जहां कभी गरजती थीं बंदूकें, वहां अब गूंज रही है भक्ति की बयार

नक्सलवाद की अंधेरी गुफाओं से निकलकर भक्ति, शांति व विकास का प्रतीक बना बरवाडीह गांव

नक्सलवाद की अंधेरी गुफाओं से निकलकर भक्ति, शांति व विकास का प्रतीक बना बरवाडीह गांव जितेंद्र सिंह, गढ़वा गढ़वा जिले के चिनिया प्रखंड का सुदूरवर्ती बरवाडीह गांव कभी नक्सलियों का गढ़ माना जाता था. जहां दिन में भी बंदूकें गरजती थीं और लोग भय में जीते थे, वहीं अब नवरात्रि पर भक्ति और आस्था की गूंज सुनायी देती है. इस वर्ष यहां 25 लाख रुपये की लागत से भव्य दुर्गा पूजा का आयोजन किया जा रहा है. बरवाडीह में पूजा की परंपरा 1965-70 के दशक से चली आ रही है. पहले यह तिरपाल और लकड़ी के सहारे होती थी, लेकिन अब कोलकाता से आये कारीगरों ने शानदार पंडाल बनाया है. वाराणसी के पंडित वैदिक विधि से पूजा करा रहे हैं. हर शाम वृंदावन से आये कलाकार रासलीला प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसे देखने आसपास के गांवों से भी भीड़ उमड़ रही है. भव्य भंडारे का होता है आयोजन, घरों में नहीं जलता है चूल्हा यहां प्रतिदिन 3000 से अधिक लोग भंडारे में प्रसाद ग्रहण करते हैं. पंचायत की मुखिया पम्मी देवी और पूर्व जिला 20 सूत्री उपाध्यक्ष नितेश कुमार सिंह ने बताया कि 2021 से यह परंपरा मां विमला ठाकुर की स्मृति में शुरू हुई थी. अब लगातार हर साल एकम से नवमी तक गांव में घरों का चूल्हा नहीं जलता, लोग सामूहिक प्रसाद ग्रहण करते हैं और रासलीला का आनंद लेते हैं. नक्सलवाद से विकास तक का सफर वर्ष 2002 तक यह गांव नक्सलियों के कब्जे में था. इसी गांव का सतन यादव भाकपा माओवादी का सब-जोनल कमांडर भी था, जिसके कारण लंबे समय तक गांव में खौफ का माहौल रहा. लेकिन पिछले डेढ़ दशक में प्रशासनिक प्रयासों और ग्रामीणों की इच्छाशक्ति से हालात बदले. गांव में पुलिस पिकेट स्थापित हुआ, सड़क, बिजली, पानी और शिक्षा की सुविधाएं पहुंचीं और बरवाडीह शांति और विकास की राह पर बढ़ चला. पूजा समिति की सराहनीय भूमिका इस आयोजन में दुर्गा पूजा समिति की अहम भूमिका है. अध्यक्ष प्रवीण यादव, सचिव चंद्रदेव यादव, कोषाध्यक्ष किशोर साव, उपाध्यक्ष रमाशंकर गुप्ता, विनोद रवि, सलाहकार कुलदीप चंद्रवंशी, युवा अध्यक्ष लव चंद्रवंशी, सचिव विजय पासवान, कोषाध्यक्ष आनंद सिंह, सदस्य नीरज पासवान और संतोष सिंह के सामूहिक प्रयासों से बरवाडीह की दुर्गा पूजा पूरे जिले में भक्ति और सामाजिक एकता का प्रतीक बन चुकी है.

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Author: Akarsh Aniket

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