20 जुलाई को दिल्ली में छात्रों के संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हिंसक झड़प हुई थी. इसके बाद पुलिस कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों की ओर से सुरक्षा बलों पर कथित हमलों- दोनों को लेकर आरोप लगे.
सुप्रीम कोर्ट ने अब इन आरोपों की स्वतंत्र जांच के लिए समिति बनाई है.
1. आखिर Gen Z सड़क पर क्यों उतरी?
इस पूरी कहानी की शुरुआत सिर्फ एक प्रदर्शन से नहीं हुई. इसके पीछे NEET परीक्षा में कथित पेपर लीक, परीक्षा व्यवस्था को लेकर नाराजगी और युवाओं के भविष्य को लेकर बढ़ती बेचैनी थी.
जुलाई में शुरू हुआ छात्र आंदोलन धीरे-धीरे व्यापक युवा आंदोलन में बदल गया. दिल्ली में बड़ी संख्या में छात्र और युवा संसद की ओर मार्च करने पहुंचे. अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भी इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल के दौरान सामने आए सबसे बड़े राजनीतिक संकटों में से एक के रूप में रिपोर्ट किया.
यहां एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई देता है- शिक्षा से शुरू हुआ मुद्दा धीरे-धीरे शासन और जवाबदेही का सवाल बन गया.
युवाओं का सवाल था: अगर प्रतियोगी परीक्षाएं ही भरोसेमंद नहीं रहेंगी, तो उनकी वर्षों की मेहनत का क्या होगा?
2. संसद मार्च के दिन क्या हुआ?
20 जुलाई को प्रदर्शनकारियों ने संसद की ओर मार्च करने की कोशिश की. पुलिस ने बैरिकेड लगाए थे और मार्च को रोकने की कोशिश की. इसके बाद स्थिति तनावपूर्ण हुई और झड़पें हुईं.
प्रदर्शनकारियों की ओर से आरोप लगाया गया कि पुलिस और सुरक्षा बलों ने जरूरत से ज्यादा बल का इस्तेमाल किया. दूसरी तरफ पुलिस का कहना रहा कि प्रदर्शनकारियों के हिंसक होने के बाद बल प्रयोग किया गया और सुरक्षा बलों के जवान भी घायल हुए.
यानी इस मामले में एकतरफा कहानी नहीं है.
इसीलिए सुप्रीम कोर्ट की जांच खास महत्व रखती है- क्योंकि अदालत ने सिर्फ पुलिस कार्रवाई की जांच का आदेश नहीं दिया, बल्कि प्रदर्शनकारियों की ओर से सुरक्षा बलों पर हुई कथित हिंसा को भी जांच के दायरे में रखा है.
Read more: जंतर मंतर... एक प्रदर्शन, कई मायने!
3. सुप्रीम कोर्ट ने अब क्या किया?
सुप्रीम कोर्ट ने पांच सदस्यीय High-Powered Enquiry Committee बनाई है. इसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी करेंगे.
समिति में पूर्व न्यायाधीशों और वरिष्ठ सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारियों को भी शामिल किया गया है. अदालत ने समिति से कहा है कि वह पुलिस और सुरक्षा बलों द्वारा कथित अत्यधिक बल प्रयोग के साथ-साथ प्रदर्शनकारियों की ओर से हुई हिंसा के आरोपों की भी जांच करे.
खास बात यह है कि जांच केवल एक बार की औपचारिक कवायद नहीं होगी. अदालत ने समिति से निरंतर और समय-समय पर आकलन करने तथा अंतरिम रिपोर्ट देने को कहा है.
4. महिला प्रदर्शनकारियों को लेकर आरोप क्यों गंभीर हैं?
सुप्रीम कोर्ट ने कुछ आरोपों को विशेष प्राथमिकता देने को कहा है. इनमें महिला प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित टारगेटेड हिंसा, उत्पीड़न और छेड़छाड़/यौन दुर्व्यवहार के आरोप भी शामिल हैं.
इसके अलावा प्रदर्शनकारियों को लगी गंभीर चोटों और सुरक्षा बलों के खिलाफ कथित हिंसा की भी जांच होगी.
यही वह बिंदु है जहां यह मामला सिर्फ NEET या छात्र आंदोलन का नहीं रह जाता.
यह सवाल बन जाता है कि लोकतांत्रिक विरोध के दौरान राज्य की पुलिस शक्ति की सीमा क्या है और भीड़ के हिंसक होने की स्थिति में सुरक्षा बलों की जवाबदेही कैसे तय होगी?
5. क्या Gen Z आंदोलन खत्म हो गया या नई राजनीति शुरू हुई?
यह शायद इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सवाल है.
आंदोलन की शुरुआत परीक्षा और युवाओं की समस्याओं से हुई थी, लेकिन इसके बाद इसने राजनीतिक जवाबदेही का रूप ले लिया. आंदोलन के दबाव के बीच तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की घटना ने इसे और बड़ा राजनीतिक प्रतीक बना दिया.
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की जांच एक नया अध्याय खोलती है.
अब बहस सिर्फ यह नहीं होगी कि छात्र सही थे या सरकार?
बहस यह होगी कि-
क्या शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार लोकतंत्र की बुनियादी ताकत है?
कब प्रदर्शन कानून-व्यवस्था की समस्या बन जाता है?
और जब पुलिस तथा प्रदर्शनकारी दोनों पर हिंसा के आरोप हों, तो निष्पक्ष जवाबदेही कैसे तय की जाए?
Gen Z से आगे की कहानी
इस आंदोलन की एक और खासियत है, इसकी डिजिटल प्रकृति.
सोशल मीडिया ने युवाओं को तेजी से संगठित किया और आंदोलन को अलग-अलग शहरों तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई. National/International media ने भी आंदोलन को डिजिटल माध्यमों से ताकत पाने वाले युवा राजनीतिक उभार के रूप में रेखांकित किया है.
इसलिए सुप्रीम कोर्ट की जांच को केवल 20 जुलाई की झड़प तक सीमित करके देखना शायद पूरी तस्वीर नहीं होगी.
यह भारत की नई पीढ़ी और राज्य के बीच बदलते रिश्ते की भी कहानी है.
NEET पेपर लीक से शुरू हुआ सवाल अब सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर पहुंच चुका है- और अगला सवाल यह है कि इस जांच के बाद भारतीय लोकतंत्र में छात्र आंदोलनों और पुलिस कार्रवाई के लिए कौन-सी नई सीमाएं तय होती हैं.
Read more: NEET पर PM Modi की रील… क्या कह रहे हैं ये आंकड़े?
