16वां वित्त आयोग : समर्थ राज्यों को प्रोत्साहन

16th Finance Commission : वित्त आयोग का पुनर्गठन हर पांच वर्ष में किया जाता है, ताकि विभाजन का फॉर्मूला हमेशा के लिए स्थिर रहने के बजाय बदलती वास्तविकताओं के अनुरूप ढल सके. आयोग का मुख्य कार्य अनुच्छेद 280 से आता है और सिफारिशों का कार्यान्वयन अनुच्छेद 281 से.

16th Finance Commission : भारत का राजकोषीय संघवाद दिखने में सरल एक समझौते पर चलता है. संघ व्यापक करों का अधिकांश हिस्सा एकत्र करता है, जबकि राज्य आवश्यक सार्वजनिक सेवाओं, स्कूल, अस्पताल, पुलिसिंग, स्थानीय सड़कें, जलापूर्ति और बहुत कुछ की अग्रिम पंक्ति की जिम्मेदारी निभाते हैं. कर राजस्व और व्यय दायित्वों में मेल नहीं है. राज्यों पर लगभग दो-तिहाई व्यय दायित्व हैं, पर केवल एक-तिहाई राजस्व पर उनका नियंत्रण है. इसलिए संविधान ने एक निष्पक्ष मध्यस्थ, वित्त आयोग का प्रावधान किया, जो समय-समय पर यह अनुशंसा करता है कि केंद्रीय करों के बांटे जाने वाले हिस्से को संघ और राज्यों के बीच तथा राज्य बनाम राज्य के बीच कैसे बांटा जाये.


वित्त आयोग का पुनर्गठन हर पांच वर्ष में किया जाता है, ताकि विभाजन का फॉर्मूला हमेशा के लिए स्थिर रहने के बजाय बदलती वास्तविकताओं के अनुरूप ढल सके. आयोग का मुख्य कार्य अनुच्छेद 280 से आता है और सिफारिशों का कार्यान्वयन अनुच्छेद 281 से. व्यवहार में वित्त आयोग के निर्णय भारतीय संघवाद के वित्तीय ‘ऑपरेटिंग सिस्टम’ बन जाते हैं. वे राज्यों को मिलने वाली मासिक नकदी, कल्याणकारी और पूंजीगत खर्च के लिए उनके बजट की जगह, और उनकी उधार लेने की क्षमता को भी प्रभावित करते हैं. अब जब 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट को केंद्र सरकार ने स्वीकार कर संसद के समक्ष पेश कर दिया है, नया फॉर्मूला 2026-31 की अवधि में केंद्र-राज्य राजकोषीय संबंधों को आकार देगा.

मुख्य प्रश्न ‘किसे कितना मिलेगा’ का नहीं है, बल्कि यह भी है कि यह व्यवस्था किस प्रकार के प्रोत्साहन पैदा करती है- खासकर ऐसे संघीय ढांचे में जहां समृद्धि और राजनीतिक शक्ति असमान रूप से वितरित हैं. पिछले आयोग की तरह 16वें वित्त आयोग ने विभाज्य पूल में राज्यों की हिस्सेदारी 41 फीसदी पर बरकरार रखी है. बाईस राज्यों की मांग थी कि राज्यों की हिस्सेदारी बढ़ाकर 50 फीसदी की जाये. यह उनकी उस शिकायत के कारण था, जो केंद्र द्वारा ‘सेस’ और ‘सरचार्ज’ पर बढ़ती निर्भरता से जुड़ी है, जो आम तौर पर विभाज्य पूल से बाहर होते हैं, इसलिए साझा नहीं किये जाते. चूंकि विभाज्य पूल का कुल आकार 16वें वित्त आयोग की अवधि में 55 ट्रिलियन से करीब दोगुना होकर 90 ट्रिलियन रुपये हो जायेगा, इसलिए राज्यों के पास काफी अधिक संसाधन होंगे. पर अगर केंद्र गैर-साझा लेवी का विस्तार जारी रखता है, तो यह 41 प्रतिशत हकीकत में आंकड़ों से कम महसूस हो सकता है.


सोलहवें वित्त आयोग का सबसे चौंकाने वाला नवाचार क्षैतिज (राज्यों के बीच) वितरण में है : इसने 10 फीसदी वेटेज के साथ ‘राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद में योगदान’ को एक मानदंड के रूप में पेश किया है. आयोग ने अन्य जगहों पर वेटेज कम कर ऐसा किया है. यह उन राज्यों के लिए पुरस्कार है, जो राष्ट्रीय उत्पादन में अधिक योगदान देते हैं. यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे ट्रांसफर की नैतिक भाषा बदलती है. दशकों तक प्रमुख तर्क यह रहा कि आय और क्षमता में भिन्नताओं के बावजूद राज्यों को तुलनीय बुनियादी सेवाएं प्रदान करने में मदद करना और संरचनात्मक कमियों की भरपाई करना.

पर नया जीडीपी-योगदान मानदंड कहता है कि प्रदर्शन और योगदान भी मायने रखते हैं. संवैधानिक रूप से आयोग का दायित्व यह सुनिश्चित करना है कि साझा करों का न्यायसंगत वितरण हो, ताकि विभिन्न स्तर की सरकारें संविधान द्वारा सौंपे गये दायित्व निभा सकें. ‘जीडीपी में योगदान’ जोड़ना असंवैधानिक नहीं है. पर कर वितरण का प्रमुख उद्देश्य क्या होना चाहिए? जीडीपी-योगदान का प्रावधान राजस्व-असमर्थता के तर्क से टकरा सकता है. सभी राज्य समान स्थिति में नहीं हैं. समृद्ध राज्य के पास बेहतर ढांचागत सुविधा और संस्थान होते हैं, जिससे वह ‘प्रदर्शन प्रोत्साहनों’ का लाभ आसानी से उठा सकता है, जबकि एक गरीब राज्य इच्छाशक्ति होने पर भी शीघ्र प्रतिक्रिया देने में सक्षम नहीं हो सकता. इससे विषमता बढ़ सकती है.

अतः ‘योगदान’ को पुरस्कृत करना लाभों को स्थायी बना सकता है, जब तक कि पिछड़े राज्यों में क्षमता और मानव पूंजी में निवेश द्वारा संतुलन न किया जाये. इसके तीन संभावित असर हो सकते हैं. पहला, बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्य खुद को कम दंडित महसूस करेंगे. इससे दक्षिण और पश्चिम के कुछ हिस्सों में नाराजगी कम हो सकती है, जहां तर्क यह रहा है कि हम अधिक योगदान देते हैं, फिर भी हमारी हिस्सेदारी घटती रहती है. दूसरा, पिछड़े राज्यों को मिलने वाली राहत कम हो सकती है. यदि उनमें यह आशंका पैदा हो कि भविष्य के आयोग प्रदर्शन के हिस्से को लगातार बढ़ायेंगे, तो वे विशेष पैकेज, केंद्र प्रायोजित योजनाओं या विवेकाधीन अनुदानों आदि के लिए अधिक दबाव डाल सकते हैं. तीसरा, बातचीत ‘जरूरत’ से हटकर ‘योग्यता’ की ओर मुड़ सकती है.

यह राजनीतिक रूप से शक्तिशाली और सहकारी संघवाद के लिए जोखिम भरा है, क्योंकि गरीब क्षेत्रों को लगेगा कि व्यवस्था अब सुरक्षा कवच प्रदान नहीं करती. कथित उत्तर-दक्षिण तनाव कम होगा या नहीं, यह अन्य राजनीतिक और जनसांख्यिकीय कारकों पर निर्भर करेगा. राजनीतिक शक्ति का केंद्र-उत्तर और पूर्व में है, जबकि आर्थिक भार अधिक दक्षिण में है. यह संरचनात्मक असंतुलन केवल 16वें वित्त आयोग से दूर नहीं होगा. पर संवेदनशीलताओं को देखते हुए फॉर्मूले में कोई भी बदलाव व्यापक चिंता का कारण बन जायेगा. इसके अतिरिक्त, आगामी वित्त वर्ष के लिए रिजर्व बैंक से 3.1 लाख करोड़ रुपये का अधिशेष हस्तांतरण बजट में शामिल है, जो संघ के राजस्व का लगभग 10 फीसदी है. इसे भी राज्यों से साझा नहीं किया जाता.


सोलहवें वित्त आयोग को ‘निरंतरता में परिवर्तन’ कहा जा सकता है : वर्टिकल शेयर में स्थिरता, लेकिन हॉरिजेंटल फॉर्मूला में सार्थक संकेत. यह भारत के राजकोषीय संघवाद को शुद्ध ‘गैप फिलिंग नैरेटिव’ से हटाकर एक मिश्रित मॉडल की ओर ले जाता है. कुछ हद तक यह संघ और राज्यों के बीच राजकोषीय सौदेबाजी को स्थायी राजनीतिक खींचतान बनने से रोकता है. किंतु इसकी वैधता निष्पक्ष और पारदर्शी नियमों पर निर्भर करती है, न कि गैर-साझा करों के माध्यम से अप्रत्यक्ष उपायों को प्रोत्साहित करने पर. भारत को एक विश्वसनीय समानिकीकरण प्रणाली की जरूरत है, ताकि हर नागरिक को जन्मस्थान की परवाह किये बिना न्यूनतम गुणवत्ता की सार्वजनिक सेवाएं मिल सकें, और साथ ही ऐसी प्रशासनिक संस्कृति की भी, जो गरीब राज्यों को स्थायी निर्भरता में फंसाये बगैर वृद्धि, सुधार और राजस्व प्रयास को पुरस्कृत करे. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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By अजित रानाडे

अजित रानाडे is a contributor at Prabhat Khabar.

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