चीनी निवेश को मंजूरी में सावधानी जरूरी, पढ़ें डॉ अश्विनी महाजन का आलेख

सरकार ने चीन से आने वाले निवेश पर बंदिशों में ढील दे दी है. जबकि गलवान घाटी में हुई हिंसा के बाद 2020 में प्रेस नोट-3 के जरिये चीनी निवेश पर रोक लगायी गयी थी. इस कारण चीन से निवेश धीमा हो गया. अब बताया जा रहा है कि निवेश पर अंकुश हटाने से देश में मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में निवेश बढ़ेगा, जिससे उत्पादन, रोजगार और निर्यात बढ़ेंगे तथा स्टार्ट-अप को ज्यादा वित्त उपलब्ध होगा. लेकिन चीन चूंकि आक्रामक व्यापारिक नीतियों के जरिये दूसरे देशों के बाजार पर कब्जा कर लेता है और उनकी कंपनियों का अधिग्रहण कर लेता है, ऐसे में, संवेदनशील क्षेत्रों में चीनी निवेश पर नजर रखनी होगी.

Chinese Investment: सरकार ने चीन से आने वाले निवेश पर बंदिशों में ढील दे दी है. नीति आयोग की सिफारिशें चीनी निवेश पर रोक हटाने का सबसे बड़ा कारण बनी. नीति आयोग ने दो विकल्प सरकार के सामने रखे. पहला कि प्रेस नोट-3 को निरस्त कर दिया जाये और चीन से निवेश पूर्व की भांति बहाल किया जाये. और दूसरा विकल्प यह दिया कि चूंकि 2020 के बाद चीनी निवेश पर बंदिशें लगाने के कारण प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्रभावित हुआ है, इसलिए किसी भी भारतीय कंपनी में 24 प्रतिशत तक हिस्सेदारी वाले निवेश पर बिना किसी अनुमति के निवेश खोल दिया जाना चाहिए. आयोग का यह कहना है कि चीन की बीवाइडी नाम की कंपनी द्वारा कार मैन्युफैक्चरिंग के संयुक्त उपक्रम में एक अरब डॉलर के निवेश का प्रस्ताव इन नियमों के कारण निरस्त हुआ. चीन के निवेश पर लगी रोक से दक्षिण एशियाई देशों से एफडीआइ बहुत कम हो गया.

एक अन्य महत्वपूर्ण थिंकटैंक आइसीआरआइइआर (इक्रियर) ने भी चीन से निवेश को बढ़ावा देने की सिफारिश की. इक्रियर ने तो डिफेंस, टेलीकॉम, इंफ्रास्ट्रक्चर और उभरती टेक्नोलॉजी को छोड़कर सभी गैर संवदेनशील मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र के लिए 49 प्रतिशत तक के पूंजी निवेश को अनुमति देने की सिफारिश की थी. हालांकि इक्रियर ने यह भी कहा कि चीनी निवेश को बढ़ावा देने के साथ प्रवेश से पूर्व जांच, संस्थागत सुरक्षा, स्वीकृति के बाद नियमत: सुरक्षा, विदेशी स्वामित्व की एक केंद्रीकृत रजिस्ट्री, आवश्यक प्रौद्योगिकी हस्तांतरण तथा समय-समय पर अनुपालन के स्वतंत्र ऑडिट सरीखी शर्तों के साथ यह अनुमति दी जानी चाहिए. विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय की व्यवस्था की सिफारिश भी इक्रियर ने की.

गौरतलब है कि 2020 के प्रेस नोट-3 के तहत चीन सहित पड़ोसी देशों से निवेश के लिए सरकारी मंजूरी अनिवार्य कर दी गयी थी. उसमें बनाये गये नियमों के तहत चीन, बांग्लादेश, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, म्यांमार और अफगानिस्तान जैसे पड़ोसी देशों की विदेशी कंपनियों को भारत में निवेश करने के लिए अभी तक पहले सरकारी मंजूरी लेनी पड़ती थी. इसमें यह भी प्रावधान था कि चाहे निवेश किसी भी अन्य देश के माध्यम से आया हो, पर यदि इसका लाभकारी स्वामित्व इन पड़ोसी देशों में स्थित हो, तो भी पूर्व सरकारी मंजूरी का यह प्रावधान लागू होता है. उससे पहले देश में अधिकांश क्षेत्रों से विदेशी निवेश स्वचालित मार्ग से आता था. जून, 2020 में गलवान की हिंसक झड़प की पृष्ठभूमि में लाये गये प्रेस नोट-3 का उद्देश्य ही चीनी निवेश के रास्ते में रोक लगाना था.

इन बंदिशों के कारण अप्रैल, 2020 से दिसंबर, 2025 के बीच चीन से एफडीआइ भारत में आने वाली कुल एफडीआइ का मात्र 0.32 फीसदी, यानी 2.51 अरब डॉलर रहा. पर इस दौरान चीन से बढ़ते आयातों के चलते चीन के साथ व्यापार घाटा लगातार बढ़ते हुए 2024-25 में 99.2 अरब डॉलर तक पहुंच गया. प्रेस नोट-3 के लागू होने से पहले भारत के स्टार्ट-अप में चीनी निवेशक बड़ी मात्रा में निवेश कर रहे थे. पर 2020 के बाद सरकारी मंजूरी की बाध्यता के कारण चीनी निवेश धीमा हो गया. इस दौरान चीन की इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों को न केवल नये ठेकों से बाहर किया गया, बल्कि जिन ठेकों के बारे में निर्णय लंबित था, उनसे भी चीन को बाहर किया गया. अब चूंकि सरकार ने चीनी निवेश के लिए स्वचालित मार्ग खोलने का निर्णय ले लिया है, ऐसे में, यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि भारत की अर्थव्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा और आत्मनिर्भरता पर इसका क्या असर हो सकता है.

समर्थकों का मानना है कि इससे देश में मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में निवेश बढ़ेगा, जिससे उत्पादन, रोजगार और निर्यात बढ़ेंगे. इससे स्टार्ट-अप को ज्यादा वित्त उपलब्ध होगा. देश में चीन की इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिक वाहन, सोलर पैनल और बैटरी टेक्नोलॉजी का हस्तांतरण संभव हो पायेगा. समझना होगा कि जब 2020 में चीनी निवेश पर रोक लगायी गयी थी, तब भी ये सब लाभ थे. लेकिन चाहे चीनी निवेश के समर्थक हों या विरोधी, इस बात से इत्तफाक रखते हैं कि लगभग सभी चीनी कंपनियां या तो सरकारी स्वामित्व में हैं या पूर्णतया सरकारी नियंत्रण में. इसलिए चीन का भारत में किसी भी तरह का प्रवेश राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा माना जा सकता है. जैसे- केमिकल, दवा, इलेक्ट्रिक कार उद्योग या इलेक्ट्रॉनिक्स- सभी में सुरक्षा का जोखिम है. इलेक्ट्रॉनिक्स और इलेक्ट्रिक कारों के माध्यम से डाटा की चोरी ही नहीं, देश में जासूसी करना भी आसान है. एग्रो केमिकल और दवा उद्योग के क्षेत्र में चीनी निवेश भारतीय कृषि और स्वास्थ्य के लिए खतरा बन सकता है. चीन एग्रोकेमिकल और बीज के क्षेत्र में सेंजेंटा सरीखी कंपनियों का अधिग्रहण कर पहले से ही एकाधिकार स्थापित कर चुका है. चीनी निवेश को अनुमति मिलने के बाद और अधिक भारतीय कंपनियों का चीनी अधिग्रहण की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता.

पूर्व में भी देश में चीनी निवेश के कारण वास्तविक मैन्युफैक्चरिंग के बजाय एसेंबलिंग को बढ़ावा मिला है. इसके कारण भारत स्वदेशी क्षमताओं के विकास के बजाय चीन के लिए एक एसेंबलिंग का आधार बनकर रह गया है. ऐसे में चीन द्वारा जरूरी कलपुर्जों, जैसे सेमीकंडक्टर, रेयर अर्थ मैटेरियल आदि की आपूर्ति बाधित होने से देश में मैन्युफैक्चरिंग की क्षमताएं ध्वस्त हो सकती हैं. चीनी टेक्नोलॉजी, पूंजी या कंपोनेंट्स पर अत्यधिक निर्भरता रणनीतिक स्वायतत्ता के लक्ष्य के विरुद्ध भी है. यह भी देखने में आ रहा है कि जिस-जिस क्षेत्र में मैन्युफैक्चरिंग में चीनी कंपनियों का दबदबा हो जाता है, वहां-वहां स्थानीय कंपनियां प्रतिस्पर्धा से बाहर हो जाती हैं.

चीन की बीवाइडी इलेक्ट्रिक कार कंपनी ने अमेरिका में टेस्ला कंपनी की वास्तविक बिक्री में 13 फीसदी की कमी कर दी है. यूरोप के 10 बड़े देशों में बीवाइडी की बिक्री एक ही साल (2025) में चार गुना हो चुकी है. ऐसे में, यूरोपीय संघ ने चीन से आ रहे इलेक्ट्रिक वाहनों के आयात पर सब्सिडी की जांच शुरू कर दी है. पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया में जापानी कारों का वर्चस्व समाप्त हो रहा है. ऐसे में, चीनी निवेश राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा होने के साथ देश के आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को भी प्रभावित कर सकता है. यही नहीं, विदेशी निवेश होने पर आगंतुक कंपनियां अपने मूल देश से कलपुर्जे मंगाती हैं, जिससे देश की निर्भरता आयातों पर और अधिक बढ़ जाती है. मैन्युफैक्चरिंग में चीनी निवेश बढ़ने से चीन से व्यापार घाटा, जो पहले ही 100 अरब डॉलर के आसपास है, और बढ़ सकता है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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By प्रो अश्विनी महाजन

प्रो अश्विनी महाजन is a contributor at Prabhat Khabar.

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