Climate change : झारखंड के हजारीबाग जिले के चुरचू प्रखंड में 13 फरवरी की रात आफत बनकर आयी. यहां हाथियों के हमले में सात लोगों की मौत हो गयी. अभी पिछले महीने ही झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले में नौ दिनों में 19 लोग जंगली हाथियों के पैरों तले कुचल कर मारे गये. बीते एक महीने में छत्तीसगढ़ के कोरबा, बलरामपुर, जशपुर आदि में जंगली हाथियों के गांव-बस्ती पर हमले की 50 से अधिक घटनाएं हुईं, जिनमें बहुत से खेत-मकान नष्ट हुए और दो लोग मारे भी गये. ओडिशा के बालासोर में हाथियों से भयभीत प्रशासन ने दस दिनों के लिए स्कूल बंद करवा दिया. अभी 20 दिसंबर को ही असम के होजाई जिले में रेलगाड़ी से टक्कर के बाद नौ हाथी मारे गये थे. छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में 25 वर्षों में 170 मनुष्यों और 75 हाथियों की मौत हो चुकी है.
जब इस वर्ष बढ़िया बरसात हुई है, जंगलों में पर्याप्त हरियाली और पानी है, फिर भी हाथी बस्ती में क्यों आ रहे हैं? आखिर उनका गुस्सा समाज के लिए जानलेवा क्यों हो रहा है? बढ़िया मॉनसून के बाद भी हाथियों का आक्रामक होना दर्शाता है कि संकट केवल ‘भोजन’ का नहीं, बदलते ‘पारिस्थितिकी तंत्र’ और हाथियों के ‘मानसिक स्वास्थ्य’ का है. हाथियों वाले इन क्षेत्रों में आमतौर पर अधिक सर्दी नहीं होती, पर इस वर्ष अप्रत्याशित रूप से यहां तापमान बहुत कम दर्ज हुआ. वहीं जलवायु परिवर्तन के कारण जंगलों में ‘लैंटाना कमारा’ जैसी जहरीली झाड़ियां देशी घास को खत्म कर रही हैं. जंगल ऊपर से हरा दिखता है, पर नीचे हाथियों के खाने योग्य चारा खत्म हो चुका है.
जंगली चारे में पोषक तत्वों की कमी के कारण हाथी ‘हाई-प्रोटीन’ फसलों जैसे धान, मक्का और गन्ने की ओर आकर्षित होते हैं. ‘भारत के एलीफैंट मैन’ के नाम से प्रसिद्ध प्रोफेसर रमन सुकुमार के 2003 में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, हाथी एक सोची-समझी रणनीति के तहत खेतों में आते हैं, क्योंकि वहां उन्हें कम मेहनत में अधिक पौष्टिक आहार मिलता है. इसके अतिरिक्त, जब एक हाथी अपने पूर्वजों द्वारा इस्तेमाल किये गये रास्ते या कॉरिडोर पर अचानक कोई सड़क, रेल लाइन या बिजली का पावर हाउस देखता है, तो वह ‘भ्रमित’ हो जाता है. भ्रम की यह स्थिति तनाव पैदा करती है, और जब ग्रामीण उसे भगाने की कोशिश करते हैं, तो वह तनाव ‘आक्रामकता’ में बदल जाता है.
बीते कुछ वर्षों में हाथी के पैरों तले कुचलकर मरने वाले मनुष्यों की संख्या तो बढ़ी ही है, पिछले तीन वर्षों के दौरान लगभग 300 हाथी भी मारे गये हैं. ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, असम, केरल, कर्नाटक सहित 16 राज्यों में हाथियों का मानवों से टकराव बढ़ रहा है. अधिकांश संरक्षित क्षेत्रों में, जनसंख्या हाथियों के आवास के पास रहती है और वन संसाधनों पर निर्भर है. जंगल में मानव अतिक्रमण और खेतों में हाथियों की आवाजाही ने संघर्ष की स्थिति बनायी और इसी कारण हाथी खतरे में हैं. जंगली हाथियों के बस्तियों में घुसने को किसी राज्य की सीमा में बांधा जा नहीं सकता. ओडिशा के दंतैल और गुस्सैल हो गये जंगली हाथी छत्तीसगढ़ और झारखंड में अपनी खीझ मिटा रहे हैं. ‘इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस, बेंगलुरु’ के एक अध्ययन में बताया गया है कि ओडिशा में उपलब्ध जंगल और संसाधन अधिकतम 1,700 हाथियों के लिए है, जबकि आज यहां गजराज की संख्या 2,100 से अधिक है. इस तरह, 400 से अधिक हाथियों को भोजन, पानी और आने वाला पर्यावास संकट सामने दिख रहा है, सो यह झुंड इधर-उधर भटक रहा है. हाथियों को अपने भोजन-पानी के लिए प्रतिदिन 18 घंटे तक भटकना पड़ता है. हाथी दिखने में भले ही भारी-भरकम हैं, पर उनका मिजाज नाजुक और संवेदनशील होता है. थोड़ी-सी भी थकान या भूख उन्हें तोड़ कर रख देती है. ऐसे में, थके जानवर के प्राकृतिक घर, यानी जंगल को जब नुकसान पहुंचाया जाता है, तब मनुष्य से उसकी भिड़ंत होती है.
यदि हाथियों के पास पर्याप्त बड़ा जंगल (कम से कम 500-1000 वर्ग किमी) नहीं है, तो वे मानव बस्तियों पर निर्भर हो जाते हैं. एक तरफ घने जंगल कम हो रहे हैं, दूसरी ओर जंगलों में निरंतर खनन, रेल, सड़क परिवहन आदि बढ़ रहा है. इसके चलते हाथियों का नींद चक्र प्रभावित हो रहा है, जिससे उनमें चिड़चिड़ापन और क्रोध बढ़ रहा है. ब्लास्टिंग के शोर और धूल से विचलित होकर हाथी गांवों की ओर भाग रहे हैं. वर्ष 2018 में ‘पेरियार टाइगर कंजर्वेशन फाउंडेशन’ के केरल के हाथियों के हिंसक होने पर एक अध्ययन से पता चला कि जंगल में पारंपरिक पेड़ों को काटकर उनकी जगह नीलगिरी और बबूल बोने से हाथियों का भोजन समाप्त हुआ और यही उनके गुस्से का कारण बना.
पेड़ों की ये किस्में भूजल भी सोखती हैं, सो हाथियों के लिए पानी की कमी भी हुई. यह समस्या केवल वन विभाग की नहीं, बुनियादी ढांचा विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की है. गौरतलब है कि वन पारिस्थितिकी तंत्र और जैव विविधता को सहेजने में गजराज की महत्वपूर्ण भूमिका होती है. हाथी प्राकृतिक आपदाओं के पूर्वानुमान में भी बेजोड़ हैं. सो, जलवायु परिवर्तन के दबाव में हाथी के बदलते स्वभाव को समझना अब सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
