Rain And Snowfall: लगभग डेढ़ महीने हो गये हैं, कश्मीर से लेकर उत्तराखंड और दिल्ली से लेकर समूचे मैदानी इलाके में एक बूंद भी बरसात नहीं हुई. सूखी सर्दी ने जनजीवन, खेती-किसानी और पर्यावरण पर जो चोट पहुंचायी है, उसका असर दूरगामी होगा. सबसे बड़ी बात यह है कि जब तापमान और गर्मियों की अवधि में वृद्धि हो रही है, तब हिमालय के पहाड़ बर्फ न गिरने से भूरे दिख रहे हैं. हिमाचल में इस साल बर्फीले सूखे के हालात हैं. उत्तर-पश्चिमी हिमालय में इस बार सर्दियों में बर्फ का गिरना सामान्य से 45 से 75 फीसदी तक कम रहा और जनवरी तक ऊंचे इलाकों में बर्फ नहीं जमी. बढ़ते तापमान, कमजोर पश्चिमी विक्षोभ और ग्लोबल वार्मिंग से बर्फ तेजी से पिघल रही है. ठंड के बीते पांच मौसमों में बर्फबारी में 25 फीसदी की गिरावट आयी है.
कश्मीर का ‘चिल्लई कलां’, जो अपनी कठोर बर्फबारी और जमा देने वाली रातों के लिए जाना जाता है, इस बार वीरान है. इस साल कश्मीर घाटी में बर्फबारी में 75 से 80 फीसदी तक की गिरावट दर्ज की गयी है. गुलमर्ग और पहलगाम जैसे पर्यटन स्थल इस समय बर्फ से ढके रहते थे. इस बार वहां सूखी घास और नग्न पहाड़ दिखाई दे रहे हैं. यदि बर्फबारी का यह अकाल जारी रहा, तो गर्मियों में झेलम और सिंधु जैसी नदियों का जलस्तर रिकॉर्ड स्तर तक गिर सकता है. उत्तराखंड में शून्य बरसात से अधिकांश जिलों में सूखे की स्थिति है. हिमाचल प्रदेश में भी सामान्य से 97 फीसदी कम बारिश दर्ज की गयी. गेहूं, सरसों और चने जैसी फसलें अक्तूबर-दिसंबर तक बोयी जाती हैं. इनकी अच्छी पैदावार के लिए बढ़ने और पकने के समय ठंडे मौसम की जरूरत होती है. सर्दियों की बारिश सिर्फ पानी की जरूरत पूरी नहीं करती, खेतों के लिए खाद का काम भी करती है, जिससे पौधों को नाइट्रोजन, फाॅस्फोरस और दूसरे पोषक तत्व कुदरती रूप से मिलते हैं. पर अक्तूबर-नवंबर के गरम रहने से आलू का अंकुरण कम हुआ है.
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गन्ने की मिठास नवंबर की गर्मी ने सोख ली. ऐसे में, एक महीने देरी से गुड़ बनना शुरू हुआ. यानी बदलते मौसम ने हर जगह खेती-किसानी में ग्रहण लगा दिया है. रबी की फसल बिगड़ने का असर भोजन और अर्थव्यवस्था पर पड़ना तय है. ऊंचे पहाड़ों पर खेतों में बर्फ का आवरण इंसुलेशन कंबल के रूप में कार्य करता है. बर्फ की परतों से फसलों की रक्षा होती है, कंद-मूल की वृद्धि होती है, पाले का प्रकोप नहीं हो पाता तथा मिट्टी का कटाव भी रुकता है. पूरे हिमालय क्षेत्र में कम बर्फबारी और अनियमित बारिश से क्षेत्र में पानी और कृषि वानिकी सहित प्रतिकूल पारिस्थितिक प्रभाव पड़ने की आशंका है.
कम बर्फबारी के कारण तापमान अगर जल्दी बढ़ जाता है, तो देर से होने वाली बर्फबारी और अधिक त्रासदी दायक होगी. इससे हिमनद झील के फटने से अचानक बाढ़ आयेगी. गर्मी से यदि ग्लेशियर अधिक पिघले, तो पहाड़ी राज्यों में स्थापित सैकड़ों मेगावाट की जलविद्युत परियोजनाओं पर भी संकट या सकता है. उत्तराखंड के पौड़ी जिले में बीते चार महीनों से बर्फबारी और बारिश न होने से पर्यावरण पर अलग किस्म का खतरा मंडरा रहा है. लगातार सूखे से जमीन की नमी समाप्त हो गयी है और यदि हालात नहीं सुधरे, तो जंगलों में आग का खतरा बढ़ जायेगा. बारिश-बर्फबारी की कमी का असर केवल कृषि तक सीमित नहीं है. यह पूरे पर्यावरण को प्रभावित कर रहा है. हिमालयी ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे नदियों और जलस्रोतों का जलस्तर घट रहा है. पहाड़ों पर वर्षा न होने और बर्फ न गिरने से सूखी जमीन वन्यजीवों के लिए बड़ा खतरा है. घास के मैदान समाप्त होने का असर कस्तूरी मृग पर तो पड़ा ही है, बगैर बर्फ के हिम तेंदुओं का जीना मुश्किल हो रहा है.
इस तरह के नुकसान को जलवायु परिवर्तन के वैश्विक असर या फिर पश्चिमी विक्षोभ के कमजोर होने की बात कर जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ा जाता है. जबकि अत्यधिक पर्यटन, पक्के निर्माण, पहाड़ों पर तोड़फोड़, हरियाली कवच का कम होना जैसे मानवजनित कारणों ने पहाड़ की गोद में बसे लोगों को समय से पहले संकट में डाल दिया है. हिमालय के नजदीक बेशुमार वाहन पहुंचने, इनसे निकलने वाले कार्बन और बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप से तापमान वृद्धि के साथ दूषित होते पर्यावरण के कारण भी पहाड़ों की चोटियां काली दिखने लगी हैं. जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयन पर्यावरण संस्थान, अल्मोड़ा के निदेशक प्रो सुनील नौटियाल के मुताबिक, 1985 से 2000 तक हिमालय और ग्लेशियरों में बर्फ पिघलने की रफ्तार दो से तीन गुना बढ़ी है. उनके अनुसार, विगत चालीस साल में हिमालयी क्षेत्रों में 440 अरब टन बर्फ पिघल चुकी है. हिमालय के पहाड़ देश के महज मनोरंजन या पर्यटन के लिए नहीं हैं, ये देश के जलस्रोत हैं. जैविक और वानस्पतिक जैव विविधता भी तभी तक है, जब तक पहाड़ों पर पर्याप्त बर्फ रहे. आज हिमालयी राज्यों के लिए जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापमान वृद्धि से निपटने को स्थानीय स्तर पर त्वरित और दूरगामी कार्य योजना बनाने की जरूरत है, जिसमें स्थानीय लोगों की सहभागिता और पारंपरिक ज्ञान को भी स्थान मिले.(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
