बरारी भगवती मंदिर में मत्था टेकने वालों की हर मनोकामनाएं होती हैं पूरी

बरारी भगवती मंदिर में मत्था टेकने वालों की हर मनोकामनाएं होती हैं पूरी

350 वर्ष प्राचीन है बरारी की मां भगवती का मंदिर – बिना फूलायस के नहीं होता विसर्जन, फुलायस की दिशा में होता है कलश विसर्जन – मान्यताहै शेरशाह सूरी ने बंगाल विजय की मांगी थीं दुआएं, विजय होते ही चढ़ावा चढ़ाया था बरारी एतिहासिक व प्राचीनतम पृष्टभूमि से भरा बरारी प्रखंड स्थित नगर पंचायत बरारी का श्री भगवती मंदिर में सच्चे मन से मांगी गयी हर मुराद पूरी होती है. प्रातः तीन बजे से मंदिर में घंट बजते हीं श्रद्धालु पहुंचने लगते हैं. 350 वर्ष प्राचीनतम भगवती मंदिर में बलि चढ़ाने की भी प्रथा थी जिसे बाद में बंद कर दिया गया. मंदिर परिसर में मां दुर्गा की प्रतिमा के साथ माता सरस्वती, बजरंगबली, महादेव की शिविलंग एवं माता पार्वती की प्रतिमा स्थापित है. मंदिर के मुख्य पुजारी वेदाचार्य पुरुषोत्तम झा बताते हैं कि माता के दरबार में जो भी आया कभी खाली हाथ वापस नहीं गया. माता की शक्ति जन जन के लिए है. निष्ठा विश्वास श्रद्धा भाव से की गयी आराधना से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. दस दिवसीय दशहरा पूजा में दशमी पूजा को संध्या में पूजा उपरांत विसर्जन के लिए माता की इजाजत ली जाती है. फूलायस कराया जाता है. फूलायस जिस दिशा में होगी माता की स्वीकृति से उस दिशा में विसर्जन की प्रक्रिया पूरे विधि विधान से पूरी की जाती है. विसर्जन के समय मंदिर से लेकर बाहर गंगा दार्जलिंग सड़क तक काफी भीड़ जमा रहती है. एक बार विसर्जन कलश को स्पर्श कर आशीष लेने की होड़ रहती है. इस समय मंदिर कमेटी एवं प्रशासन के लोग काफी मुस्तैदी के साथ लगे रहते हैं. माता का पट खुलते हीं अष्टमी, नवमी की सुबह से आराधना करने वालों की भीड़ लगी रहती है. यहां व्यापक रूप से मेला का आयोजन किया जाता है. आकर्षक झूला, ड्रेगेन ट्रेन, म्यूजिकल चेयर रेस, मौत का कुंआ आदि कई प्रकार के सैकड़ों दुकाने सजती है. मंदिर न्यास समिति के पदेन अध्यक्ष अंचल पदाधिकारी होते हैं. मंदिर न्यास समिति उपाध्यक्ष कौशल किशोर यादव, सचिव विश्वदीपक भगवती, उपसचिव धनजीत यादव, कोषाध्यक्ष मुकेश झा बताते हैं कि साढ़े तीन सौ वर्षों पूर्व से यह मंदिर बरारी की धरती पर आस्था का केन्द्र है. पूर्व में मंदिर बरारी बस्ती जो वर्तमान में तेरासी टोला है वहां अवस्थित था. शेरशाह सुरी बंगाल विजय के लिए काढगोला गंगा दार्जलिंग सड़क से जाने के क्रम में बरारी में भीड़ देखकर सेनापति को पता लगाने भेजा कि क्यों भीड़ लगी है. सेनापति ने सूरी को बताया कि मनोकामना पूर्ण होने पर लोग चढ़ावा चढाने आये है. उन्होंने माता से बंगाल विजय की मनोकामना की. बंगाल विजय के बाद शेरशाह शुरी ने चढ़ावा चढ़ाया था. कई ऐसी प्राचीनतम कथाएं माता के दरबार से जुड़ी है जो श्रद्धालुओं को आस्था से जोड़ती है. पूरे क्षेत्र में दशहरा पूजा में भव्य मेला का आयोजन होता है. कई प्रखंडों के लोग आज भी यहां मेला देखने एवं आराजना करने आते है. दशहरा पूजा को सफलता पूर्वक कराने को लेकर मंदिर न्यास समिति के पदाधिकारी एवं सदस्य विनोद भारती, विवेकानंद झा, संदीप कुमार, सदरी यादव, दिवाकर प्रशासन के सहयोग से कराने में जुटे हुए है.

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Author: RAJKISHOR K

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