देश के 79वें स्वतंत्रता दिवस के इस पावन अवसर पर यदि भारत की आत्मनिर्भरता और औद्योगिक क्रांति पर नजर डालें, तो ऑटोमोबाइल सेक्टर इस बदलाव की सबसे चमकदार मिसाल बनकर सामने आता है. कभी विदेशी पार्ट्स को असेंबल करने और लाइसेंस राज की सख्त सीमाओं में बंधा रहने वाला भारतीय ऑटो क्षेत्र आज दुनिया के नक्शे पर एक बड़ी ताकत बन चुका है. सालाना 2.8 करोड़ से अधिक वाहनों के उत्पादन और $145 बिलियन से ज्यादा के वैल्यूएशन के साथ भारत आज दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऑटोमोबाइल बाजार है. विदेशी तकनीक पर निर्भर रहने वाले इस देश ने आज छह महाद्वीपों में अपनी गाड़ियां और तकनीक भेजकर दुनिया को हैरान कर दिया है.
1947 से अब तक: तीन दौर में बदली भारत की रफ्तार
भारतीय ऑटो इंडस्ट्री की इस लंबी यात्रा को तीन मुख्य पड़ावों में देखा जा सकता है. आजादी के शुरुआती दशकों में प्रीमियर ऑटोमोबाइल्स और हिंदुस्तान मोटर्स ने ऑटो निर्माण की नींव रखी, हालांकि उस समय कार खरीदना एक बड़ा सपना माना जाता था. साल 1983 में मारुति 800 के आगमन ने देश के मध्यम वर्ग को पहली बार अपनी कार का अनुभव कराया और देश में पर्सनल मोबिलिटी का नया दौर शुरू हुआ. इसके बाद 1991 के उदारीकरण ने विदेशी निवेश के रास्ते खोले, जिससे चेन्नई, पुणे, गुरुग्राम और सानंद जैसे शहर वैश्विक ऑटो निर्माण के बड़े केंद्र बनकर उभरे.
इन आइकॉनिक गाड़ियों ने लिखी सड़कों की तकदीर
भारत के हर दौर में कुछ ऐसी गाड़ियां रहीं, जिन्होंने लोगों की जीवनशैली और देश की संस्कृति को आकार दिया. दशकों तक सड़कों पर राज करने वाली 'हिंदुस्तान एंबेसडर' जहां नेताओं और अफसरों की पहचान बनी, वहीं 'बजाज चेतक' स्कूटर ने हर आम परिवार के सफर को आसान बनाया. मारुति 800 के बाद 'रॉयल एनफील्ड बुलेट' और 'टाटा इंडिका' जैसी गाड़ियों ने भारतीय इंजीनियरिंग का लोहा मनवाया. टाटा इंडिका देश की पहली पूरी तरह स्वदेशी कार बनी, जबकि महिंद्रा स्कॉर्पियो और थार जैसी गाड़ियों ने साबित कर दिया कि भारत विश्वस्तरीय रफ-एंड-टफ एसयूवी बनाने में किसी से पीछे नहीं है.
ट्रैक्टर और दोपहिया निर्माण में भारत बना ग्लोबल लीडर
'मेक इन इंडिया' की बदौलत भारत आज न केवल अपनी जरूरतें पूरी कर रहा है, बल्कि दुनिया भर के लिए व्हीकल एक्सपोर्ट का केंद्र भी बन चुका है. भारत वर्तमान में दुनिया का सबसे बड़ा ट्रैक्टर निर्माता, दोपहिया और तिपहिया वाहनों का सबसे बड़ा उत्पादक और पैसेंजर कारों का तीसरा सबसे बड़ा मैन्युफैक्चरर है. इसके अलावा, भारत के ऑटो कंपोनेंट सप्लायर्स हर साल $20 बिलियन से अधिक के पार्ट्स यूरोप और अमेरिका को एक्सपोर्ट करते हैं. सरकार की पीएलआई (PLI) योजनाओं ने घरेलू स्तर पर एडवांस बैटरी और ऑटोमोबाइल रिसर्च को पंख दिए हैं.
इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और स्मार्ट फ्यूचर की ओर मजबूत कदम
आजादी के 79वें साल में भारत अपनी सबसे बड़ी तकनीकी क्रांति 'इलेक्ट्रिफिकेशन' से गुजर रहा है. देश में बिकने वाले कुल वाहनों में इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की हिस्सेदारी 11 प्रतिशत के पार पहुंच चुकी है. ओला, एथर, टीवीएस और बजाज जैसे ब्रांड्स के साथ दोपहिया और तिपहिया सेगमेंट ईवी क्रांति का नेतृत्व कर रहे हैं. वहीं टाटा मोटर्स, महिंद्रा और एमजी जैसी कंपनियां पैसेंजर ईवी सेगमेंट को लगातार नई ऊंचाई पर ले जा रही हैं. भविष्य की बात करें तो भारत अब फ्लेक्स-फ्यूल, ग्रीन हाइड्रोजन और सॉफ्टवेयर आधारित स्मार्ट कनेक्टेड गाड़ियों की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहा है.
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