Ukraine War Peace Plan: यूक्रेन की जंग अब सिर्फ रूस और यूक्रेन के बीच नहीं रह गई है. अब इसमें अमेरिका और यूरोप भी आमने-सामने आ गए हैं. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस जंग को खत्म करने के लिए एक 28 पॉइंट का पीस प्लान पेश किया, लेकिन उसी के जवाब में यूरोप की तीन बड़ी ताकतों ने ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी (E3 देश) ने भी अपना एक नया 28 पॉइंट का काउंटर प्लान सामने रख दिया. यानी अब शांति की कोशिश में भी दो अलग-अलग रास्ते बन चुके हैं. एक ट्रंप का, दूसरा यूरोप का.
ट्रंप का 28 पॉइंट पीस प्लान- रूस को ज्यादा फायदा?
ट्रंप का यह प्लान अमेरिका और रूस के बीच हुई बातचीत से निकला है. इसे ट्रंप के दूत स्टीव विटकॉफ और रूस के अधिकारी किरिल दिमित्रिएव ने तैयार किया. इस ड्राफ्ट को एसोसिएटेड प्रेस (एपी) ने एक अमेरिकी अधिकारी के हवाले से छापा है. इस प्लान के मुताबिक यूक्रेन को अपनी कई अहम जमीनें रूस को देनी होंगी. इसमें क्राइमिया, लुहान्स्क और डोनेट्स्क पूरी तरह रूस को देने की बात है, जबकि खेरसॉन और जापोरिज्जिया की स्थिति को मौजूदा रेखा पर ही रोक दिया जाएगा.
यूक्रेन की सेना को कम करके 6 लाख सैनिकों तक सीमित करने की बात भी कही गई है, जबकि अभी उसकी ताकत करीब 8.8 लाख है. इस प्लान में यह भी लिखा है कि यूक्रेन कभी भी NATO में शामिल नहीं होगा और उसे यह बात अपने संविधान में लिखनी होगी. हालांकि उसे यूरोपीय यूनियन (EU) में जाने की इजाजत होगी. इसके साथ ही रूस पर लगे कई प्रतिबंध धीरे-धीरे हटाए जाएंगे और रूस को दोबारा G8 में शामिल करने का भी जिक्र है. ट्रंप का कहना है कि अगर रूस भविष्य में फिर हमला करता है, तो एक “जोरदार मिलिट्री जवाब” दिया जाएगा, लेकिन इसमें यह साफ नहीं है कि इसमें अमेरिका खुद कितना शामिल होगा.
यूरोप का काउंटर प्लान- ट्रंप से क्यों अलग?
ट्रंप के इस प्लान के जवाब में ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी ने एक अलग मसौदा तैयार किया, जिसे रॉयटर्स न्यूज एजेंसी ने देखा और रिपोर्ट किया. यूरोप का कहना है कि उसने ट्रंप के प्लान को आधार जरूर बनाया, लेकिन उसमें कई जरूरी बदलाव किए गए हैं. यूरोपीय प्लान में साफ कहा गया है कि यूक्रेन की जमीन रूस को नहीं दी जाएगी. यूक्रेन की संप्रभुता की फिर से पुष्टि की जाएगी और उसकी सुरक्षा को मजबूत किया जाएगा. यूरोप ने रूस की यह मांग भी नहीं मानी कि NATO का विस्तार रोका जाए. उनका कहना है कि NATO में शामिल होना देशों का अपना फैसला है. यूरोप यह भी चाहता है कि पहले युद्ध रोका जाए, यानी पहले सीजफायर, उसके बाद जमीन और समझौते पर बातचीत हो. जबकि ट्रंप के प्लान में पहले समझौते की बात है.
Ukraine War Peace Plan in Hindi: जमीन और सेना को लेकर बड़ा फर्क
ट्रंप के प्लान में साफ कहा गया है कि यूक्रेन को अपनी कब्जाई जमीन छोड़नी होगी. वहीं यूरोप इस बात के खिलाफ है और कह रहा है कि यूक्रेन अपनी जमीन नहीं छोड़ेगा. सेना के मामले में भी फर्क है. ट्रंप जहां यूक्रेन की सेना को 6 लाख तक सीमित करना चाहते हैं, वहीं यूरोप ने अधिकतम 8 लाख सैनिक की सीमा की बात कही है, जो यूक्रेन की मौजूदा ताकत के करीब है.
यूरोपीय प्लान में कहा गया है कि यूक्रेन को मजबूत सुरक्षा गारंटी दी जाएगी. अमेरिका से “NATO के Article 5 जैसी सुरक्षा गारंटी” की बात भी कही गई है. इसमें यह भी जोड़ा गया है कि अगर रूस भविष्य में हमला करता है, तो सारे पुराने प्रतिबंध फिर से लागू होंगे और रूस को दिए गए फायदे खत्म कर दिए जाएंगे. इसके अलावा, यूक्रेन को यूरोपीय यूनियन में शामिल होने का पूरा रास्ता खुला रखा गया है. उसे यूरोप के बाजार में अस्थायी रूप से खास पहुंच भी दी जाएगी.
रूस के लिए आर्थिक राहत की बात
ट्रंप के प्लान में रूस को लेकर कहा गया है कि उसे फिर से दुनिया की अर्थव्यवस्था में शामिल किया जाएगा. उस पर लगे प्रतिबंध धीरे-धीरे हटाए जाएंगे. अमेरिका और रूस के बीच ऊर्जा, गैस, खनिज, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और आर्कटिक क्षेत्र में लंबे समय के लिए आर्थिक साझेदारी होगी. इसमें यह भी लिखा है कि करीब 100 अरब डॉलर की रूसी संपत्ति यूक्रेन के पुनर्निर्माण के लिए इस्तेमाल होगी, लेकिन उसका आधा फायदा अमेरिका को मिलेगा. इस बात को लेकर भी काफी सवाल उठ रहे हैं.
ट्रंप प्लान पर सवाल- क्या यह यूक्रेन का सरेंडर है?
कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का कहना है कि ट्रंप का यह प्लान असल में यूक्रेन के लिए शांति नहीं, बल्कि एक तरह का “सरेंडर प्लान” है. क्योंकि इसमें रूस के कब्जे को मान्यता दी जा रही है. इससे दुनिया को यह संदेश जाएगा कि अगर कोई देश ताकत के बल पर जमीन कब्जा कर ले, तो बाद में उसे मान भी लिया जाएगा. यही वजह है कि यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की पहले भी ऐसे किसी भी प्रस्ताव को ठुकरा चुके हैं.
अमेरिका-यूरोप टकराव की असली वजह
अमेरिका और यूरोप के बीच असली टकराव की वजह यह है कि दोनों की सोच अलग है. ट्रंप चाहते हैं कि जंग जल्दी खत्म हो जाए, चाहे जमीन ही क्यों न छोड़नी पड़े. वहीं यूरोप को डर है कि अगर आज रूस को छूट दी गई, तो कल वह किसी और देश पर हमला कर सकता है. यूरोप खासकर बाल्टिक देशों और पोलैंड को लेकर चिंतित है. उसे लगता है कि अगर रूस को अभी नहीं रोका गया, तो आगे खतरा और बढ़ेगा.
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