मशहूर फिल्‍म प्रोड्यूसर राजकुमार बड़जात्‍या का निधन
Advertisement

vishesh aalekh

  • Jan 12 2019 2:09AM

मनुष्य को पूरी तरह से जागृत करते विवेकानंद के सिद्धांत

मनुष्य को पूरी तरह से जागृत करते विवेकानंद के सिद्धांत
जीवन परिचय
 मूल नाम  : नरेंद्रनाथ दत्त
 जन्म  : 12 जनवरी, 1863 (कोलकाता)
 मृत्यु  : 4 जुलाई, 1902  रामकृष्ण मठ, बेलूर
 गुरु  : रामकृष्ण परमहंस
 कर्मक्षेत्र  : दार्शनिक, धर्म प्रवर्तक और संत
 विषय  : साहित्य, दर्शन और इतिहास
 विदेश यात्रा  : अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी,रूस और पूर्वी यूरोप में अनेक व्याख्यान
 
उठो, जागो और तब तक रुको नहीं, जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाये. 
यह जीवन अल्पकालीन है, संसार की विलासिता क्षणिक है, लेकिन जो दूसरों के लिए जीते हैं, वे वास्तव में जीते हैं.
 
गुलाम भारत में ये बातें स्वामी विवेकानंद ने कही थीं. उनकी इन बातों पर देश के लाखों युवा फिदा हो गये थे. कोलकाता में विश्वनाथ दत्त के घर में जन्मे नरेंद्रनाथ दत्त (स्वामी विवेकानंद) को सनातन धर्म के मुख्य प्रचारक के रूप में जाना जाता है. 
 
नरेंद्र के पिता पाश्चात्य सभ्यता में विश्वास रखते थे. वह चाहते थे कि उनका पुत्र भी पाश्चात्य सभ्यता के मार्ग पर चले, मगर नरेंद्र ने 25 साल की उम्र में घर-परिवार छोड़ कर संन्यासी का जीवन अपना लिया.
 
 परमात्मा को पाने की लालसा के साथ तेज दिमाग ने युवक नरेंद्र को देश के साथ-साथ दुनिया में विख्यात बना दिया. नरेंद्रनाथ दत्त के नौ भाई-बहन थे. पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता हाइकोर्ट में वकील और दादा दुर्गाचरण दत्त संस्कृत और पारसी के विद्वान थे.
 
 अपने युवा दिनों में नरेंद्र की अध्यात्म में रुचि हो गयी थी. स्वामी विवेकानंद ने दर्शनशास्त्र, धर्म, इतिहास, सामाजिक विज्ञान, कला और साहित्य जैसे विभिन्न विषयों को काफी पढ़ा. 
 
साथ ही उन्होंने वेद, उपनिषद्, भगवद्गीता, रामायण, महाभारत और पुराण को भी पढ़ा. नरेंद्रनाथ दत्त की जिंदगी में सबसे बड़ा मोड़ 1881 के अंत और 1882 के प्रारंभ में आया, जब वह अपने दो मित्रों के साथ दक्षिणेश्वर जाकर काली-भक्त रामकृष्ण परमहंस से मिले. यहीं से नरेंद्र का 'स्वामी विवेकानंद' बनने का सफर शुरू हुआ. 
 
सन् 1884 में पिता की अचानक मृत्यु से नरेंद्र को मानसिक आघात पहुंचा. उनका विचलित मन देख उनकी मदद रामकृष्ण परमहंस ने की. उन्होंने नरेंद्र को अपना ध्यान अध्यात्म में लगाने को कहा. मोह-माया से संन्यास लेने के बाद उनका नाम स्वामी विवेकानंद पड़ा.
 
 

Advertisement

Comments

Advertisement