मम्मी की वजह गणित से डर जाती हैं लड़कियां, ऋषि सुनक की संस्था के सर्वे का दावा; इससे पैदा होती है जेंडर इनइक्वालिटी

Math Anxiety in Girls due to their Mothers: गणित को कठिन मानने की उलझन आम है, लेकिन लड़कियों और लड़कों के बीच आत्मविश्वास का अंतर लंबे समय से चर्चा में रहा है. अब ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री ऋषि सुनक और अक्षता मूर्ति की शिक्षा चैरिटी के नए शोध से पता चला है कि माताओं की गणित संबंधी चिंता अनजाने में बेटियों तक पहुंचती है. ‘रिचमंड प्रोजेक्ट’ के सर्वे के मुताबिक, लड़कियां आठ साल की उम्र से ही गणित में खुद को कम सक्षम मानने लगती हैं, जिससे आगे चलकर लैंगिक असमानता गहराती है.

Math Anxiety in Girls due to their Mothers: गणित विषय की कठिनता को लेकर अक्सर लोगों में उलझन देखी जाती है. हालांकि लड़कियों और लड़कों के बीच आत्मविश्वास का अंतर अक्सर चर्चा का विषय रहा है. बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के 80% देशों में लड़कियां लड़कों की तुलना में गणित से अधिक डरती हैं. अब ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री ऋषि सुनक और उनकी पत्नी अक्षता मूर्ति द्वारा स्थापित एक शिक्षा चैरिटी के नए शोध ने इस बहस को एक नया आयाम दिया है. अध्ययन से संकेत मिलता है कि गणित को लेकर माताओं की चिंता अनजाने में बेटियों तक पहुंच जाती है, जो आगे चलकर लैंगिक असमानता का कारण बनती है.

‘द संडे टाइम्स’ ने ‘रिचमंड प्रोजेक्ट’ नामक इस सर्वे के नतीजे आधिकारिक रूप से जारी होने से पहले प्रकाशित किए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, लड़कियां आठ साल की उम्र से ही गणित में खुद को कम सक्षम मानने लगती हैं, जिसका असर उनके आत्मविश्वास और प्रदर्शन पर पड़ता है. सर्वे में सामने आया कि चार से आठ साल की उम्र के 51 प्रतिशत लड़कों को गणित “आसान” लगता है, जबकि लड़कियों में यह आंकड़ा सिर्फ 41 प्रतिशत रहा. उम्र बढ़ने के साथ यह अंतर और गहराता गया. नौ से 18 साल के 86 प्रतिशत लड़कों ने गणित में आत्मविश्वास जताया, जबकि लड़कियों में यह संख्या 63 प्रतिशत तक सिमट गई.

मां को घबराया हुआ देख, चिंता को अपना लेती है बेटी- अक्षता मूर्ति

अक्षता मूर्ति ने ‘द संडे टाइम्स’ से बातचीत में कहा कि सर्वे से पता चलता है कि महिलाएं, पुरुषों की तुलना में, बच्चों को गणित का होमवर्क कराने में ज्यादा असहज महसूस करती हैं. उन्होंने कहा, “यह चिंता महिलाओं में अपेक्षाकृत अधिक होती है. मैं यह नहीं कह रही कि पुरुषों में यह बिल्कुल नहीं होती, लेकिन महिलाओं में यह भावना ज्यादा पाई जाती है और यह पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती चली जाती है.” उन्होंने आगे कहा कि जब कोई छोटी बच्ची अपनी मां को गणित को लेकर घबराया हुआ देखती है, तो वह अनजाने में उसी चिंता को अपना लेती है. इसी वजह से यह चक्र लगातार चलता रहता है.

रिचमंड प्रोजेक्ट का उद्देश्य लोगों की जिंदगी बदलना

इंफोसिस के सह-संस्थापक नारायण मूर्ति और सुधा मूर्ति की बेटी अक्षता ने बताया कि उन्होंने कम उम्र से ही ‘स्टेम’ यानी विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित से जुड़े रोल मॉडल्स को महत्व दिया है. ‘रिचमंड प्रोजेक्ट’ के बारे में उन्होंने कहा कि हमारा उद्देश्य यह समझना है कि संख्या कौशल के जरिए लोगों की जिंदगी में कैसे सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है. हमारा पूरा मिशन यह है कि हम इसका इस्तेमाल करके लोगों की जिंदगी कैसे बदलें.

गणित को रोजमर्रा की जिंदगी से जोड़कर सिखाना चाहिए- अक्षता

इस परियोजना का नाम ऋषि सुनक के नॉर्थ यॉर्कशायर स्थित निर्वाचन क्षेत्र के नाम पर रखा गया है. अक्षता का मानना है कि गणित को एक अमूर्त विषय की बजाय रोजमर्रा की जिंदगी से जोड़कर, बेहद व्यावहारिक तरीके से सिखाया जाना चाहिए. उन्होंने बताया कि वे अपनी बेटियों कृष्णा और अनुष्का को इसी सोच के साथ बड़ा कर रही हैं. अक्षता मूर्ति ने कहा, “गणित समस्याओं का समाधान सिखाता है. हमारे परिवार को पहेलियां पसंद हैं. जब बेटियां छोटी थीं, तो हम जिगसॉ पहेलियां खेलते थे. अब वे बड़ी हो गई हैं, तो वर्डले से लेकर क्रॉसवर्ड तक हर तरह की पहेलियों में शामिल होती हैं.”

पीटीआई भाषा के इनपुट के साथ.

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