Economy 2026: भारतीय अर्थव्यवस्था के व्यापक फंडामेंटल्स 2026 का आत्मविश्वास से भरा आशावादी रोडमैप पेश करते हैं. मजबूत घरेलू मांग, नरम मुद्रास्फीति, रिकॉर्ड निर्यात और बढ़ती सुधार केंद्रित नीतियों के जरिये अर्थव्यवस्था ने विनिर्माण क्षेत्र के दबाव, एमएसएमइ (सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम) सेक्टर की भंगुरता और टैरिफ के झटकों से निपटते हुए आर्थिक विकास दर को गिरने से बचा लिया है. अब किसी आर्थिक संकट का जोखिम नहीं है, अब चुनौती दबाव को इसी तरह झेलते हुए सालभर ढांचागत सुधारों को मजबूती देने की है, जिससे कि विनिर्माण, एमएसएमइ और निर्यात क्षेत्र की गति बनी रहे और इनमें रोजगार सृजन हो. कई बहुराष्ट्रीय और निजी क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों ने 2025-26 में भारत की आर्थिक विकास दर 6.5 प्रतिशत से सात फीसदी तक आंकी है.
जब विश्व व्यापार धीमा पड़ गया है, तब अपने यहां घरेलू मांग और निजी निवेश ने अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में बड़ा योगदान दिया है. मुद्रास्फीति इस वित्त वर्ष में चार फीसदी के आसपास रहने वाली है. इसके अलावा बैंक दरों में आगे होने वाली निरंतर कटौती से कर्ज की लागत कम हो सकती है और निजी निवेश को प्रोत्साहन मिल सकता है. इस पृष्ठभूमि में वित्तीय अनुशासन का पालन करते हुए भी भारत विनिर्माण और एमएसएमइ क्षेत्र में लक्षित मौद्रिक और नियामक मदद दे सकता है.
मजबूत आर्थिक विकास दर में विनिर्माण क्षेत्र का योगदान अब तक अपेक्षा से कम रहा है, ऐसे में, उम्मीद करनी चाहिए कि नये साल में यह क्षेत्र बेहतर प्रदर्शन करेगा. एक आशाजनक रोडमैप में तीन तत्व होने चाहिए. एक यह कि अलग-अलग आर्थिक क्षेत्रों के बजाय वैल्यू चेन (आपूर्ति शृंखला, शोध और विकास, मार्केटिंग तथा सेवा) पर जोर दिया जाए. इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटो कंपोनेंट्स तथा फार्मास्युटिकल्स के क्षेत्रों में हुई हालिया वृद्धि बताती है कि जब ढांचागत सुधार, बेहतर मानक तथा नीतिगत प्रोत्साहन वैल्यू चेन के साथ मिलते हैं, तो निवेश तथा निर्यात में वृद्धि होती है. वस्त्रोद्योग, फुटवियर तथा खाद्य प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रों में यह मॉडल लागू किया जाये, तो रोजगार सृजन के साथ निर्यात क्षमता में वृद्धि होगी. टैरिफ के मुद्दे पर भारत-अमेरिकी रिश्ते में खटास ने कुछ खास बाजारों पर निर्भरता के जोखिम को रेखांकित किया है. इसके बावजूद निर्यात में हुई वृद्धि उत्साह बढ़ाने वाली है.
जनवरी से नवंबर के बीच अमेरिकी टैरिफ के बावजूद वस्तुओं का निर्यात 400 अरब डॉलर रहा. ऐसा विविधीकरण और उत्पादों की गुणवत्ता सुधारने से संभव हुआ. एक तरफ जहां निर्यात के नये बाजार तलाशे गये हैं, वहीं संयुक्त अरब अमीरात, ऑस्ट्रेलिया और इएफटीए (यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोसिएशन) के साथ हाल ही में मुक्त व्यापार समझौते पर दस्तखत किये हैं. जबकि अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत चल रही है. देश की जीडीपी में एमएसएमइ क्षेत्र की हिस्सेदारी 30 फीसदी है, जबकि कुल निर्यात में इसकी हिस्सेदारी 45 प्रतिशत है. यह क्षेत्र आज नरम मांग, टैरिफ के झटकों तथा भारी वित्तीय लागत का सामना कर रहा है. बजट में एमएसएमइ क्षेत्र की बेहतरी के लिए कदम उठाये गये थे, जिनमें निवेश तथा टर्नओवर सीमा में वृद्धि और क्रेडिट गारंटी में वृद्धि जैसे उपाय शामिल थे.
नये वर्ष के रोडमैप में निर्यात वृद्धि अभियान तो जारी रखना ही चाहिए, जिन देशों में निर्यात प्रतिस्पर्धा सख्त है, वहां इलेक्ट्रॉनिक्स तथा रसायन जैसे उच्च गुणवत्ता और उच्च कौशल वाले क्षेत्रों के निर्यात को प्राथमिकता में रखना चाहिए. अगले चरण में व्यापार सुविधाओं को मजबूती दी जानी चाहिए. बंदरगाहों, आयात-निर्यात तथा ढांचागत सुविधाएं बढ़ायी जानी चाहिए, ताकि टैरिफ में बदलाव पर कंपनियां तत्काल सक्रिय हो सकें. यह समय व्यापार कूटनीति पर सक्रियता दिखाने का है. इसके तहत नये मुक्त व्यापार समझौतों के साथ पुराने समझौतों को अपग्रेड किया जाना है. इससे खासकर एमएसएमइ क्षेत्र के निर्यातकों को फायदा होगा. इन रणनीतियों से टैरिफ की चुनौतियों को बेअसर कर निर्यात क्षेत्र में ज्यादा संभावनाएं तलाशी जा सकेंगी. सिर्फ विकास दर में वृद्धि के बजाय आर्थिक विकास को ज्यादा व्यापक करने तथा इसे ज्यादा रोजगार केंद्रित बनाने की भारत की क्षमता ही दरअसल नये वर्ष में आर्थिक मोर्चे पर भारतीय आशावाद का आधार होनी चाहिए.
कई पहल इसी दिशा में संकेत करती हैं. परंपरागत फैक्टरी क्षेत्र से परे डिजिटल प्लेटफॉर्म के साथ-साथ बढ़ रहे पर्यटन, लॉजिस्टिक्स, रिटेल, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा क्षेत्र लाखों की संख्या में रोजगार सृजन कर रहे हैं. राज्यों को आर्थिक सुधार प्रक्रिया का साझेदार बनाना होगा. प्रतिस्पर्धी और सुधार केंद्रित राज्यों ने भूमि और श्रम सुधारों के साथ एकल खिड़की प्रणाली को तेजी से लागू किया है, जो विनिर्माण तथा सेवा क्षेत्रों में निवेश आमंत्रित करती है. भारत की आर्थिक विकास यात्रा में डिजिटल और हरित रूपांतरण दूरगामी महत्व के साबित होने वाले हैं. डिजिटल ढांचे और उभरते हरित निवेश एमएसएमइ तथा स्टार्टअप्स में नये रोजगार सृजित कर सकते हैं. इन सबको जोड़ दें, तो अर्थव्यवस्था में आशावाद की नयी जमीन तैयार होती है. हालांकि बाहरी उथल-पुथल और विनिर्माण क्षेत्र के दबाव इस साल भी चुनौतियों के तौर पर सामने आयेंगे, इसके बावजूद भारत प्रभावी आर्थिक औजारों, नीतिगत फैसलों और सांस्थानिक पहल से इन्हें संभावनाओं में बदलेगा, यह उम्मीद करनी ही चाहिए. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
