खरीदारों के हित और अदालत

Supreme Court: रियल एस्टेट क्षेत्र को साफ-सुथरा बनाने, अनियमितताओं पर अंकुश लगाने और खरीदारों का विश्वास बहाल करने के लिए आरइआरए को एक ऐतिहासिक सुधार के रूप में पेश किया गया था.

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने रियल एस्टेट क्षेत्र को नियंत्रित करने के लिए गठित आरइआरए (रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण) यानी रेरा के कामकाज पर जो नाराजगी जताई है, वह उचित ही है. एक मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत की एक पीठ ने कहा कि रेरा के गठन का मकसद रियल एस्टेट क्षेत्र में पारदर्शिता लाना, परियोजनाओं में देरी को रोकना और घर खरीदारों के हितों की रक्षा करना था, पर जमीनी स्तर पर तस्वीर इसके उलट नजर आ रही है. रेरा का गठन जिनके हितों की रक्षा के लिए हुआ था, वे हताश हैं और ऐसा लगता है कि रेरा घर खरीदारों की सुरक्षा करने के बजाय डिफॉल्ट करने वाले बिल्डरों को सुविधा दे रहा है.

शीर्ष अदालत की यह टिप्पणी हिमाचल प्रदेश में रेरा ऑफिस को शिमला से धर्मशाला ट्रांसफर करने से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान सामने आई. राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि शिमला में भीड़ कम करने और प्रशासनिक कारणों से कार्यालय स्थानांतरण का निर्णय लिया गया. विरोधी पक्ष के वकील ने तर्क दिया कि रेरा के करीब 90 फीसदी प्रोजेक्ट और 92 फीसदी लंबित शिकायतें शिमला, सोलन, परवाणू और सिरमौर जिलों से संबंधित हैं, जो 40 किलोमीटर के दायरे में आते हैं, जबकि धर्मशाला में केवल 20 परियोजनाएं हैं.

सुनवाई के दौरान जब पीठ को बताया गया कि रेरा में एक सेवानिवृत्त आइएएस अधिकारी की नियुक्ति की गयी है, तो प्रधान न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि कई राज्यों में ऐसी संस्थाएं पुनर्वास केंद्र बन गयी हैं. कोर्ट ने राज्य सरकार के फैसले को मंजूरी दी, पर रेरा की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किये. देश के रियल एस्टेट क्षेत्र को साफ-सुथरा बनाने, अनियमितताओं पर अंकुश लगाने और खरीदारों का विश्वास बहाल करने के लिए आरइआरए को 2016 में एक ऐतिहासिक सुधार के रूप में पेश किया गया था. पर अदालत की टिप्पणियां इस चिंता को रेखांकित करती हैं कि जब तक कार्यान्वयन में सुधार नहीं होता, कानून का वादा केवल कागजी कार्रवाई बनकर रह जाएगा.

सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि कानून को रद्द करने या उसमें संशोधन करने के लिए कोई निर्देश जारी नहीं किया, पर उसकी टिप्पणियां आरइआरए के प्रशासन के तरीके को लेकर बढ़ती न्यायिक निराशा को दर्शाती हैं. इन टिप्पणियों से राज्य सरकारों पर अपने नियामक प्राधिकरणों को मजबूत करने, प्रवर्तन में सुधार करने और यह सुनिश्चित करने का दबाव बढ़ने की संभावना है कि कानून घर खरीदारों को सार्थक सुरक्षा प्रदान करे.

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

By संपादकीय

संपादकीय is a contributor at Prabhat Khabar.

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >