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Saturday, March 2, 2024

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भारत के शक्तितत्व की प्राण-प्रतिष्ठा

अयोध्या में मंदिर नहीं, भारत राष्ट्र की स्मृति जागरण द्वारा नवीन राष्ट्रीय अभ्युदय के शक्ति स्रोत की प्राण प्रतिष्ठा हो रही है. हर काल में हिंदू का राष्ट्र और धर्म के समन्वय से युक्त जागरण कठिन और जटिल रहा है.

अयोध्या आते ही मणिराम दास छावनी के प्रमुख और राम मंदिर आंदोलन के महा सेनापति पूज्य महंत नृत्य गोपाल दास जी से मिला. वे पहचान गये. रामभद्राचार्य जी, पूज्य जयदेव राम जी, सालासर बालाजी के सिद्धेश्वर महाराज, सर्व कार्य प्रमुख चंपत राय और राम मंदिर तीर्थ क्षेत्र के प्रमुख संत पूज्य गोविंद गिरि जी महाराज से भी भेंट हुई. स्वामी गोविंद गिरि ने ठीक कहा- इस जन्मभूमि को लेने में हिंदुओं को पांच सौ साल इसलिए लगे क्योंकि हिंदू के मानस में राष्ट्र तथा धर्म का समन्वय नहीं था. शिवाजी के विरूद्ध औरंगजेब के लिए शिव भक्त मिर्जा राजा जय सिंह लड़े, शिवाजी के तेरह सगे-संबंधी उनके विरुद्ध मुगल सेना में थे. गत सौ वर्षों में पहली बार विवेकानंद तथा डॉ हेडगेवार ने देश के साथ धर्म का चैतन्य जागृत किया, तो राम मंदिर बना. अयोध्या का हर कोना सज गया है. हर कोने चौराहे पर मुफ्त चाय-भोजन के लंगर चल रहे हैं.

जिन लोगों ने राम जन्मभूमि का सत्य जानते हुए भी विरोध किया, उन्हें क्षमा याचना करनी चाहिए. अब स्मृति-जागृत भारत अपने मन और काया पर आघात नहीं सहेगा. स्मृति हर मनुष्य और राष्ट्र के जीवन हेतु अनिवार्य तत्व है. स्मृतिहीन देश या व्यक्ति शून्य होता है, भविष्यविहीन और दिशाहीन. अयोध्या में मंदिर नहीं, भारत राष्ट्र की स्मृति जागरण द्वारा नवीन राष्ट्रीय अभ्युदय के शक्ति स्रोत की प्राण प्रतिष्ठा हो रही है. हर काल में हिंदू का राष्ट्र और धर्म के समन्वय से युक्त जागरण कठिन और जटिल रहा है. ढाई हजार मील दूर अनुल्लेखनीय कस्बे गजनी से एक लुटेरा आता है, सर्वाधिक महत्वपूर्ण मंदिर तोड़ता है, इतनी बड़ी संख्या में हिंदू स्त्री व पुरुष दास बनाकर ले जाता है कि बगदाद में गुलामों का मूल्य गिर गया, लूट का सामान जाता है. मार्ग में सब हिंदू खड़े हुए? बस सुहेलदेव अपवाद हैं. कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने अपने जय सोमनाथ उपन्यास में उच्च ब्राह्मण कुलोत्पन्न शिव राशि के चरित्र का उल्लेख किया है, जो गजनवी को हिंदू संघ की परमार राजाओं के नेतृत्व में खड़ी सेनाओं से बचाकर सोमनाथ मंदिर ले आया था. चार सौ वर्ष गोवा पर क्रूर व अमानुषिक अत्याचारों के लिए कुख्यात पुर्तगालियों ने शासन किया. पणजी में आज भी एक खंभ है, जहां उन हिंदुओं के हाथ काटे जाते थे, जिनके घर पर तुलसी का पवित्र पौधा पूजित होता था.

उस भयानक काल से गुजर यदि आज हिंदू समाज धर्म और राष्ट्र से जुड़ा दिखता है, तो यह आठवां आश्चर्य है. हिंदुओं के एक वर्ग या बड़े आचार्यों या हिंदू नामधारी सेकुलरों के मंदिर विरोध में कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं है. गजनवी से पुर्तगालियों तक उनका देश एवं धर्म से विमुख एक स्वार्थी भाव रहा है, जिसे पिछली शताब्दी में लाल-बाल-पाल, विवेकानंद, अरविंद, दयानंद, सावरकर ने बदला और डॉ हेडगेवार ने उसे एक सैन्य अनुशासन में ढालने का असाधारण अभूतपूर्व कार्य किया. यह भारत की सुप्त विजिगीषु प्रवृत्ति, काल को परास्त करने वाली जिजीविषा और सांगठनिक शक्ति का ऐसा ऐतिहासिक प्रकटीकरण है, जो धरातल पर आदि शंकर के बाद या राजनीतिक स्तर पर राज राज चोल, कृष्णदेवराय, उससे पूर्व विक्रमादित्य, अशोक के बाद संभव हुआ नहीं. संपूर्ण विश्व में भारत की प्राचीन गौरवशाली धरोहर के प्रति नवीन चैतन्य उभरा है. अनगिनत पुस्तकें, भारत की विद्या, महापुरुषों की जीवनियों, प्राचीन नगरों, नदियों, तीर्थों, पर्यटन स्थलों, समुदायों, यहां तक कि पूर्वोत्तर में प्राचीन राम कथाओं के पुनःस्मरण-प्रकाशन का रेला दिख रहा है. विश्व नवीन आर्थिक व सैन्य शक्ति युक्त भारत की ओर सम्मान भाव से देख रहा है. यह अचानक जादू से नहीं हुआ. स्मृति जागरण पर्व उन अनाम-अजान संस्कृति वीरों, महापुरुषों, गुरुओं, त्यागराज, चैतन्य महाप्रभु, रामानंदाचार्य, आदि शंकर, गुरु गोविंद सिंह, गुरु तेग बहादुर, बंदा बहादुर के संचित तप, बलिदान, साधना, काला पानी में मर खप गये सेनानियों की सामूहिक अभीप्साओं का फल है.

यह भारत श्री अरविंद की उस भविष्यवाणी को सत्य सिद्ध कर रहा है कि विश्व को मार्गदर्शन देने वाले शक्तिशाली समर्थ भारत का उदय अवश्यंभावी है. विवेकानंद ने इस स्मृति जागरण अश्वमेध यज्ञ का आरंभ 11 सितंबर 1893 को शिकागो में कर दिया था. कार सेवकों ने अपने रक्त की आहुति से अयोध्या को जगा कर बलिदानी ऊष्मा से भारत ज्योति जलायी और भारतीय मानस में अवर्णनीय आत्मविश्वास आया. राजनेताओं को विनम्रतापूर्वक इस पुनर्जागरण पर्व का वंदन करना होगा. अयोध्या सशुल्क धर्मशालाओं, होटलों, विलासिता के धनी वर्ग और अर्द्ध साक्षर उच्चाधिकारियों के पानी की तरह बहाये पैसे से आप्लावित न होने पाए. नेताओं के अहंकार हूटर, सड़क बंद कराकर पूजा का दंभ यहां न दिखे. गरीब, दरिद्र, किसान, मजदूर, झोपड़ी वाले हिंदू ने अयोध्या की आत्मा बचायी. यहां कभी कोई भूखा नहीं सोया. हर आश्रम शरण स्थल बना रहा है. अब अचानक धन-वैभव फेंक कर उनको होटल व्यवसायीकरण की ओर धकेलने तथा गरीब भक्तों को अवांछनीय और धनियों को सुपात्र समझने वाली अयोध्या न बनने दें. सरकार संस्कृति कार्यों में अपनी भूमिका की नयी सीमा निर्धारित करे.

सोमनाथ से अयोध्या तक के पुनर्निर्माण का पथ भारत वर्ष के सामूहिक स्मृति जागरण का अविजेय, अमर्त्य, शत्रु हनन-सज्जन प्रतिपालक ज्योति पर्व है. अब से भारत एक नया मन, नया कलेवर धारण करने वाला है. अयोध्या में इस शक्ति के ऊर्जा केंद्र की प्राण-प्रतिष्ठा हो रही है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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