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  • Apr 20 2017 6:28AM

संतुलित विदेशनीति के प्रतिमान

डाॅ नलिनी कांत झा
कुलपति, तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय
यों तो किसी भी देश की विदेशनीति न तो पूर्णतः यथार्थवादी हो सकती है और न पूर्णतः आदर्शवादी. शीर्ष नेता के व्यक्तित्व एवं तत्कालीन परिस्थितियों के अनुरूप आदर्श और यथार्थ का पलड़ा बदलता रहता है. नेहरू की विदेशनीति यथार्थ की तुलना में आदर्श से ज्यादा प्रभावित थी. 
 
भारत-चीन के नेतृत्व में एशियाई देशों के मध्य सहयोग के लिए उन्होंने गुटनिरपेक्षता पर अतिशय बल दिया. इससे भारत-चीन युद्ध के समय अमेरिका और ब्रिटेन की सैन्य सहायता के साथ सोवियत संघ की तटस्थता का लाभ तो मिला, परंतु सैन्य तैयारी की उपेक्षा से भारत को चीन से पराजित होना पड़ा. इसी तरह कश्मीर के मुद्दे को संयुक्तराष्ट्र को सौंप कर इस समस्या के समाधान को दुरूह बना दिया. इसका फल आज भी भारत भुगत रहा है. आइके गुजराल के नेतृत्व में तो भारत यथार्थवाद को भूल ही गया.
 
नरसिम्हा राव और अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में इस यथार्थ और आदर्शवाद के संतुलन को काफी हद तक ठीक किया गया. परंतु, संतुलन का सर्वोत्तम प्रतिमान नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में परिलक्षित हो रहा है.
 
समस्त विश्व को मित्र की दृष्टि से देखने की भारतीय संस्कृति के अनुरूप मोदी ने अपने शपथग्रहण के समय ही पड़ोसी राष्ट्रों के शासकों को निमंत्रित कर शांति और सहयोग की नीति का उत्कृष्ट नमूना प्रस्तुत किया. परंतु, पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आया, तो उसी मोदी की सेना ने पाकिस्तानी गोलियों का बदला मोर्टार से दिया. फिर भी उन्होंने शांति की आशा नहीं छोड़ी और रूस से लौटते समय दिसंबर 2015 में अचानक पाकिस्तान जा प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से मुलाकात की. 
 
जब-जब इस शांति नीति का जवाब पाकिस्तान ने पठानकोट और अन्य जगहों पर हिंसा फैला कर दिया, तो इसके प्रत्युत्तर में भारत की सेना ने पाकिस्तान में घुस कर सर्जिकल स्ट्राइक द्वारा आतंकवादी ठिकानों को नष्ट कर दिया.
 
इसी तरह चीन के साथ मित्रता का हाथ बढ़ाया, लेकिन जब चीन ने भारतीय सीमा पर अतिक्रमण किया, तो चीनी नेता की गुजरात यात्रा के समय ही मोदी ने कड़ी चेतावनी देकर भारत की यथार्थवादी नीति का परिचय दिया. एक तरफ अपनी कूटनीति के द्वारा भारत ने बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, अफगानिस्तान के साथ संबंध सुधारे, फलस्वरूप इस्लामाबाद में होनेवाले दक्षेस सम्मेलन में अफगान, नेपाल, भूटान और बांग्लादेश के सहयोग से पाकिस्तान अलग-थलग हुआ. वहीं दूसरी ओर, चीन के पड़ोसी राष्ट्रों- वियतनाम, फिलीपींस, इंडोनेशिया, मलेशिया से संबंध मजबूत कर चीन को घेरने की कोशिश भी की.
 
जहां तक महाशक्तियों के साथ संबंधों का प्रश्न है, मोदी सरकार पूर्ववर्ती नेताओं की तरह सारी महाशक्तियों से नजदीकी बनाये रखने की नीति पर न तो सिर्फ कायम है, बल्कि इसे और भी मजबूती देने का सफल प्रयास किया है. अमेरिका मोदी को वीजा देने को भी तैयार नहीं था, लेकिन उनकी प्रचंड बहुमत की सरकार बनने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने नयी दिल्ली की दो बार यात्रा की और भारत-अमेरिका के बढ़ते संबंधों को नयी गत्यात्मकता मिली. मोदी सरकार ने आॅस्ट्रेलिया, फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी और कनाडा के साथ संबंधों को प्रगाढ़ बनाया.
 
मोदी सरकार ने भारत के सॉफ्ट पावर के द्वारा योग और आयुर्वेद को विश्व में मान्यता दिला कर भारत और विश्व का कल्याण किया है. 
योग को स्वीकार करनेवाले राष्ट्रों में 46 इसलामी राष्ट्र भी शामिल हैं. इसके अतिरिक्त मोदी ने परस्पर विरोधी इसलामी देशों जैसे ईरान, सऊदी अरब आदि से अपने राजनीतिक एवं आर्थिक संबंधों को सुधार कर भारत की ऊर्जा सुरक्षा की समस्या को कम किया है. इसके साथ ही विश्व एवं भारत को यह संदेश दिया कि भारत देश के अंदर एवं बाहर विभिन्न मजहबों और आदर्शों में विश्वास करनेवाले लोगों और राष्ट्रों के साथ शांति एवं सहयोग का संबंध बना सकता है.
 
सही है कि भारतीय विदेश नीति के सामने समस्याएं कम नहीं हैं. अमेरिका एवं रूस के बीच बढ़ते तनावों के चलते रूस चीन की तरफ झुकता जा रहा है. पाकिस्तान 7000 किमी दूर अमेरिका से सैन्य संबंध रख कर भारत के लिए उतना खतरनाक नहीं, जितना भारत के पड़ोसी रूस और चीन के साथ सैन्य संबंध बना कर. चीन-पाकिस्तान के बीच मधुर संबंध हैं ही, परंतु रूस का पाकिस्तान और चीन की तरफ झुकना भारत के लिए खतरनाक है. 
 
अतः भारत को रूस और अमेरिका के बीच एक पुल की भूमिका निभा कर भारत पर बढ़ते हुए सामरिक खतरे को टालना चाहिए.
मोदी सरकार ने आतंकवाद आदि के विरुद्ध विभिन्न देशों को एकजुट होने का प्रयास कर भारत के आदर्शवादी एवं यथार्थवादी नीति में संतुलन का परिचय दिया है. निश्चित रूप से आदर्शवाद और यथार्थवाद के संतुलन की दृष्टि से नरेंद्र मोदी की विदेश नीति एक प्रतिमान है.
 

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