Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट के जज न्यायमूर्ति अमानुल्लाह और महादेवन की पीठ ने अहम फैसले में कहा है कि जमानत की अर्जी में आरोपियों को अपने आपराधिक इतिहास का खुलासा करना चाहिए. न्यायिक विवेक को सीधे प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण तथ्यों के पूर्ण और स्पष्ट खुलासे से कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग कम होगा. शीर्ष अदालत ने इस फैसले पर अमल करने के लिए उच्च न्यायालयों के नियमों में बदलाव के सुझाव के साथ पुलिस को भी आदेश दिये हैं. इस मामले में आरोपी के खिलाफ 2011 के बाद चार राज्यों में नौ से ज्यादा आपराधिक मामले दर्ज थे. वकालत और एमफिल की फर्जी डिग्री हासिल करने वाले हिस्ट्रीशीटर आरोपी ने जमानत हासिल करने के लिए खुद को वकील के तौर पर पेश किया था. आरोपी के खिलाफ चोरी, ठगी, यौन-उत्पीड़न के साथ मार्कशीट और डिग्रियों के फर्जीवाड़े के अपराध दर्ज थे. जमानत रद्द करते हुए जजों ने कहा कि संगीन अपराधों से न्यायिक व्यवस्था और शैक्षणिक तंत्र में बढ़ते पराभव के मर्ज की अनदेखी नहीं की जा सकती.
संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार जमानत देने से जुड़े तीन बड़े न्यायिक सिद्धांत हैं. पहला, जमानत मिलने के बाद आरोपी सबूतों में छेड़छाड़ न करे. दूसरा, आरोपी आदतन अपराधी नहीं हो और जमानत मिलने के बाद वह नये अपराध नहीं करेगा. तीसरा, जमानत मिलने के बाद आरोपी के भागने की आशंका नहीं होनी चाहिए. इस तीसरे नियम के अनुसार ही सुप्रीम कोर्ट के जज पारदीवाला की पीठ ने नये फैसले में कहा है कि फरार आरोपियों को अग्रिम जमानत नहीं मिलनी चाहिए, लेकिन सामान्य तौर पर बेल नियम है और जेल अपवाद. इसलिए अन्य फैसले में झारखंड में भ्रष्टाचार से जुड़े मामले में जमानत के बावजूद आरोपी के खिलाफ अनेक एफआइआर दर्ज करने को सुप्रीम कोर्ट ने गलत बताया है. संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत लोगों की स्वतत्रंता सर्वोपरि है. डॉक्टर आंबेडकर का जिक्र करते हुए जजों ने अनुच्छेद 32 के तहत याचिकाकर्ता को राहत दी है. पुलिस ज्यादती या गलत मुकदमों में फंसाये गये लोगों को जमानत के साथ फर्जी मुकदमों से जल्द राहत मिलना ही चाहिए.
जनता दर्शन के दौरान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि गलत एफआइआर या फर्जी आरोप पत्र में संलग्न पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कानून के अनुसार एफआइआर दर्ज हो सकती है. सुप्रीम कोर्ट के जज संजय करौल और एन कोटिस्वर सिंह की अन्य पीठ ने व्यापम घोटाला उजागर करने वाले व्हिसल ब्लोअर आनंद राय के खिलाफ एएसी/एसटी एक्ट में लगाये गये आरोप रद्द करने का अहम फैसला दिया है. जजों के अनुसार, आरोप तय करते समय जजों को सावधानी और संतुलन के साथ तथ्यों की ईमानदारी से समीक्षा करने की जरूरत है. मजिस्ट्रेट और जज जिम्मेदारी से काम न करें, तो अदालत की प्रक्रिया ही सजा बन जाती है. सुप्रीम कोर्ट के जजों के अनुसार जमानत देने वाली जिला अदालतें न्यायिक व्यवस्था का मजबूत स्तंभ हैं. इसलिए जमानत से जुड़े हर एक मामले में गुण-दोष के आधार पर न्यायिक विवेक का इस्तेमाल जरूरी है.
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के 2023 के आंकड़ों के अनुसार जेलों में लगभग 5.3 लाख लोग बंद थे, जिनमें 3.9 लाख लोग विचाराधीन कैदी थे. जमानत और फैसलों में विलंब से 2023 में 150 से ज्यादा विचाराधीन कैदियों की जेलों में मृत्यु हो गयी. जिला अदालतों में 3.6 करोड़ और उच्च न्यायालयों में 17.5 लाख से ज्यादा आपराधिक मामले लंबित हैं. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज संजय किशन कौल ने कहा था कि इसी गति से मुकदमों का निपटारा होता रहा, तो लंबित मामलों के निपटारे में 500 साल से ज्यादा लग सकते हैं. देशभर में पुलिस थाने क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क एंड सिस्टम्स के डिजिटल और कंप्यूटर नेटवर्क से जुड़े हैं. एफआइआर दर्ज होने के साथ ही आरोपी से जुड़े अन्य अपराधों का विवरण इकट्ठा करने की जिम्मेदारी संबंधित जांच अधिकारी की होनी चाहिए. जमानत हासिल करने के लिए गलत हलफनामा देने वालों के खिलाफ मिथ्या साक्ष्य और झूठा शपथ पत्र देने के मामले में कठोर दंड मिलना चाहिए. लेकिन सामान्य और रूटीन अपराधों में गिरफ्तार आरोपियों को जमानत मिलने में विलंब संविधान के साथ सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की अवज्ञा है.
पिछले साल तीन जजों की पीठ ने कौशल सिंह बनाम राजस्थान सरकार के फैसले में पुराने आपराधिक मामलों के खुलासे की अनिवार्यता की बात दुहरायी थी. सुप्रीम कोर्ट के फैसले संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत देश के कानून माने जाते हैं, जिनका पुलिस और जिला अदालतों में पालन न होना चिंताजनक है. जमानत से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट के जजों के विरोधाभासी फैसलों की वजह से जिला अदालतों में मनमानी के साथ विलंब और भ्रष्टाचार बढ़ रहा है. जन विश्वास कानून और इनकम टैक्स कानून में बदलाव से अनेक अपराधों को अनापराधिक बनाया गया है. खतरनाक अपराधी जेल में रहें और मामूली अपराधों में गिरफ्तार आरोपियों को जल्द जमानत और रिहाई मिले, इसके लिए भारतीय न्याय संहिता और दूसरे कानूनों में स्पष्ट प्रावधान के साथ जमानत संहिता बनाने की जरूरत है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
