दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे म्यॉन्ग ने शनिवार को उत्तर कोरिया के साथ तनाव कम करने और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की दिशा में आगे बढ़ने के लिए बातचीत का आह्वान किया. उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच टकराव रोकने के लिए सुरक्षा उपायों को मजबूत करना जरूरी है और कोरियाई प्रायद्वीप में दशकों पुराने युद्धविराम की जगह एक स्थायी 'शांति व्यवस्था' स्थापित करने की जरूरत है. राष्ट्रपति ली ने यह अपील जापानी औपनिवेशिक शासन से कोरिया की मुक्ति की वर्षगांठ के मौके पर दिए अपने भाषण में की. उन्होंने कहा कि दक्षिण और उत्तर कोरिया को एक-दूसरे के साथ बैठकर शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का रास्ता तलाशना चाहिए.
उत्तर और दक्षिण कोरिया तकनीकी रूप से आज भी युद्ध की स्थिति में हैं. इसकी वजह यह है कि 1950 से 1953 के बीच चला कोरियाई युद्ध शांति समझौते के साथ खत्म नहीं हुआ था, बल्कि युद्धविराम के जरिए संघर्ष को रोका गया था. यह युद्ध उत्तर कोरिया के हमले के बाद शुरू हुआ था. संयुक्त कोरिया को 1945 में 15 अगस्त के दिन जापान से आजादी मिली थी. लेकिन आजादी के कुछ सालों बाद ही यह छोटा सा देश कोल्ड वॉर की भेंट चढ़ गया और 1948 में उत्तर और दक्षिण में बंट गया और फिर कुछ सालों बाद युद्ध में भी उलझ गया. उत्तर कोरिया में रूस का प्रभाव रहा, जबकि दक्षिण कोरिया में अमेरिकी विचार ने जगह बनाई. लेकिन इससे भी बड़ा सवाल है कि क्या ट्रंप 2.0 में क्या दक्षिण कोरिया सुरक्षित महसूस नहीं कर रहा है?
1950-53 के युद्ध को औपचारिक शांति समझौते में बदलने की कोशिश
ली जे म्यॉन्ग ने कहा कि उत्तर कोरिया और संबंधित पक्षों के बीच बातचीत शुरू होनी चाहिए, ताकि 1950 से 1953 तक चले कोरियाई युद्ध को औपचारिक रूप से समाप्त करने का रास्ता निकाला जा सके. यह युद्ध किसी शांति संधि के जरिए खत्म नहीं हुआ था, बल्कि युद्धविराम के साथ लड़ाई रुकी थी. ऐसे में दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति का जोर इस बात पर है कि अब युद्धविराम की मौजूदा व्यवस्था से आगे बढ़कर स्थायी शांति का ढांचा तैयार किया जाए. उन्होंने यह भी कहा कि बातचीत के दौरान उत्तर कोरिया की परमाणु क्षमताओं को सीमित करने के प्रभावी उपायों पर भी चर्चा की जा सकती है.
तनाव कम करने के लिए पहले से कदम उठाएगा सियोल
दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति ने कहा कि सियोल तनाव कम करने के लिए पहले से ज्यादा कदम उठाएगा. उनका उद्देश्य ऐसे कई स्तरों वाले सुरक्षा उपाय तैयार करना है, जो किसी भी संभावित तनाव को बड़े सैन्य टकराव में बदलने से रोक सकें. ली उत्तर कोरिया के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की नीति पर चलने की बात पहले से कहते आए हैं.
दोनों देश 1971 से अब तक लगभग 700 मीटिंग्स कर चुके हैं. nknews.org की 8 नवंबर 2021 की रिपोर्ट के अनुसार औपचारिक रूप से दोनों ने अब तक अलग-अलग मुद्दों पर आधारित 667 अंतर कोरियाई मीटिंग की हैं. लेकिन अब तक इनका कोई विशेष लाभ नहीं मिला. हां यह जरूर हुआ कि पिछले 73 सालों से दोनों देशों के बीच कोई बड़ा युद्ध नहीं हुआ है.
आक्रामक बना हुआ है उत्तर कोरिया
उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन ने प्योंगयांग की पुरानी पुनर्मिलन नीति को छोड़ दिया है. उन्होंने दक्षिण कोरिया को 'सबसे शत्रुतापूर्ण राज्य' बताया है और बॉर्डर पर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के निर्देश दिए हैं. उत्तर कोरिया ने इसी सप्ताह अमेरिका और दक्षिण कोरिया के बीच होने वाले सालाना सैन्य अभ्यासों का विरोध किया है. प्योंगयांग ने चेतावनी दी है कि इन अभ्यासों के जवाब में वह अपनी प्रतिरोधक क्षमता को और मजबूत करने के कदम उठा सकता है. प्योंगयांग ने दक्षिण कोरिया की परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियां विकसित करने की योजना की आलोचना की है.
राष्ट्रपति ली जे म्यंग रिश्ते सुधारने की भरपूर कोशिश कर रहे
दक्षिण कोरिया में जून 2025 में सत्ता संभालने के बाद राष्ट्रपति ली जे म्यंग ने अपने पूर्ववर्ती की अपेक्षाकृत आक्रामक नीति से अलग रुख अपनाया है. उन्होंने उत्तर कोरिया के सामने बिना किसी पूर्व शर्त के बातचीत की पेशकश की है. जुलाई में दक्षिण कोरिया के एकीकरण मंत्री ने यहां तक कहा था कि सियोल ने उत्तर कोरिया पर परमाणु हथियार खत्म करने के लिए दबाव बनाने वाली नीति को प्राथमिकता देना छोड़ दिया है. इसके बजाय अब उसका ध्यान प्योंगयांग की परमाणु गतिविधियों के और विस्तार को रोकने पर है.
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रूस के साथ बढ़ता संबंध बढ़ा रहा साउथ कोरिया की चिंता
हालांकि, उत्तर कोरिया के राष्ट्रपति किम जोंग उन ने दक्षिण कोरिया के प्रेसिडेंट ली की बार-बार की गई बातचीत की पेशकश पर अब तक कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दी है. इसके उलट प्योंगयांग ने रूस के साथ अपने सैन्य संबंधों को और मजबूत किया है. विश्लेषकों का मानना है कि रूस को सैनिकों और युद्ध सामग्री उपलब्ध कराने के बदले उत्तर कोरिया को मॉस्को से आर्थिक मदद, खाद्य सामग्री, ऊर्जा और सैन्य तकनीक मिल रही है. रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध में उत्तर कोरिया की भूमिका को लेकर भी यही आकलन सामने आया है.
उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग उन के इस साल के अंत में रूस जाने की उम्मीद है. माना जा रहा है कि इस यात्रा के दौरान रूस को आगे हथियारों की आपूर्ति से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हो सकती है. दक्षिण कोरिया के प्रमुख सुरक्षा सहयोगी अमेरिका ने वहां करीब 28,500 सैनिक तैनात कर रखे हैं. इन सैनिकों की तैनाती का मकसद उत्तर कोरिया से पैदा होने वाले सैन्य खतरे के खिलाफ दक्षिण कोरिया की सुरक्षा को मजबूत करना है.
अमेरिका और दक्षिण कोरिया की संयुक्त सेना के कमांड के प्रवक्ता कर्नल रयान डोनाल्ड ने भी इस सप्ताह उत्तर कोरिया की रूस-यूक्रेन युद्ध में भूमिका से पैदा हुए नए खतरे का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि यूरोप में युद्ध के दौरान उत्तर कोरिया ने जो अनुभव हासिल किए हैं, वे अब कोरियाई प्रायद्वीप के लिए संभावित खतरे को बदल सकते हैं. लेकिन ईरान और यूक्रेन युद्ध में यह दिखा कि भारी भरकम फौज की तैनाती अब किसी देश को हराने के लिए काफी नहीं है.
दक्षिण कोरिया और अमेरिका के 11 दिन चलने वाले संयुक्त सैन्य अभ्यासों के बारे में पत्रकारों से बात करते हुए डोनाल्ड ने कहा, 'उन्होंने वहां जो सबक सीखे हैं, उन्हें उत्तर कोरिया वापस लेकर आए हैं.' उन्होंने आगे कहा, 'हमारी ट्रेनिंग उस खतरे को ध्यान में रखकर की जाती है.' दक्षिण कोरिया और अमेरिका का यह संयुक्त सैन्य अभ्यास सोमवार से शुरू होने वाला है.
ईरान युद्ध ने अमेरिका की सीमाएं भी कीं उजागर
राष्ट्रपति ट्रंप ईरान युद्ध के दौरान खाड़ी के अपने मित्र देशों पर हुए हमलों से ज्यादातर का बचाव करने में भले ही सफल रहे, लेकिन ईरान ने भी यह दिखा दिया कि अमेरिका अभेद्ध नहीं है. अमेरिका खुद भले ही टॉप ग्लोबल पावर हो, लेकिन अटलांटिक और प्रशांत महासागर के बीचो-बीच बसे अपने देश की सीमा पार करने के बाद उसकी सैन्य शक्ति शायद उतनी रह जाती, जितनी वह दिखाने की कोशिश करता है. इसके वियतनाम, इराक, अफगानिस्तान जैसे पुराने उदाहरण तो हैं ही, होर्मुज में ईरान ने अमेरिका को रोककर यह एक बार फिर यह साबित किया है. शायद दक्षिण कोरिया इस नए अनुभव से ज्यादा परेशान है.
इसके साथ ही ड्रोन, समुद्री माइंस और अन्य मानव रहित हथियारों से युद्ध के डायनमिक्स बदल गए हैं. इसके साथ ही उत्तर कोरिया पहले से ही परमाणु हथियारों से लैस एक देश है. ऐसे में बदलती दुनिया के शक्तियों में अब कई ध्रुव मिलकर साझा शक्ति बन रहे हैं, जिसका सामना करना जनसंख्या और क्षेत्रफल के लिहाज से छोटे छोटे देशों के बस की बात नहीं होगी. दक्षिण कोरिया शायद इसी सच्चाई को स्वीकार करते हुए बातचीत से रास्ता निकालने के लिए ज्यादा आतुर दिख रहा है.
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