पराली जलाने से बंजर हो रहे खेत, घट रही उर्वरा शक्ति

बक्सर. जिले की कृषि भूमि धीरे-धीरे अपनी प्राकृतिक ताकत खोती जा रही है. खेतों की मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन का स्तर लगातार गिर रहा है, जिससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति

बक्सर. जिले की कृषि भूमि धीरे-धीरे अपनी प्राकृतिक ताकत खोती जा रही है. खेतों की मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन का स्तर लगातार गिर रहा है, जिससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति कमजोर पड़ने लगी है. कृषि विशेषज्ञ इसे खेती के भविष्य के लिए गंभीर खतरे के रूप में देख रहे हैं. मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की कमी का सीधा असर फसल उत्पादन, जल संरक्षण और किसानों की लागत पर पड़ रहा है.मिट्टी जांच प्रयोगशाला से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार जिले की मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन का स्तर हर वर्ष घट रहा है.जहां वित्तीय वर्ष 2022-23 में यह 0.51 प्रतिशत था, वहीं 2023-24 में घटकर 0.43 प्रतिशत और 2024-25 में 0.41 प्रतिशत तक पहुंच गया.विशेषज्ञों के अनुसार स्वस्थ मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन की मात्रा कम से कम 0.5 से 0.7 प्रतिशत होनी चाहिए. मिट्टी की संरचना हो रही कमजोर ऑर्गेनिक कार्बन मिट्टी को जीवित बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है. यह मिट्टी के कणों को आपस में जोड़कर उसकी संरचना मजबूत करता है. इसकी कमी से मिट्टी सख्त होती जा रही है, जिससे जुताई कठिन हो रही है. खेतों में नमी टिक नहीं पा रही और सिंचाई की जरूरत बढ़ती जा रही है. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार अब बारिश का पानी भी जमीन में समाने के बजाय बह जा रहा है.इससे एक ओर जल संरक्षण प्रभावित हो रहा है तो दूसरी ओर भूजल स्तर पर भी असर पड़ रहा है. खत्म हो रहे लाभकारी जीवाणु मिट्टी में मौजूद केंचुए, मित्र बैक्टीरिया और फंगस खेती के लिए बेहद जरूरी होते हैं. ये जीव पौधों को पोषक तत्व उपलब्ध कराने में मदद करते हैं.लेकिन ऑर्गेनिक कार्बन की कमी के कारण मिट्टी की जैविक सक्रियता लगातार घट रही है.इससे खेतों की प्राकृतिक उर्वरा शक्ति कमजोर पड़ती जा रही है. बढ़ रही रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता जिले में खेती अब तेजी से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर होती जा रही है. किसान अधिक उत्पादन की उम्मीद में लगातार यूरिया और डीएपी का उपयोग बढ़ा रहे हैं.लेकिन मिट्टी में कार्बन की कमी के कारण पौधे इन उर्वरकों का पूरा लाभ नहीं ले पा रहे हैं. इससे खेती की लागत बढ़ रही है और मिट्टी की गुणवत्ता लगातार खराब हो रही है. हर साल बढ़ रही पराली जलाने की घटनाएं जिले में फसल अवशेष जलाने की घटनाओं में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है. कृषि विभाग के अनुसार खरीफ फसल के दौरान वर्ष 2022 में 253 मामले सामने आए थे. यह संख्या वर्ष 2023 में बढ़कर 547 और वर्ष 2024 में 731 तक पहुंच गई.वहीं रवि फसल में वर्ष 2022 में 185, वर्ष 2023 में 275 और वर्ष 2024 में 982 मामले दर्ज किए गए. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार पराली जलाने से मिट्टी की ऊपरी सतह में मौजूद पोषक तत्व और सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं, जिससे ऑर्गेनिक कार्बन तेजी से कम होता है. उर्वरकों की खपत के आंकड़े भी बढ़ा रहे चिंता कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार जिले में यूरिया और डीएपी की खपत लगातार अधिक बनी हुई है,वित्तीय वर्ष 2023-24 खरीफ फसल में 29282.11 एमटी यूरिया और 6604.1 एमटी डीएपी का उपयोग,रवि फसल में 36710.16 एमटी यूरिया और 9526.65 एमटी डीएपी की खपत,वित्तीय वर्ष 2024-25 खरीफ फसल में 18837.935 एमटी यूरिया और 3592.800 एमटी डीएपी का उपयोग रवि फसल में 36257.420 एमटी यूरिया और 7000.625 एमटी डीएपी की खपत वित्तीय वर्ष 2025-26 खरीफ फसल में 29607.287 एमटी यूरिया और 5558.425 एमटी डीएपी का उपयोग रवि फसल में 39968.763 एमटी यूरिया और 8361.85 एमटी डीएपी की खपत जैविक उपाय ही बचा सकते हैं मिट्टी की सेहत कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए किसानों को फसल अवशेष जलाने से बचना होगा,खेतों में गोबर खाद, वर्मी कम्पोस्ट, हरी खाद और जैविक उर्वरकों का उपयोग बढ़ाना जरूरी है, साथ ही संतुलित मात्रा में रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग और नियमित मिट्टी जांच कराना भी आवश्यक है,विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में खेती की उत्पादकता और किसानों की आय दोनों पर बड़ा असर पड़ सकता है. बक्सर से प्रशांत कुमार राय की रिपोर्ट

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