंकि वहां गवाही, यानी क्रॉस एग्जामिनेशन के दौरान उससे ऐसे-ऐसे सवाल पूछे जाते हैं, जिनसे वह अपराध ही संदिग्ध हो जाये, जो पीड़िता के साथ हुआ.
एक और समानांतर धारा भी इस फिल्म में है, और वह है ‘विजिलांते न्याय’ (कानून अपने हाथ में लेने की) की, जिसमें आरोपियों और अपराधियों की हत्या की जाती है. कार्तिक पांच में से उन दो अपराधियों की हत्या कर देता है, जो दुष्कर्म की प्रक्रिया में शामिल रहने के आरोपी थे. उसे छतरी वाला कहा जाता है, क्योंकि हत्या के दौरान वह छतरी लगाये रखता है, जिसके चलते उसका चेहरा छिपा रहता है और सीसीटीवी फुटेज में उसकी पहचान स्थापित नहीं हो पाती. पर सोशल मीडिया पर उसकी बड़ी फैन फॉलोइंग बन जाती है. पर क्या इस तरह का ‘विजिलांते न्याय’ वाजिब है? परिमा की वकील बनी तापसी पन्नू इसके खिलाफ है और वह कानून के माध्यम से न्याय पाने की पक्षधर है.
कार्तिक उसकी मृत बहन का पति है. वैसे फिल्मकार ने यहां यह पहलू भी जोड़ा है कि कार्तिक की पत्नी भी एक कार दुर्घटना में घायल हुई थी और अपराधी पकड़े नहीं गये थे. इस तरह उसका अपना एक निजी एजेंडा भी है. आखिर में वह अपने गुनाह कबूल करता है, पर अदालत से बाहर निकलते ही उस लड़के के पिता द्वारा मारा जाता है, जिसकी हत्या उसने की है. यानी, ‘विजिलांते न्याय’ का सिलसिला चलता रहता है.
फिल्म में बार-बार यह बताया गया है कि भारत में हर बीस मिनट पर किसी न किसी हिस्से में किसी महिला या लड़की के साथ दुष्कर्म होता है और बहुत कम को न्याय मिल पाता है, सारे संवैधानिक प्रावधानों और कानून होने के बावजूद. विडंबना यह है कि पीड़िता को ही लांछित किया जाता है, उसका ही मजाक उड़ाया जाता है. जिस स्कूल में परिमा पढ़ाती है, वहां के कम उम्र के लड़के ही व्हाट्सएप ग्रुप बनाकर उसके बारे में भद्दी-भद्दी टिप्पणियां करते हैं और उनका मजा लेते हैं. स्कूल प्रशासन चाहते हुए भी परिमा का साथ नहीं दे पाता. अर्थात, समाज में हर स्तर पर संवेदनहीनता भी बढ़ी है और सोशल मीडिया ने भी इसे विस्तारित ही किया है. ‘अस्सी’ कई अहम सवाल उठाती है, पर उनका कोई ठोस और माकूल जवाब नहीं है.
