ग्रीनलैंड पर ट्रंप के तेवर से दुविधा में यूरोप

Greenland: वेनेजुएला के बाद, डोनाल्ड ट्रंप की लालची निगाहें अब ग्रीनलैंड पर टिकी हैं. वह डेनमार्क को मजबूर कर रहे हैं कि या तो वह इस क्षेत्र को अमेरिका को बेच दे या फिर जवाबी कार्रवाई के लिए तैयार रहे. इस घटनाक्रम ने यूरोप को झकझोर दिया है और उसके लिए एक कूटनीतिक और रणनीतिक दुविधा खड़ी कर दी है. अतीत का साम्राज्यवादी यूरोप नव-साम्राज्यवाद का शिकार होता दिख रहा है. पर ट्रंप को यूरोप से कोई ठोस जवाब नहीं मिला है. ट्रंप की नीति का कड़ा विरोध आवश्यक है. चुप्पी और तुष्टीकरण से ट्रंप को और बढ़ावा ही मिलेगा.

Greenland: वेनेजुएला के बाद, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की लालची निगाहें अब ग्रीनलैंड पर टिकी हैं. वह डेनमार्क को मजबूर कर रहे हैं कि या तो वह इस क्षेत्र को अमेरिका को बेच दे या फिर जवाबी कार्रवाई के लिए तैयार रहे. इस घटनाक्रम ने यूरोप को झकझोर दिया है और उसके लिए एक कूटनीतिक और रणनीतिक दुविधा खड़ी कर दी है. पूर्व में आक्रामक रूस और पश्चिम में साम्राज्यवादी अमेरिका के बीच फंसा यूरोप एक अभूतपूर्व संकट का सामना कर रहा है और शरण की तलाश में भटक रहा है. अतीत का साम्राज्यवादी यूरोप नव-साम्राज्यवाद का शिकार होता दिख रहा है. विडंबना का अपना ही एक अजीब, अक्सर विकृत, तर्क होता है. ट्रंप के इस कदम से तीन महत्वपूर्ण सवाल उठते हैं : आखिर वह ऐसा क्यों कर रहे हैं. यूरोप इस पर क्या प्रतिक्रिया देगा और सामूहिक पश्चिम की अवधारणा का क्या होगा. अंत में, इसका व्यापक वैश्विक व्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ेगा.

लंबे समय से यूरोपीय नेता ग्रीनलैंड पर डोनाल्ड ट्रंप के इरादों को कोरी बयानबाजी और बेबुनियाद बताकर खारिज करते रहे हैं. पर हाल ही में उन्होंनेे उन आठ यूरोपीय देशों (डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, नीदरलैंड और फिनलैंड) पर 10 प्रतिशत का अतिरिक्त टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी है, जो उनके इस प्रयास का समर्थन नहीं कर रहे हैं. इससे यूरोप असमंजस में पड़ गया है. ट्रंप का ग्रीनलैंड पर कब्जा करने का कदम विशुद्ध भू-राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित है. अपने इस कदम को सही ठहराने के लिए वे तर्क देते हैं कि डेनमार्क भविष्य में चीन और रूस के प्रभाव से ग्रीनलैंड की रक्षा करने में असमर्थ है. ग्रीनलैंड अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है और वे वहां ‘गोल्डन डोम’ नामक एक मिसाइल रक्षा प्रणाली स्थापित करना चाहते हैं. लेकिन यह तर्क पूरी तरह निराधार है, क्योंकि डेनमार्क नाटो का सदस्य है तथा न तो रूस और न ही चीन ग्रीनलैंड पर नियंत्रण करना चाहते हैं. यह सच है कि आर्कटिक की सुरक्षा अमेरिका के लिए महत्वपूर्ण है, पर ग्रीनलैंड को किसी बाहरी शक्ति से तत्काल कोई खतरा नहीं है.

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही अमेरिकी सेना ग्रीनलैंड में एक सैन्य अड्डा बनाये हुए है तथा डेनमार्क आसानी से वहां और अधिक अमेरिकी सेनाओं की उपस्थिति के लिए सहमत हो सकता था. पर ट्रंप ग्रीनलैंड पर कब्जा करके उसे अमेरिका का हिस्सा बनाना चाहते हैं. अमेरिका ग्रीनलैंड पर कब्जा इसलिए करना चाहता है क्योंकि वह दुर्लभ खनिज पदार्थों सहित खनिज संसाधनों से समृद्ध है. लेकिन ट्रंप का मकसद केवल व्यावसायिक नहीं है, वे आसानी से डेनमार्क को वहां निवेश करने की अनुमति देने के लिए मना सकते थे. डेनमार्क को ऐसा सौदा बेहद आकर्षक लगता. इसके विपरीत, ट्रंप एक ऐसे देश से क्षेत्र छीनने पर तुले हुए हैं जो उनका सहयोगी है और जिसने कभी अमेरिका के प्रति शत्रुता नहीं दिखाई है. ट्रंप की योजना अवैध, तर्कहीन और यूरोपीय सुरक्षा के लिए खतरनाक है.

ग्रीनलैंड की आबादी मात्र 56,000 है, जबकि क्षेत्रफल के हिसाब से भारत ग्रीनलैंड का मात्र डेढ़ गुना है. इसलिए, ग्रीनलैंड पर कब्जा करने से अमेरिका को भारी लाभ होगा. इसके अलावा, ट्रंप ग्रीनलैंड से लेकर मध्य में कैरेबिया और दक्षिण में लैटिन अमेरिका तक पूरे पश्चिमी गोलार्ध पर नियंत्रण करना चाहते हैं. यह ट्रंप की ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ (एमएजीए) योजना का हिस्सा है. हालांकि, ट्रंप की यह योजना जल्द ही उल्टी पड़ सकती है. अमेरिका एक कमजोर होती शक्ति है और उसका वैश्विक प्रभाव तेजी से घट रहा है. ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की उनकी योजना को अमेरिकी जनता का समर्थन नहीं है. अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी भी इस योजना का विरोध कर रही है और उसके कुछ सदस्यों ने कोपेनहेगन के साथ एकजुटता व्यक्त करने के लिए डेनमार्क का दौरा किया. अमेरिका के लिए सबसे बड़ा खतरा नाटो का विघटन है. अगर वह ग्रीनलैंड में सेना भेजते हैं, तो नाटो टूट सकता है. यह स्पष्ट रूप से अमेरिकी वैश्विक प्रभाव के लिए हानिकारक होगा. लेकिन ट्रंप को किसी तरह यह लगता है कि नाटो का कोई महत्व नहीं है, क्योंकि नाटो का पूरा बोझ अमेरिका पर है.

यूरोप ने लंबे समय से अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी अमेरिका पर छोड़ रखी है और ट्रंप चाहते हैं कि यूरोप अब ग्रीनलैंड को एक उपहार के रूप में दे दे. ट्रंप की योजना पर यूरोपीय प्रतिक्रिया दबी हुई, सतर्क और समझौतावादी रही है. डेनमार्क ने बातचीत के लिए व्हाइट हाउस में अपना प्रतिनिधि भेजा, लेकिन वह निराश होकर लौट आया और कहा कि इस मुद्दे पर ‘बुनियादी मतभेद’ हैं. फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों खुलकर बोलने के बजाय संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मान की बात कर रहे हैं. ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर प्रतिशोध के डर से ट्रंप की सीधी आलोचना करने से बच रहे हैं. इटली की दक्षिणपंथी प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी, जिनके ट्रंप से घनिष्ठ संबंध हैं, का मानना है कि ट्रंप ग्रीनलैंड पर कब्जा नहीं करेंगे, जबकि जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज बहुत सतर्क और संभलकर चल रहे हैं. इन नेताओं ने पहले सोचा था कि वे ट्रंप को ऐसी योजना से बचने के लिए मना लेंगे. लेकिन जब उन्हें अहसास हुआ कि ट्रंप गंभीर हैं, तब भी वे बहुत सतर्क और सावधान हैं. दूसरी ओर, ट्रंप यूरोप को टैरिफ और सैन्य कार्रवाई की धमकी दे रहे हैं.

संक्षेप में, यूरोप एक दुविधा में फंसा हुआ है. उसके पास कोई सुसंगत योजना नहीं है. फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, नॉर्वे, स्वीडन और नीदरलैंड सहित कुछ यूरोपीय देशों ने ग्रीनलैंड में प्रतीकात्मक संख्या में सैनिक भेजना शुरू कर दिया है. पर ट्रंप को यूरोप से कोई ठोस जवाब नहीं मिला है. ये सभी देश तुष्टीकरण की नीति अपना रहे हैं जो अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरनाक और हानिकारक है. जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली नीति का समर्थन नहीं किया जाना चाहिए. ट्रंप की नीति का कड़ा विरोध आवश्यक है. व्यापार समझौते पर बातचीत में व्यस्त देश ट्रंप की सीधी आलोचना करने से बच रहे हैं. पर चुप्पी और तुष्टीकरण से ट्रंप को और बढ़ावा ही मिलेगा. अंतरराष्ट्रीय राजनीति ट्रंप की मनमानी और सनक की कठपुतली नहीं बन सकती. देशों को ऐसे सनकी नेता से निपटने के लिए अपने कुछ आर्थिक हितों का त्याग करने के लिए तैयार रहना चाहिए. नयी दिल्ली भी अपने चल रहे व्यापार समझौतों के कारण सतर्क है. पर एक बात याद रखनी चाहिए कि अगर ट्रंप अपने सहयोगी डेनमार्क के नहीं हैं, तो वे किसी के भी नहीं हैं. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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By राजन कुमार

राजन कुमार is a contributor at Prabhat Khabar.

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