आधार वर्ष बदलाव से जानेंगे महंगाई की असली स्थिति

Inflation : सरकार आमतौर पर हर पांच से 10 वर्षों में नया आधार वर्ष चुनती है, जो सूखा, बाढ़, महामारी या अत्यधिक महंगाई से मुक्त हो. पुराने सूचकांक में खाने-पीने की वस्तुओं का वेटेज लगभग 50 प्रतिशत था, जिसे अब घटाकर 36.8 प्रतिशत कर दिया गया है.

Inflation : आगामी 10 वर्षों के लिए सरकार ने महंगाई मापने का आधार वर्ष 2012 से बदलकर 2024 कर दिया है. इस क्रम में 12 फरवरी को पहली बार जनवरी माह की खुदरा महंगाई को नये आधार पर मापा गया. नये आधार पर जनवरी, 2026 में महंगाई बढ़कर 2.75 प्रतिशत हो गयी, जो दिसंबर में 1.33 प्रतिशत थी. यह पिछले आठ महीनों का उच्चतम स्तर है. महंगाई का स्तर इस बात पर निर्भर करता है कि मांग और आपूर्ति का संतुलन कैसा है. जब लोगों के पास अधिक पैसे होंगे, तो वे अधिक वस्तुएं खरीदेंगे, जिससे मांग बढ़ेगी. यदि आपूर्ति मांग के अनुरूप नहीं है, तो वस्तुओं की कीमतें बढ़ जायेंगी. इसके विपरीत, जब मांग कम होगी और आपूर्ति अधिक होगी, तो महंगाई घट जायेगी.


सरकार आमतौर पर हर पांच से 10 वर्षों में नया आधार वर्ष चुनती है, जो सूखा, बाढ़, महामारी या अत्यधिक महंगाई से मुक्त हो. पुराने सूचकांक में खाने-पीने की वस्तुओं का वेटेज लगभग 50 प्रतिशत था, जिसे अब घटाकर 36.8 प्रतिशत कर दिया गया है. आधार वर्ष वह वर्ष होता है जिसे कीमतों के लिए मानक या आधार माना जाता है. इसका अर्थ है कि उस वर्ष की वस्तुओं की औसत कीमत को 100 माना जाता है. फिर, अन्य वर्षों की कीमतों की तुलना उसी आधार वर्ष से की जाती है. इससे पता चलता है कि महंगाई कितनी बढ़ी या कम हुई है.

यह फॉर्मूला खुदरा महंगाई या उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआइ) में उपयोग होता है. हालांकि, यह बाजार के सभी सामान पर समान रूप से लागू नहीं होता है. महंगाई को मापने के लिए एक बकेट में वैसी वस्तुओं व सेवाओं को रखा जाता है, जो महंगाई को सर्वाधिक प्रभावित करते हैं. इस क्रम में हर वस्तु को उपभोक्ता के बजट में उसके महत्व के आधार पर भार दिया जाता है. सीपीआइ सूचकांक की मदद से राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) हर महीने खुदरा महंगाई की गणना करता है, जिसमें ऐसी वस्तुएं और सेवाएं शामिल होती हैं, जिनका उपयोग आम लोग अधिक करते हैं. यह सूचकांक उन वस्तुओं की कीमतों में बदलाव को दर्शाता है, जो आधार वर्ष 2012 के संदर्भ में होते थे, और अब ये 2024 के संदर्भ में होंगे.


गौरतलब है कि विकास सुनिश्चित करने के लिए महंगाई की वास्तविक स्थिति को समझना आवश्यक है, ताकि जनता की घटती क्रय शक्ति, स्थिर आय, और जीवन यापन की लागत का सही आकलन किया जा सके. इससे उपयुक्त वित्तीय योजना, निवेश की सुरक्षा, मजदूरी की उचित मांग और सरकार के लिए सही मौद्रिक नीतियों का निर्धारण आसान हो जाता है. जब महंगाई का चित्र स्पष्ट होता है, तो सरकार सही कदम उठाकर इस पर नियंत्रण कर सकती है. महंगाई बढ़ने से पैसे का मूल्य घट जाता है और पता चलता है कि हमें और कितना कमाने या बचाने की जरूरत है.

यदि महंगाई अधिक हो, तो निवेश का रिटर्न नकारात्मक हो जाता है. वहीं, सही महंगाई दर जानकर सोना, शेयर जैसे बेहतर निवेश के विकल्प को चुनने में आसानी होती है. महंगाई के सही आंकड़ों से शिक्षा, स्वास्थ्य, और जरूरी वस्तुओं पर इसके असर को समझा जा सकता है. सरकार इन आंकड़ों की मदद से ब्याज दरों और करों में बदलाव करती है. बीते एक दशक में लोगों की जीवनशैली, खर्च करने के तरीके और दैनिक आवश्यकताओं में आमूलचूल बदलाव आया है. इसलिए, 2012 का आधार वर्ष महंगाई की सही तस्वीर नहीं दिखा पा रहा था.

वास्तविक आंकड़ों के लिए सूचकांक में वस्तुओं और सेवाओं की संख्या भी बढ़ायी गयी है. नये सूचकांक की मुख्य विशेषता है कि यह उन वस्तुओं और सेवाओं को शामिल करता है जिन पर आज अधिकांश लोग खर्च कर रहे हैं. नया आधार वर्ष लाने का उद्देश्य है सब्जियों, अनाज जैसी वस्तुओं की कीमतों में बदलाव से महंगाई के आंकड़ों पर ज्यादा प्रभाव न पड़े. इस बदलाव के कारण गैर-खाद्य वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों के उतार-चढ़ाव को भी महंगाई मापने में शामिल किया गया है, ताकि महंगाई की वास्तविक तस्वीर हमारे सामने आ सके.


नये सूचकांक में इ-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से वस्तुओं की कीमतों का डाटा इकट्ठा किया जायेगा. हवाई किराये, बिजली दरें, एप आधारित टैक्सी सेवाएं, ऑनलाइन सेवाएं और शॉपिंग की कीमतों को भी शामिल किया जायेगा. इसी तरह, इन वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में बदलाव का प्रभाव भी महंगाई के आंकड़ों में दिखाई देगा. ग्रामीण क्षेत्रों में घर के किराये को सूचकांक में शामिल किया गया है. इनके अतिरिक्त, जिन वस्तुओं का उपयोग आज नहीं किया जाता है, वे महंगाई मापने वाली सूची से हटा दी गयी हैं.

महंगाई की वास्तविक स्थिति को समझना बहुत जरूरी है. यदि इसे गलत तरीके से पेश किया गया, तो यह न केवल जनता को परेशान कर सकती है, बल्कि विकास में भी बाधा बन सकती है. जब महंगाई की दर बढ़ती है, तो भारतीय रिजर्व बैंक रेपो दर को कम नहीं करता, जिससे बैंकों को सस्ती पूंजी नहीं मिलती और उन्हें उच्च ऋण दर पर ऋण देना पड़ता है. इससे उधार लेने की प्रतिस्पर्धा कम हो जाती है, और पूंजी की कमी के कारण आर्थिक गतिविधियां मंद हो जाती हैं. आधार वर्ष में बदलाव और बकेट में उपयोगी वस्तुओं को शामिल करने से महंगाई की सही तस्वीर सामने आ सकती है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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