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कांग्रेस में सांगठनिक बदलाव के मायने

कांग्रेसी अंत:पुर से खबरें उड़कर आती रही हैं कि रणनीति को लेकर परिवार में एका नहीं है. सोनिया गांधी के चहेते नेताओं का अलग समूह है, तो राहुल और प्रियंका का अपना-अपना गुट है. जब पार्टी का प्रथम परिवार ही एक नहीं रह पायेगा, तो पूरी पार्टी में एका कैसे होगी ?

हालिया चुनावों में झटका खाने के बाद कांग्रेस में केंद्रीय स्तर पर फेरबदल होना तय था, लेकिन बड़े बड़े राजनीतिक पंडितों को भी उम्मीद नहीं थी कि पार्टी की तीसरी सबसे ताकतवर नेता प्रियंका गांधी को तकरीबन किनारे कर दिया जायेगा. बेशक मल्लिकार्जुन खरगे अध्यक्ष हैं, पर कांग्रेस में गांधी-नेहरू परिवार के सदस्यों की हैसियत छिपी नहीं है. ऐसे में अगर प्रियंका गांधी को दायित्व विहीन महासचिव बनाया जाना मामूली बात नहीं है. साल 2004 के आम चुनाव में राहुल गांधी जब संसदीय पारी शुरू कर रहे थे, तब कांग्रेस कार्यकर्ताओं का एक वर्ग निराश था. कांग्रेस से हमदर्दी रखने वाले आम वोटरों का भी एक वर्ग राहुल की शुरुआत को सहजता से स्वीकार नहीं कर पा रहा था. सबकी चाहत थी कि कांग्रेस में प्रियंका को सक्रिय किया जाना चाहिए था. देश का एक बड़ा वर्ग यह मान चुका था कि राजनीतिक समझ के लिहाज से प्रियंका अपने भाई की तुलना में बीस हैं. कुछ लोगों को यहां तक लगता था कि प्रियंका दूसरी इंदिरा गांधी हैं.

साल 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के ठीक पहले जब प्रियंका गांधी को राजनीति में सक्रिय किया गया, तो उन्हें एक बार फिर इंदिरा गांधी के प्रतिरूप के रूप में बताने-जताने की तैयारी हुई. कहना न होगा कि एक दौर में भाजपा भी प्रियंका के राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय होने की आशंका से किंचित सहम जाती थी. लेकिन उत्तर प्रदेश के नतीजों ने साफ कर दिया कि कांग्रेस का प्रियंका रूपी हथियार भी कारगर नहीं है. उत्तर प्रदेश में हाथरस बलात्कार कांड के बाद प्रियंका ने लड़ाका रूख जरूर अख्तियार किया. उनके सलाहकारों ने उनकी छवि गढ़ने के लिए शाब्दिक माहौल बनाने के लिए शानदार नारा भी गढ़ा- ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं.’ उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने राज्य को दो हिस्सों में बांट दो महासचिवों को जिम्मा दिया- पश्चिम में ज्योतिरादित्य सिंधिया और पूरब में प्रियंका गांधी. दिल्ली के चश्मे से देखने वाले वाम बौद्धिकों के साथ ही पत्रकारों के एक वर्ग ने प्रियंका को लेकर उम्मीदों का आसमान खड़ा कर दिया, लेकिन उत्तर प्रदेश ने उन्हें निराश किया. उसके बाद के चुनाव में हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस जीत गयी. हिमाचल की कमान कमोबेश प्रियंका ने ही संभाल रखी थी. इसलिए माना गया कि इस जीत की एक वजह प्रियंका भी रहीं.

प्रियंका ने एक तरह से पंजाब में भी चुनाव अभियान चलाया. वहां चुनाव से छह माह पहले चरणजीत सिंह चन्नी को दलित होने की वजह से कैप्टन अमरिंदर सिंह जैसे कद्दावर नेता को हटाकर मुख्यमंत्री बनाया गया. लेकिन प्रियंका का दलित दांव नहीं चला. पंजाब की सत्ता ऐसी उखड़ी कि उम्मीद भी नहीं की जा रही कि निकट भविष्य में कांग्रेस वहां वापसी कर सकती है. राजस्थान में सचिन पायलट उनके नजदीकी माने जाते रहे. लेकिन अशोक गहलोत के दांव के आगे उनकी नहीं चली. सचिन के ही अध्यक्ष रहते राजस्थान 2018 का चुनाव जीतने में कामयाब रही. पर जैसे ही राजस्थान में जीत मिली, अशोक गहलोत ने दिल्ली से जयपुर का रुख कर लिया और सत्ता पर काबिज होने में कामयाब रहे. जब सचिन ने बगावती रुख अख्तियार किया, तो प्रियंका उन्हें मनाने में कामयाब रहीं. राजस्थान में गहलोत से नाराज राहुल गांधी ने महज तीन सभाएं ही की, जबकि प्रियंका घूम-घूमकर प्रचार करती रहीं. लेकिन राजस्थान में भी प्रियंका कोई चमत्कार नहीं कर पायीं. छत्तीसगढ़ में अनौपचारिक रूप से कहा जाता था कि भूपेश बघेल से कुछ हासिल करना है, तो बेहतर है कि प्रियंका गांधी से संपर्क कर लो. वहां भी कांग्रेस को हार मिली. कांग्रेसी अंत:पुर से खबरें उड़कर आती रही हैं कि रणनीति को लेकर परिवार में एका नहीं है. सोनिया गांधी के चहेते नेताओं का अलग समूह है, तो राहुल और प्रियंका का अपना-अपना गुट है. जब पार्टी का प्रथम परिवार ही एक नहीं रह पायेगा, तो पूरी पार्टी में एका कैसे होगी ?

कांग्रेस में प्रियंका को बिना जिम्मेदारी का महासचिव बनाने का मतलब है कि पार्टी नेतृत्व को उनकी क्षमता पर भरोसा कम हो रहा है. पायलट को छत्तीसगढ़ का प्रभार देकर पार्टी ने यह जताने की कोशिश जरूर की है कि प्रियंका की पकड़ छत्तीसगढ़ पर बनी रहेगी. लेकिन इस फैसले का दूसरा पहलू भी है. सचिन को राजस्थान में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी से दूर कराकर गहलोत ने अपनी ताकत का परिचय दे दिया है. सोनिया गांधी के नजदीकी माने जाने वाले मोहन प्रकाश को बिहार का प्रभार देना और प्रियंका की जगह अविनाश पांडे को उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी देने का भी संदेश साफ है. मोहन प्रकाश जनता परिवार के पुराने नेता हैं. नीतीश उनके करीबी हैं. वे कभी लालू को मुख्यमंत्री बनवाने वाले गुट के सदस्य रहे. इसलिए माना जा रहा है कि उनके जरिये कांग्रेस बिहार में अपने लिए सीटें बढ़ाने की गुंजाइश खोजेगी. वहीं अविनाश पांडे को उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी का संकेत साफ है कि पार्टी अखिलेश को नाराज करने का जोखिम नहीं लेना चाहती. रमेश चेन्निथला को महाराष्ट्र और राहुल के नजदीकी जितेंद्र सिंह को असम और मध्य प्रदेश की कमान देने का संकेत है कि महत्वपूर्ण राज्यों पर राहुल की ही चलेगी.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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