अफगानिस्तान में तालिबान के सामने एक नई चुनौती उत्तरी हिस्से से आती दिखाई दे रही है. बदख्शां (Badakhshan) और आसपास के इलाकों में स्थानीय स्तर पर संघर्ष, हथियारबंद विरोध और संसाधनों पर नियंत्रण को लेकर विवाद बढ़े हैं. खास तौर पर ताजिक और उज्बेक समुदायों से जुड़े स्थानीय ढांचे में तनाव की खबरें तालिबान के लिए चिंता का कारण बन रही हैं.
मामला केवल स्थानीय राजनीति तक सीमित नहीं है.
बदख्शां की सोने की खदानों जैसे संसाधनों पर नियंत्रण और तालिबान की सख्त निरस्त्रीकरण नीति ने भी तनाव बढ़ाया है.
कुछ स्थानीय लड़ाकों और तालिबान के बीच टकराव ने यह सवाल खड़ा किया है कि क्या उत्तरी अफगानिस्तान में तालिबान की पकड़ उतनी मजबूत है, जितनी वह दिखाई देती है.
बदख्शां में तालिबान ने बढ़ाई सैन्य मौजूदगी
ऑस्ट्रेलिया स्थित भू-राजनीतिक विशेषज्ञ मनीष राय, जो मध्य-पूर्व और अफगानिस्तान-पाकिस्तान मामलों पर लिखते हैं, के अनुसार तालिबान नेतृत्व ने बदख्शां में हाल की घटनाओं को गंभीरता से लिया है.
उनका आकलन है कि तालिबान को अपने स्थानीय बलों पर भरोसे में कमी महसूस हुई है. इसके बाद उसने उत्तरी इलाकों में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाई है.
बताया जाता है कि तालिबान ने बदख्शां में तैनात 219वीं उमर सालेह डिवीजन के अलावा 207वीं अल-फारूक कोर और मौलवी हमीदुल्लाह मुसाफिर के नेतृत्व वाली नई हिबाती यूनिट के लड़ाकों को भी सक्रिय किया है.
यानी तालिबान फिलहाल स्थानीय विरोध को केवल पुलिस या प्रशासनिक समस्या के रूप में नहीं देख रहा, बल्कि इसके लिए अतिरिक्त सैन्य संसाधन लगा रहा है.
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सहयोगी संगठनों से भी मदद मांग रहा तालिबान
तालिबान की चिंता का एक और संकेत उसके सहयोगी संगठनों से मदद मांगने के रूप में सामने आता है.
मनीष राय के अनुसार, नूरिस्तान प्रांत में हक्कानी नेटवर्क के अब्दुल अजीज हक्कानी ने हाल में जमात अंसारुल्लाह, इस्लामिक मूवमेंट ऑफ उज्बेकिस्तान (IMU) और अल-कायदा के प्रतिनिधियों के साथ बैठक की. इसमें कथित तौर पर इन संगठनों से अनुभवी लड़ाकों को उत्तरी इलाकों में तालिबान की मदद के लिए भेजने को कहा गया.
अगर यह आकलन सही है, तो यह दिखाता है कि उत्तरी अफगानिस्तान में तालिबान को स्थानीय स्तर पर अतिरिक्त सैन्य समर्थन की जरूरत महसूस हो रही है.
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गुरिल्ला रणनीति बन सकती है बड़ी परेशानी
तालिबान के लिए सबसे मुश्किल चुनौती यह है कि पहाड़ी इलाकों में छोटे हथियारबंद समूहों से निपटना आसान नहीं होता.
छोटे गुरिल्ला समूह मोटरसाइकिल या पैक जानवरों का इस्तेमाल करते हुए तालिबान के काफिलों और चौकियों पर अचानक हमला कर सकते हैं. इसके बाद वे पहाड़ों और घाटियों में तेजी से गायब हो सकते हैं.
अफगानिस्तान के इतिहास में यह रणनीति पहले भी बेहद प्रभावी रही है. सोवियत सेना और बाद में NATO बलों को भी लंबे समय तक ऐसे ही छोटे, स्थानीय और गतिशील लड़ाकों से जूझना पड़ा था.
उत्तरी इलाकों में सक्रिय विरोधी समूहों को इलाके की अच्छी जानकारी भी है. इसके अलावा पूर्व अफगान नेशनल सिक्योरिटी फोर्सेज से जुड़े कुछ पूर्व सैनिक और कमांडर भी इन समूहों को सैन्य अनुभव दे सकते हैं. इनमें से कई को अमेरिका या NATO के दौरान प्रशिक्षण मिला था.
लेकिन क्या तालिबान की सत्ता को बड़ा खतरा है?
यहीं तस्वीर का दूसरा पहलू सामने आता है.
इन हमलों को गंभीर चुनौती जरूर माना जा सकता है, लेकिन फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि ये समूह तालिबान की राष्ट्रीय सत्ता के लिए बड़ा खतरा बन चुके हैं.
इन संगठनों के सामने अभी कई बड़ी समस्याएं हैं;
बड़े पैमाने पर भर्ती, हथियार और रसद की भरोसेमंद व्यवस्था, अलग-अलग विरोधी गुटों के बीच एकता और कब्जे वाले क्षेत्र में प्रशासन चलाने की क्षमता.
इसके उलट तालिबान के पास बेहतर खुफिया नेटवर्क, ज्यादा जनशक्ति, परिवहन और भारी हथियारों का फायदा है.
इसलिए बदख्शां में जारी संघर्ष को फिलहाल तालिबान शासन के तत्काल पतन के संकेत के रूप में देखना सही नहीं होगा.
असली नुकसान शायद ‘अजेय’ छवि का है
फिर भी इन घटनाओं का राजनीतिक महत्व कम नहीं है.
तालिबान ने 2021 में अफगानिस्तान पर नियंत्रण हासिल करने के बाद खुद को एक ऐसी शक्ति के रूप में स्थापित किया, जिसे चुनौती देना बेहद मुश्किल है. लेकिन उत्तरी अफगानिस्तान में छोटे समूहों का लगातार हमला इस धारणा को कमजोर कर सकता है.
यही शायद तालिबान के लिए सबसे बड़ी चिंता है.
आज भले ही ये समूह तालिबान की सत्ता को उखाड़ने की स्थिति में नहीं हैं, लेकिन अगर स्थानीय असंतोष बढ़ता है, अलग-अलग गुटों में बेहतर तालमेल बनता है और पूर्व सुरक्षा बलों के अनुभवी कमांडर इसमें सक्रिय भूमिका निभाते हैं, तो उत्तरी अफगानिस्तान तालिबान के लिए लंबे समय की सुरक्षा चुनौती बन सकता है.
फिलहाल लड़ाई सत्ता बदलने की नहीं, बल्कि तालिबान की उस ‘अजेय’ छवि को चुनौती देने की है, जिस पर उसकी राजनीतिक पकड़ का एक हिस्सा टिका हुआ है.
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