Pakistan on-terrorism : जो पाकिस्तान बलूचों के आंदोलन के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराता है, उसे संयुक्त राष्ट्र से दोहरा झटका लगा है. एक तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की नयी रिपोर्ट में पाक स्थित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद को आतंकवादी संगठन घोषित किया गया है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि बीते साल दिल्ली के लाल किला मेट्रो स्टेशन के बाहर हुए आतंकी विस्फोट के तार सीधे तौर पर आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े हुए हैं. लाल किले के पास हुआ हमला दिल्ली की सुरक्षा व्यवस्था पर सीधा हमला था, जिससे राष्ट्रीय राजधानी की सुरक्षा चिंताएं बढ़ गयी थीं. पाकिस्तान को दूसरा झटका यह लगा है कि बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी को आतंकी संगठन अलकायदा का सहयोगी घोषित कराने में वह विफल हो गया है.
हालांकि, खुद पाकिस्तान भी इन दिनों कई मोर्चों पर अलगाववादी हिंसा और उथल-पुथल से जूझ रहा है. इनमें से बलूचिस्तान की स्थिति गंभीर बनी हुई है. बलूचिस्तान में अलगाववादी आंदोलन हालांकि बीस-पच्चीस साल से चल रहा है, लेकिन पिछले लगभग पांच वर्षों से इसमें तीव्रता आयी है. बलूचों का आक्रोश इस पर है कि प्राकृतिक संसाधनों से लैस उनके प्रांत का इस्लामाबाद शोषण करता है, जबकि उनकी बेहतरी की इच्छा उसके एजेंडे में नहीं है. बलूच लोग बेहतर शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार और आधारभूत सुविधाओं की मांग कर रहे हैं, लेकिन उनकी मांगों पर विचार करने के बजाय आंदोलनकारियों को ही गायब कर दिया जाता है.
हाल के वर्षों में हजारों बलूच नौजवान सेना के हाथों लापता हो गये हैं. वर्षों से बलूच आंदोलनकारी अपनी मांगों के साथ सड़कों पर उतरते हैं. लेकिन उनकी मांगें अनसुनी कर दी जाती है. हाल के वर्षों में बलूचों का गुस्सा इस कारण भड़का है. पिछले दिनों बलूच विद्रोहियों ने एक साथ कई शहरों पर धावा बोल दिया था. उससे भी अधिक हैरानी की बात यह कि बलूचों के हमलों में आत्मघाती महिलाएं भी थीं. इसी से साफ है कि बलूचिस्तान में इस्लामाबाद के प्रति आक्रोश किस हद तक बढ़ गया है. दरअसल आजाद ख्यालों के बलूचों पर पाक फौज जितने जुल्म करती है, उनमें प्रतिरोध की ज्वाला उतनी ही तेज होती है. इससे पहले पिछले साल मार्च में बलूच विद्रोहियों ने पेशावर जाने वाली एक ट्रेन जाफर एक्सप्रेस को हाइजैक कर इस्लामाबाद को अपनी ताकत का अहसास कराया था.
बलूचिस्तान में आंदोलनकारियों की हिंसा के कुछ ही दिन बाद इस्लामाबाद की एक इमामबारगाह में शुक्रवार की नमाज के दौरान आत्मघाती विस्फोट में लगभग 70 लोग मारे गये और सैकड़ों लोग घायल हुए. पाकिस्तान में होने वाली अलगाववादी हिंसा नयी नहीं है, और न ही हिंसा की इन घटनाओं का कोई एक कारण है. वहां अलगाववादी हिंसा एक तबके द्वारा दूसरे तबके को निशाने पर लेने का नतीजा होता है. इस्लामाबाद में हुए आत्मघाती विस्फोट में भी शिया मुस्लिमों को ही निशाना बनाया गया. इसके लिए पाकिस्तान एक अलगाववादी धड़े को दूसरे अलगाववादी धड़े से लड़ाती है. जैसे बलूचों के खिलाफ लश्कर के आतंकियों का इस्लामाबाद द्वारा इस्तेमाल आम है. लेकिन बलूचिस्तान में हिंसा और इस्लामाबाद में आत्मघाती विस्फोट के पीछे एक बात समान दिखी. पाकिस्तान ने दोनों ही मामलों में भारत की तरफ अंगुली उठायी.
हालांकि यह भी कोई नयी बात नहीं है. खासकर बलूचिस्तान में लंबे समय से चल रहे अलगाववादी आंदोलन के लिए वह भारत को जिम्मेदार ठहराता रहा है, जबकि इस्लामाबाद के निरंकुश रवैये के कारण बलूच लोग लंबे समय से आजादी की मांग कर रहे हैं. इस्लामाबाद में हुए विस्फोट के पंद्रह मिनट के भीतर सरकार ने अफगानिस्तान के अलावा भारत पर अंगुली उठा दी. यह दावा तक किया गया कि हमलावर ने पिछले दिनों कई बार अफगानिस्तान के दौरे किये थे. जबकि आइएसआइएस ने उस विस्फोट की जिम्मेदारी ली. भारत पर आरोप लगाने का ऐतिहासिक कारण है. पाकिस्तान अपनी हर नाकामयाबी का ठीकरा भारत पर फोड़ता है.
भारत पर आतंकी हमले प्रायोजित करने वाला पाकिस्तान अपने यहां होने वाले वैसे ही हमलों के लिए भारत पर अंगुली उठाता है. हालांकि गौर से देखें, तो अपनी नाकामयाबी के लिए भारत के अलावा वह इस्राइल, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, अफगानिस्तान जैसे देशों पर भी अंगुली उठाता है. हाल ही में पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने संसद में कहा कि अमेरिका ने अपने फायदे के लिए पाकिस्तान का इस्तेमाल किया और काम निकलने के बाद उसे टॉयलेट पेपर की तरह फेंक दिया. पाकिस्तान यह बात उस अमेरिका के लिए कह रहा है, जो इन दिनों उसका मददगार है. अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप पाक फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को लंच के लिए व्हाइट हाउस में आमंत्रित करते हैं, लेकिन पाकिस्तान का कहना है कि अमेरिका फायदे के लिए उसका इस्तेमाल करता आया है. यह ताजा उदाहरण ही बताता है कि पाकिस्तान अभी तक एक जिम्मेदार और विश्वसनीय राष्ट्र नहीं बन पाया है. उसके दोहरेपन की पोल कई बार खुल जाती है. बलूचों के हिंसक आंदोलन से आजिज आकर उसने संयुक्त राष्ट्र में बलूच लिबरेशन आर्मी पर प्रतिबंध लगाने की मांग की. उसकी यह मांग हैरान करने वाली इसलिए थी, क्योंकि लश्कर जैसे जिन आतंकी संगठनों पर पहले से प्रतिबंध लगे हैं, उसके सदस्य तो छुट्टा घूम रहे हैं, पर पाकिस्तान बीएलए को प्रतिबंधित करवाना चाहता था.
लेकिन मुश्किल यह है कि पाकिस्तान अपने मौजूदा अविश्वसनीय स्वरूप के साथ अस्तित्व में है, तो इसके पीछे अमेरिका जैसे देशों का संरक्षण भी है. भारत-अमेरिका ट्रेड डील के बीच अमेरिका की तरफ से एक नक्शा जारी हुआ था, जिसमें पाक अधिकृत कश्मीर को भारत के अंग के रूप में दिखाया गया. इसका विश्लेषण करते हुए कहा गया कि अमेरिका ने यह नक्शा जारी कर पाकिस्तान को सबक सिखाया है. पर बाद में अमेरिका ने वह नक्शा हटा लिया और इस्लामाबाद का दावा है कि उसके कहने पर वाशिंगटन ने यह कदम उठाया है. अमेरिका के अलावा पाकिस्तान का दोस्त चीन भी हमेशा उसका साथ देता है. पाकिस्तान में अलगाववादी हिंसा के कारण चीनी परियोजनाओं के प्रभावित होने की आशंका है. इसके बावजूद पाकिस्तान के साथ वह खड़ा रहता है. स्पष्ट है कि बड़े देशों की शह के कारण ही पाकिस्तान का दोरंगापन चल रहा है. यह अलग बात है कि इससे अंदरूनी रूप से वह देश निरंतर टूट रहा है और उसकी अर्थव्यवस्था तबाह हो रही है. लेकिन इससे वह कोई सबक सीखने को तैयार नहीं है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
