अमेरिकी एक्सपर्ट ने कहा- डिप्लोमेसी में नंबर वन बन रहे भारत के पास ग्लोबल साउथ की आवाज बनने का मौका! जानिए कैसे?

Brics Summit : नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन भारत के लिए कूटनीतिक क्षमता प्रदर्शित करने का एक महत्वपूर्ण अवसर है. यह बैठक भारत को ग्लोबल साउथ की चिंताओं को उठाने और ब्रिक्स को एक संतुलित मंच बनाने का मौका है.

आज (12 सितंबर) राजधानी नई दिल्ली में आयोजित होने वाला ब्रिक्स का 18वां शिखर सम्मेलन भारत के लिए सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय बैठक नहीं, बल्कि अपनी कूटनीतिक क्षमता दिखाने का बड़ा मौका है. दुनिया इस समय युद्ध, व्यापार तनाव, सप्लाई चेन की परेशानी और बदलते आर्थिक समीकरणों से जूझ रही है. ऐसे में भारत के सामने अवसर है कि वह ग्लोबल साउथ की चिंताओं को मजबूती से उठाए और ब्रिक्स को किसी एक देश या पश्चिम विरोधी मंच की दिशा में जाने से भी रोके.

ऐसे में अहम सवाल ये है दिल्ली में आयोजित 18 वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन भारत के लिए क्या अवसर है और क्या चुनौती है?

भारत के लिए क्यों अहम है 18 वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन?

  • दक्षिण एशिया मामलों के विशेषज्ञ माइकल कुगेलमैन के मुताबिक, इस पूरे समीकरण में आम सहमति बनाकर मजबूत संयुक्त बयान जारी करवाना भारत के लिए सबसे कठिन काम हो सकता है.
  • उनका मानना है कि मौजूदा वैश्विक अस्थिरता के बीच ब्रिक्स भारत को अपने वैश्विक नेतृत्व को मजबूत करने और ग्लोबल साउथ के साथ अपने जुड़ाव को और गहरा करने का महत्वपूर्ण अवसर देता है.
  • अगर नई दिल्ली अलग-अलग हितों वाले सदस्य देशों के बीच सहमति बनाने में सफल रहती है, तो यह उसकी संतुलित और प्रभावी कूटनीति की बड़ी मिसाल होगी.

ब्रिक्स का स्वरूप पिछले कुछ वर्षों में काफी बदल चुका है. पहले जहां यह कुछ उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह था, वहीं विस्तार के बाद इसमें पश्चिम एशिया और दूसरे क्षेत्रों के कई महत्वपूर्ण देश जुड़े हैं.

  • इसका एक मतलब ये भी है कि अब इस मंच पर हित जितने ज्यादा हैं, मतभेद की संभावना भी उतनी ही ज्यादा है. यही वजह है कि भारत की अध्यक्षता को केवल बैठक आयोजित करने के तौर पर नहीं देखा जा सकता और नई दिल्ली के सामने मौका है कि वह विकासशील देशों की आर्थिक और रणनीतिक चिंताओं को एक साझा एजेंडे में बदलने की कोशिश करें.

भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

  • ब्रिक्स में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती अलग-अलग हितों और सोच वाले देशों को एक साझा रुख पर लाना होगा. रूस, चीन और ईरान जैसे देशों का अमेरिका के प्रति रवैया भारत से काफी अलग है. वहीं, भारत के अमेरिका के साथ अपने रणनीतिक, रक्षा और व्यापारिक रिश्ते भी अहम बने हुए हैं.
  • ऐसे में किसी संयुक्त बयान में अमेरिका को लेकर तीखी भाषा पर सहमति बनाना भारत के लिए आसान नहीं होगा. नई दिल्ली की कोशिश यही रहेगी कि ब्रिक्स का एजेंडा किसी एक देश के विरोध तक सीमित न होकर विकास, व्यापार, आर्थिक सहयोग और ग्लोबल साउथ की प्राथमिकताओं पर केंद्रित रहे.
  • यानी भारत के सामने असली परीक्षा सिर्फ सम्मेलन को सफलतापूर्वक आयोजित करने की नहीं, बल्कि ऐसे साझा रुख पर सहमति बनाने की है जिसमें अलग-अलग देशों के हितों के बावजूद टकराव की जगह सहयोग का संदेश जाए.
  • भारत के लिए यहां अपनी पुरानी नीति काम आ सकती है कि सभी पक्षों से बातचीत बनाए रखना. नई दिल्ली के अमेरिका, रूस, ईरान और अरब देशों के साथ अलग-अलग स्तर पर संबंध हैं. यही संतुलित कूटनीति भारत को संवाद का रास्ता खुला रखने में मदद कर सकती है.

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ग्लोबल साउथ के लिए भारत क्या कर सकता है?

  • भारत लंबे समय से विकासशील देशों की आवाज को वैश्विक संस्थानों में मजबूत करने की बात करता रहा है. जी-20 की अध्यक्षता के दौरान अफ्रीकन यूनियन को स्थायी सदस्य के रूप में शामिल किए जाना भी इसी व्यापक प्रयास का हिस्सा है.
  • अब ब्रिक्स में भारत के सामने अगला अवसर है. विकासशील देशों के लिए आसान वित्त, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा, तकनीक तक पहुंच, डिजिटल सार्वजनिक ढांचा और बेहतर व्यापार व्यवस्था जैसे मुद्दों को प्राथमिकता दी जा सकती है.
  • भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर मॉडल भी यहां उपयोगी हो सकता है. यूपीआई जैसे डिजिटल भुगतान मॉडल और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म ने भारत को कम लागत वाले डिजिटल समाधान विकसित करने का अनुभव दिया है. जिसे वो अलग-अलग देशों में इन्हें लागू करवाने की कोशिश कर सकता है.
  • आज वैश्विक अर्थव्यवस्था की एक बड़ी समस्या सप्लाई चेन में बार-बार आने वाली रुकावट है. युद्ध, समुद्री सुरक्षा और व्यापार प्रतिबंधों ने एक देश को दूसरे पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए मजबूर किया है.
  • भारत इस संदर्भ में सुरक्षित और भरोसेमंद सप्लाई चेन की बात कर रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ब्रिक्स बिजनेस फोरम अपने भाषण में व्यापार के लिए सुरक्षित समुद्री मार्ग और खुले सप्लाई रूट की जरूरत पर जोर दिया था.
  • जानकारों का कहना है कि भारत की रणनीति केवल सामान बेचने तक सीमित नहीं है. नई दिल्ली खुद को एक भरोसेमंद मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई पार्टनर के रूप में स्थापित करना चाहती है. मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा जैसी पहल इसी व्यापक सोच का हिस्सा है, हालांकि भारत के सामने क्षेत्रीय सुरक्षा और भू-राजनीतिक चुनौतियां भी हैं.

क्या भारत ब्रिक्स को पश्चिम विरोधी मंच बनने से रोक पाएगा?

  • ब्रिक्स का विस्तार इस समूह को ज्यादा प्रभावशाली तो बनाता है, लेकिन इसके सदस्य देशों के बीच एक जैसी विदेश नीति नहीं है. सदस्य देशों के बीच आर्थिक हित, सुरक्षा और दूसरी अपनी प्राथमिकताएं होने के साथ-साथ अमेरिका के साथ रिश्ते अलग-अलग हैं.
  • इसलिए भारत के लिए सबसे व्यावहारिक रास्ता यही होगा कि वह टकराव की भाषा के बजाय सहयोग का एजेंडा आगे बढ़ाए. स्थानीय मुद्रा में व्यापार, न्यू डेवलपमेंट बैंक के जरिए विकास परियोजनाएं, तकनीकी सहयोग और ग्लोबल साउथ के लिए वित्तीय अवसर ऐसे मुद्दे हैं जिन पर अपेक्षाकृत ज्यादा सहमति बन सकती है.
  • माइकल कुगेलमैन का मानना है कि इस शिखर सम्मेलन की सफलता को आम सहमति के पैमाने पर परखा जा सकता है. अगर भारत रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया संकट और अमेरिका से जुड़े मतभेदों के बीच सभी सदस्यों को एक साझा घोषणा पर सहमत कर पाता है, तो यह उसकी कूटनीतिक क्षमता की बड़ी मिसाल होगी.
  • और भारत के लिए यह सफलता तब होगी जब वो अलग-अलग शक्तियों के बीच संवाद बनाए रखते हुए अपने हितों और ग्लोबल साउथ की प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाने में सफल रहता है. यह संतुलन अगर कामयाब होता है, तो 18 वां ब्रिक्स सम्मेलन भारत की वैश्विक नेतृत्व क्षमता के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हो सकता है.

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By गौतम कुमार

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