नई दिल्ली में 18वें BRICS शिखर सम्मेलन ने दुनिया का ध्यान खींचा. एक ही मंच पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन दिखाई दिए. यह तस्वीर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत एक साथ कई शक्ति-केंद्रों के साथ संबंध संभाल रहा है.
Xi की भारत यात्रा करीब सात वर्षों बाद हुई. सम्मेलन के इतर मोदी और Xi की मुलाकात में सीमा विवाद, व्यापार असंतुलन और द्विपक्षीय संबंधों को स्थिर करने जैसे मुद्दे भी उठे.
यानी BRICS भारत के लिए केवल बहुपक्षीय सम्मेलन नहीं है. यह उसकी strategic autonomy की वास्तविक परीक्षा भी है.
10 देश, अलग हित… फिर भी बनी सहमति
BRICS का विस्तार जितना इसकी ताकत है, उतनी ही बड़ी चुनौती भी. अब समूह में एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका की अलग-अलग अर्थव्यवस्थाएं और राजनीतिक व्यवस्थाएं शामिल हैं.
इसके भीतर China और India की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा है. Iran और UAE पश्चिम एशिया के मौजूदा संघर्ष में अलग-अलग स्थितियों में हैं. Russia पश्चिम के साथ गहरे टकराव में है.
इसके बावजूद नई दिल्ली घोषणापत्र पर सहमति बनना अपने आप में महत्वपूर्ण है. घोषणापत्र में आपसी सम्मान, संप्रभु समानता, समावेशिता और consensus को BRICS की बुनियादी भावना के रूप में दोहराया गया है.
भारत के लिए यही पहली उपलब्धि है—मतभेद खत्म किए बिना सहमति बनाना.
आतंकवाद पर भारत को क्या मिला?
भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में से एक आतंकवाद से जुड़ा है.
नई दिल्ली घोषणापत्र में 22 अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले की कड़ी निंदा की गई है. इसके साथ आतंकवादियों की सीमा-पार आवाजाही, आतंकी वित्तपोषण और सुरक्षित पनाहगाहों के खिलाफ कार्रवाई की बात कही गई है.
यह भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि BRICS में China भी शामिल है.
नई दिल्ली के लिए चुनौती अब यह है कि आतंकवाद पर बने इस साझा रुख को सिर्फ घोषणापत्र की भाषा न रहने दिया जाए, बल्कि इसे व्यावहारिक अंतरराष्ट्रीय सहयोग में बदला जाए.
West Asia में भारत की कूटनीति की अगली परीक्षा
BRICS सम्मेलन ऐसे समय हुआ जब West Asia में युद्ध का असर वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों पर पड़ रहा है.
Iran और UAE जैसे देशों की मौजूदगी ने इस मुद्दे को और संवेदनशील बना दिया. फिर भी BRICS देशों ने संयुक्त बयान में संयम और संवाद-कूटनीति पर जोर दिया.
भारत के लिए यह अवसर भी है और चुनौती भी.
नई दिल्ली को Russia, Iran और Gulf देशों के साथ अपने संबंधों को संभालते हुए अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी भी बनाए रखनी है. यही वह जगह है जहां भारत की multi-alignment policy की असली उपयोगिता सामने आती है.
China सबसे बड़ी चुनौती क्यों है?
BRICS की आर्थिक ताकत में China का वजन बहुत बड़ा है. लेकिन भारत के लिए China एक साथ साझेदार और रणनीतिक प्रतिस्पर्धी दोनों है.
भारत BRICS के जरिए Global South के साथ आर्थिक और तकनीकी सहयोग बढ़ाना चाहता है, लेकिन उसे यह भी देखना होगा कि समूह के भीतर बढ़ता China-centric आर्थिक प्रभाव उसकी अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता को सीमित न करे.
इसलिए भारत की नीति का मूल सवाल यह नहीं है कि China के साथ है या China के खिलाफ.
सवाल यह है कि China के साथ काम करते हुए भारत अपने हितों की रक्षा कैसे करता है.
BRICS की अपनी currency? असली मुद्दा कुछ और
BRICS की चर्चा होते ही एक सवाल बार-बार सामने आता है—क्या डॉलर को चुनौती देने के लिए इसकी अपनी currency आएगी?
फिलहाल भारत ने साफ किया है कि BRICS में साझा मुद्रा शुरू करने का कोई प्रस्ताव नहीं है. चर्चा स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और cross-border payment व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने पर है.
इसका मतलब डॉलर का तत्काल विकल्प बनाना नहीं, बल्कि देशों के लिए अधिक भुगतान विकल्प तैयार करना है.
भारत के लिए यही ज्यादा व्यावहारिक रास्ता है.
भारत की अपनी ताकत क्या है?
भारत BRICS में केवल एक बड़ा बाजार नहीं है.
उसके पास Digital Public Infrastructure, डिजिटल भुगतान और तकनीकी सार्वजनिक अवसंरचना का ऐसा अनुभव है, जिसे दूसरे विकासशील देश अपनाना चाहते हैं.
नई दिल्ली घोषणापत्र में Digital Public Infrastructure और AI सहयोग को भी महत्व दिया गया है.
यहीं भारत BRICS में अपनी अलग भूमिका बना सकता है—सिर्फ राजनीतिक बयान देने वाले देश के रूप में नहीं, बल्कि solutions देने वाले देश के रूप में.
Global South की आवाज बनने का मौका
भारत लंबे समय से Global South की आवाज को मजबूत करने की बात करता रहा है. BRICS इसके लिए बड़ा मंच उपलब्ध कराता है.
घोषणापत्र में संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक संस्थाओं में सुधार की मांग दोहराई गई है. China और Russia ने UN में भारत और Brazil की बड़ी भूमिका की आकांक्षाओं के समर्थन को भी दोहराया है.
लेकिन यहां भी भारत को एक बात याद रखनी होगी—समर्थन और वास्तविक सुधार में अंतर होता है.
भारत की असली सफलता तभी मानी जाएगी जब वैश्विक संस्थाओं में उसकी भूमिका वास्तव में बढ़े.
असली परीक्षा सम्मेलन के बाद होगी
यही इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है.
भारत ने BRICS में consensus बनाने, आतंकवाद पर साझा भाषा तैयार करने, Global South की आवाज को मजबूत करने और आर्थिक-तकनीकी सहयोग को आगे बढ़ाने की कोशिश की है.
लेकिन अध्यक्षता खत्म होने के बाद यह सब कितना टिकता है?
2027 में BRICS की अध्यक्षता China के पास जाएगी. इसलिए भारत की विरासत का असली परीक्षण अब होगा—क्या उसके द्वारा शुरू किए गए mechanisms, working groups, payment initiatives, climate platforms और institutional reforms आगे भी चलते हैं? नई दिल्ली घोषणापत्र खुद continuity और institutional development पर जोर देता है.
सर्वसम्मति पहली जीत, निरंतरता असली परीक्षा
BRICS में भारत ने एक कठिन काम किया है—अलग-अलग हितों वाले देशों को एक साझा दस्तावेज पर साथ लाना.
लेकिन आज की दुनिया में सिर्फ घोषणाएं पर्याप्त नहीं हैं.
भारत की असली परीक्षा यह होगी कि क्या वह BRICS को ऐसा मंच बना सकता है, जहां China का दबदबा होने के बावजूद भारतीय हित सुरक्षित रहें, Global South को वास्तविक लाभ मिले और घोषणाओं की जगह ठोस परिणाम दिखाई दें.
Xi और Putin की मौजूदगी ने नई दिल्ली सम्मेलन को ऐतिहासिक जरूर बनाया है. लेकिन आने वाले वर्षों में इस सम्मेलन को याद इस बात के लिए किया जाएगा कि भारत ने BRICS में क्या कहा था—या इस बात के लिए कि भारत ने वास्तव में क्या बदल दिया.
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