Exclusive: जुगाड़ से होती थी रामानंद सागर की 'रामायण' की शूटिंग, 100 किलो लोबान से बनता था धुआं, आइने से बढ़ती थी रावण की सेना

1987 की रामानंद सागर की 'रामायण' ने बिना आधुनिक तकनीक के ऐसे अविश्वसनीय दृश्य रचे जो आज भी याद किए जाते हैं. अभिनेता सुनिल लाहिरी ने बताया कि कैसे 100 किलो लोबान से धुआं, थर्माकोल से पहाड़ और आइनों से सेना बनाई जाती थी.

Ramayan Behind The Scenes: आज फिल्मों और वेब सीरीज में शानदार विजुअल्स के लिए करोड़ों रुपये VFX और CGI पर खर्च किए जाते हैं. लेकिन 1987 में प्रसारित रामानंद सागर की 'रामायण' ने बिना आधुनिक तकनीक के ऐसे भव्य दृश्य रचे, जो आज भी दर्शकों की यादों में बसे हैं. आखिर उस दौर में ये चमत्कारी दृश्य कैसे फिल्माए जाते थे? शो में लक्ष्मण का किरदार निभाने वाले अभिनेता सुनिल लाहिरी ने प्रभात खबर से खास बातचीत में शूटिंग के दौरान अपनाए गए कई दिलचस्प जुगाड़ साझा किए.

रोजाना 100 किलो से ज्यादा लोबान से धुएं का इफेक्ट

सुनिल लाहिरी ने बताया कि रामायण के सेट पर दिव्यता और रहस्यमयी वातावरण बनाने के लिए रोजाना 100 किलो से भी ज्यादा लोबान के बोरे मंगाए जाते थे. इन्हें जलाकर पूरे सेट पर धुएं का इफेक्ट तैयार किया जाता था. कई दृश्यों में धुएं को और प्रभावी बनाने के लिए अगरबत्ती का भी इस्तेमाल किया जाता था, जिससे सुबह के कोहरे जैसा माहौल तैयार हो जाता था. सीमित संसाधनों के बावजूद टीम कैमरे और लाइटिंग की मदद से हर सीन को वास्तविक बनाने की कोशिश करती थी.

पीओपी, थर्माकोल, और रूई से तैयार होती थी पूरी दुनिया

सुनिल लाहिरी के मुताबिक उस समय VFX नहीं था, इसलिए पीओपी (प्लास्टर ऑफ पेरिस) और थर्माकोल से पहाड़ों के मीनिएचर तैयार किए जाते थे. संजीवनी बूटी वाला पर्वत भी हनुमान जी की ऊंचाई के अनुपात में बनाया गया था, ताकि कैमरे में वह विशाल दिखाई दे. कई जगह हरे रंग और पत्तियों का इस्तेमाल कर पहाड़ों और जंगलों का एहसास कराया जाता था, जबकि रूई से बादलों का इफेक्ट तैयार किया जाता था. सीता माता के धरती में समाने वाला दृश्य भी पीओपी से बने विशेष सेट पर फिल्माया गया था. वहीं छोटे-छोटे खिलौनानुमा महलों को स्टूल पर रखकर कैमरे के खास एंगल से शूट किया जाता था, जिससे वे पर्दे पर विशाल राजमहलों जैसे दिखाई देते थे.

कुंभकर्ण, रावण की सेना और कलाकार... हर जगह था देसी जुगाड़

रामायण में कुंभकर्ण को विशालकाय दिखाने के लिए उसके सामने महल का छोटा मीनिएचर रखा जाता था. कैमरे की फ्रेमिंग ऐसी होती थी कि वह कई गुना बड़ा नजर आए. रावण की विशाल सेना दिखाने के लिए सेट पर आइनों का इस्तेमाल किया जाता था, जिससे कुछ कलाकारों की संख्या कैमरे में कई गुना बढ़ी हुई दिखाई देती थी. सुनिल लाहिरी ने एक और दिलचस्प खुलासा करते हुए बताया कि कलाकारों की संख्या सीमित होने की वजह से कई बार एक ही अभिनेता अलग-अलग किरदार निभाते थे. जो कलाकार एक दृश्य में अयोध्या के दरबार या नगरवासी के रूप में नजर आते थे, वही बाद में लंका में रावण की सेना या दरबारी बनकर दिखाई देते थे. मेकअप, कॉस्ट्यूम और कैमरे की तकनीक की बदौलत दर्शकों को इस बदलाव का एहसास तक नहीं होता था.

यही थी 'रामायण' की असली ताकत

सुनिल लाहिरी का कहना है कि उस दौर में संसाधन सीमित जरूर थे, लेकिन पूरी टीम की कल्पनाशीलता और तकनीकी समझ कमाल की थी. देसी जुगाड़, कैमरे की बारीक समझ और सेट डिजाइन की बदौलत ऐसे दृश्य रचे गए, जो आज भी लोगों के जेहन में ताजा हैं. यही वजह है कि चार दशक बाद भी रामानंद सागर की 'रामायण' सिर्फ अपनी कहानी ही नहीं, बल्कि अपनी मेकिंग और तकनीकी प्रयोगों के लिए भी मिसाल मानी जाती है.

ये भी पढ़ें : जब फिल्मों में हीरो पर भारी पड़ गया विलेन, 'रामायण' में यश की चर्चा के बीच याद आए ये दमदार खलनायक



प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी

लेखक के बारे में

By नेहा वर्मा

Digital Media Journalist having more than 2 years of experience in life & Style beat with a good eye for writing across various domains, such as tech and auto beat.
Read More
ePaper

अपने दैनिक समाचार अनुभव को और बेहतरीन बनाएं

सिर्फ ₹399 ₹149

एक साल के लिए

आज ही सब्सक्राइब करें

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >