कैंसर मरीजों को राहत

अस्पतालों में भर्ती होने वाले लगभग 40 प्रतिशत कैंसर मरीज उधार लेकर, या संपत्तियां बेच कर या दोस्तों और रिश्तेदारों से आर्थिक मदद लेकर खर्च का इंतजाम करते हैं.

वस्तु एवं सेवा कर परिषद, यानी जीएसटी काउंसिल ने कैंसर और असाधारण बीमारियों की दवाओं को जीएसटी टैक्स के दायरे से बाहर रखने का फैसला किया है. इनमें विदेशों से आयात की जाने वाली कैंसर की दवा डाइनुटुक्सीमैब शामिल है, जिसकी कीमत 36 लाख रुपये बैठती है. इस पर 12 प्रतिशत का जीएसटी देना पड़ता था. इसके साथ ही परिषद ने दुर्लभ बीमारियों में मरीजों को दिये जाने वाले विशेष खाद्य उत्पादों को भी कर से राहत देने की सिफारिश की है. इन आयातित उत्पादों पर पांच से 12 प्रतिशत का जीएसटी देना पड़ता था. कैंसर और दुर्लभ बीमारियों के मरीजों के लिए यह एक राहत देेने वाला फैसला है.

कैंसर एक गंभीर बीमारी है. लेकिन, इसके इलाज पर आने वाला खर्च मरीज और उसके परिवार के लिए एक आर्थिक विपदा के समान होता है. इंटरनेट पर या अन्य स्थानों पर अक्सर ऐसे मार्मिक विज्ञापन दिख जाते हैं, जिनमें मासूम बच्चों के इलाज के लिए उनके माता-पिता गिड़गिड़ाते हुए मदद मांगते हैं. पिछले वर्ष स्वास्थ्य मामलों पर राज्य सभा की स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि अस्पतालों में भर्ती होने वाले लगभग 40 प्रतिशत कैंसर मरीज उधार लेकर, या संपत्तियां बेच कर या दोस्तों और रिश्तेदारों से आर्थिक मदद लेकर खर्च का इंतजाम करते हैं.

समिति का कहना था कि प्राइवेट अस्पतालों में सरकारी अस्पतालों की तुलना में तीन गुना ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ते हैं. खर्च का एक बड़ा हिस्सा महंगी दवाओं का होता है. रिपोर्टों में बताया जाता है कि एक कैंसर मरीज को दवाओं पर हर महीने लगभग 50 हजार से एक लाख रुपये तक खर्च करने पड़ जाते हैं. और, इनमें से कोई एक दवा पूरी जिंदगी खाती रहनी पड़ सकती है. कैंसर दवाओं के महंगे होने का मुद्दा सारी दुनिया के लिए चुनौती है. बड़ी दवा कंपनियों पर मुनाफाखोरी के आरोप भी लगते हैं. मगर उनकी दलील होती है कि दवाएं बनाने में अरबों डॉलर खर्च होते हैं. साथ ही, नयी दवाओं पर शोध जारी रखने के लिए भी पैसों की जरूरत होती है.

हालांकि, विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि शोध पर होने वाले खर्च का दवाओं की कीमतों पर बहुत मामूली या कोई भी असर नहीं पड़ता. संगठन का कहना था कि दवा कंपनियों की नजर केवल मुनाफे पर होती है और इस कारण मरीजों को चिकित्सा क्षेत्र की उपलब्धियों का पूरा लाभ नहीं मिल पाता. एक और मुद्दा पेटेंट का भी है, जिससे दवाओं के बाजार में एकाधिकार जैसी स्थिति बन जाती है. बहरहाल, कैंसर और दुर्लभ बीमारियों की दवाओं पर जीएसटी नहीं लगाने का फैसला सराहनीय है. समस्या के कारगर हल के लिए इन दवाओं के देश में ही उत्पादन के प्रयास होने चाहिए.

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