रनिया. रनिया प्रखंड के रोगड़ा गांव में आजादी के सात दशक बाद भी बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंची हैं. प्रखंड मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर दूर गांव में करीब 65 आदिवासी और रौतिया परिवार निवास करते हैं. ग्रामीणों के लिए आज तक शुद्ध पेयजल की समुचित व्यवस्था नहीं हो सकी है. ग्रामीणों को पीने के लिए दूषित पानी पर निर्भर रहना पड़ता है. गांव में जो चापाकल लगाये गये हैं उनमें अधिकांश खराब है. जिसमें पानी आ रहा है उसमें भी गंदा और दुर्गंधयुक्त पानी आ रहा है. ग्रामीण एक कुआं से पानी लेते हैं. उसमें भी बाहर का गंदा पानी चला जाता है. जिससे उन्हें साफ पानी नहीं मिल पा रहा है. गांव में पीने के पानी की समस्या के कारण सरकार द्वारा निर्मित शौचालय बेकार साबित हो रहे हैं. मजबूरी में ग्रामीणों को खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है. जिससे महिलाओं, बच्चों एवं बुजुर्गों को अतिरिक्त कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. वहीं ग्रामीण हाथियों के आतंक से भी परेशान हैं. आये दिन हाथी उनकी फसल और घरों को नुकसान पहुंचा रहे हैं. ग्रामीणों ने प्रशासन से अविलंब शुद्ध पेयजल की व्यवस्था, सोलर जलमीनार की स्थापना, खराब चापाकलों की मरम्मत, हाथियों से सुरक्षा के लिए ठोस उपाय की मांग की है.
ग्रामीणों ने कहा
शेखर सिंह : गांव के चापाकलों से गंदा पानी निकलता है. जो पीने योग्य नहीं रहता. मजबूरी में उसी पानी का उपयोग करना पड़ता है. सरकार हर घर नल से जल पहुंचाने का दावा करती है, लेकिन गांव में इसका कोई असर दिखाई नहीं देता.
देवेंद्र सिंह: शुद्ध पेयजल के अभाव का असर ग्रामीणों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है. दूषित पानी के सेवन से कई बीमारी होने का खतरा बना रहता है. वहीं बरसात में कुएं में गंदा पानी मिल जाने से स्थिति और खराब हो जाती है. पानी लाने के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता है.तेजू सिंह : गांवों में सोलर जलमीनार स्थापित किये गये हैं, लेकिन रोगड़ा गांव आज भी इस सुविधा से वंचित है. कई बार पंचायत प्रतिनिधियों और अधिकारियों को शिकायत के बाद भी अब तक कोई ठोस पहल नहीं की गयी है.
श्रीमति देवी : ग्रामीणों को जंगली हाथियों के आतंक से भी जूझना पड़ रहा है. शाम ढलते ही हाथियों का दल गांव में प्रवेश कर जाता है और खेतों में लगी फसलों तथा घरों को नुकसान पहुंचाता है. सुरक्षा के लिए रतजगा करना पड़ता है.