Congress: पश्चिम बंगाल में एकला चलो की रणनीति पर काम करेगी कांग्रेस

भाजपा के साथ मुख्य मुकाबला होने की स्थिति में अल्पसंख्यक वोट को साधने में तृणमूल कांग्रेस को आसानी होगी. पार्टी यह बताने की कोशिश करेगी कि भाजपा को हराने में सिर्फ तृणमूल कांग्रेस ही सक्षम है और इससे मतों का ध्रुवीकरण होगा. पार्टी का मानना है कि कांग्रेस और वाम दलों के मजबूत होने का सियासी नुकसान तृणमूल कांग्रेस को ही होगा.

Congress: पश्चिम बंगाल में अप्रैल में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर दिल्ली में सरगर्मी तेज है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के हालिया दिल्ली दौरे के बाद यह सरगर्मी और ज्यादा बढ़ गयी है. जो कांग्रेस पश्चिम बंगाल पर अब तक खुलकर बोलने से परहेज कर रही थी, अब वह भी ऐकला चलो की राह पर है. कांग्रेस के बंगाल प्रभारी गुलाम अहमद मीर ने भी आज की बैठक के बाद यह कहा कि पार्टी के सभी नेताओं से चर्चा के बाद यह तय किया गया कि पार्टी बंगाल के सभी 294 विधानसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ेगी. पूर्व में गठबंधन का अनुभव अच्छा नहीं रहा है और गठबंधन से जमीनी स्तर पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा है. इस बार कांग्रेस भी राज्य के नेताओं की बात मानकर ही चुनाव में उतरेगी. पिछले तीन बार से तृणमूल कांग्रेस चुनाव में शानदार प्रदर्शन कर रही है. पहली बार वर्ष 2011 में वाम मोर्चा के तीन दशक से अधिक लंबे शासन के खात्मे के लिए तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस ने मिलकर चुनाव लड़ा था. लेकिन समय के साथ कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच राजनीतिक तौर पर दूरी बढ़ती गयी. बाद के चुनाव में कांग्रेस और वाम दलों ने मिलकर चुनाव लड़ा, लेकिन कामयाबी हासिल नहीं हो सकी. 

केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद राष्ट्रीय स्तर पर राजनीति में बदलाव आया. समय के साथ पश्चिम बंगाल में भाजपा विपक्ष की सबसे मजबूत आवाज बन गयी और पिछले चुनाव में वह 77 सीट जीतकर प्रमुख विपक्षी दल भी बन गयी. पश्चिम बंगाल में भाजपा के उभार के बाद राष्ट्रीय स्तर पर तृणमूल कांग्रेस विपक्षी गठबंधन के साथ दिखने की कोशिश करती रही, लेकिन कांग्रेस से दूरी बनी रही. राज्य के स्थानीय कांग्रेस नेता भले ही मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ आक्रामक रहे, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व राष्ट्रीय राजनीति के मद्देनजर कभी भी खुलकर ममता बनर्जी का विरोध नहीं कर सका. पार्टी के इस अंतर्विरोध के कारण राज्य में कांग्रेस का जनाधार सिकुड़ता चला गया. 

आगामी विधानसभा चुनाव में भी गठबंधन की उम्मीद थी, लेकिन तृणमूल कांग्रेस ने पहले ही अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी. जानकारों का कहना है कि तृणमूल कांग्रेस की राज्यसभा सांसद मौसम नूर के कांग्रेस में शामिल होने के बाद तृणमूल कांग्रेस ने कांग्रेस से किसी तरह का गठबंधन नहीं करने का फैसला लिया. वहीं दूसरी ओर यह भी कहा जा रहा है कि मौसम नूर को तृणमूल से वापस कांग्रेस में लेने को लेकर तृणमूल की ओर से कांग्रेस नेताओं को आपत्ति जतायी गयी थी, लेकिन कांग्रेस ने इस पर ध्यान नहीं दिया. इससे मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी नाराज हो गयी. उसके बाद आधिकारिक रूप से कांग्रेस के साथ किसी तरह का गठबंधन न करने का बयान आने लगे. वहीं मौसम नूर ने भी कांग्रेस आलाकमान को यह समझाने में सफल रही कि कांग्रेस का भविष्य राज्य में अलग चुनाव लड़ने पर ही है. अब कांग्रेस ने भी राज्य में अकेले चुनाव लड़ने का फैसला लिया है. गुरुवार को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के आवास पर पश्चिम बंगाल के नेताओं के साथ हुई बैठक में अकेले चुनाव लड़ने का फैसला लिया गया.  


रणनीति के तहत कांग्रेस से गठबंधन नहीं कर रही है तृणमूल कांग्रेस

भाजपा के उभार के बाद पश्चिम बंगाल में मुख्य मुकाबला तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच हो गया है. पिछले 15 साल से तृणमूल कांग्रेस सत्ता पर काबिज है. कांग्रेस को लगता है कि गठबंधन करने से सरकार विरोधी मत भाजपा के पाले में जा सकता है. साथ ही राज्य में मुस्लिम मतों के लिए तृणमूल कांग्रेस के पूर्व नेता हुमायूं कबीर सांसद असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के साथ गठजोड़ करने की कोशिश कर रहे है. तृणमूल कांग्रेस का मानना है कि वाम दलों और कांग्रेस की मौजूदगी से सरकार विरोधी वोटों का बंटवारा होगा और इसका फायदा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को होगा. 


तृणमूल कांग्रेस का मानना है कि राज्य में कांग्रेस और वामदलों का जनाधार सिकुड़ गया है और दोनों दल कुछ खास इलाके तक सिमट कर रह गए है. ऐसे में इन दलों के साथ गठबंधन करने का सियासी नुकसान हो सकता है. साथ ही भाजपा के साथ मुख्य मुकाबला होने की स्थिति में अल्पसंख्यक वोट को साधने में तृणमूल कांग्रेस को आसानी होगी. तृणमूल यह बताने की कोशिश करेगी कि भाजपा को हराने में सिर्फ तृणमूल कांग्रेस ही सक्षम है और इससे मतों का ध्रुवीकरण होगा. बंगाल कांग्रेस के नेताओं का भी मानना है कि ममता बनर्जी राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा से लड़ने की बात करती हैं, लेकिन राज्य में वह नहीं चाहती कि कांग्रेस और वाम दल मजबूत हो सके. क्योंकि कांग्रेस और वाम दलों के मजबूत होने का सियासी नुकसान तृणमूल कांग्रेस को होगा. 

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Published by: Anjani kumar singh

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