भारती एयरटेल के हालिया “प्रायोरिटी पोस्टपेड” प्लान को लेकर उठे विवाद के बीच टेलीकॉम रेगुलेटर ट्राई की शुरुआती जांच से कंपनी को राहत मिलती दिख रही है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, अब तक के प्रारंभिक आकलन में ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है कि एयरटेल का यह प्लान नेट न्यूट्रैलिटी यानी इंटरनेट निरपेक्षता के नियमों का उल्लंघन करता है. हालांकि मामला पूरी तरह बंद नहीं हुआ है और ट्राई अभी भी विस्तृत जांच के जरिए यह समझने की कोशिश कर रहा है कि कुछ ग्राहकों को प्राथमिकता देने वाली यह तकनीक बाकी उपभोक्ताओं की इंटरनेट क्वाॅलिटी पर असर डालती है या नहीं.
क्या है Airtel का Priority Postpaid प्लान?
एयरटेल ने हाल ही में अपने कुछ पोस्टपेड ग्राहकों के लिए “प्रायोरिटी पोस्टपेड” सेवा शुरू की है. कंपनी का दावा है कि इस प्लान के तहत भीड़भाड़ वाले इलाकों में भी ग्राहकों को ज्यादा स्थिर और बेहतर इंटरनेट स्पीड मिल सकती है. इसके लिए 5जी नेटवर्क स्लाइसिंग तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसमें नेटवर्क के भीतर अलग-अलग वर्चुअल हिस्से बनाकर विशेष जरूरतों के हिसाब से सेवाएं दी जाती हैं.
यही तकनीक चर्चा का विषय बनी क्योंकि कुछ विशेषज्ञों और प्रतिस्पर्धी कंपनियों ने सवाल उठाया कि क्या इससे अन्य ग्राहकों की इंटरनेट सेवा प्रभावित हो सकती है.
TRAI क्या जांच कर रहा है?
सूत्रों के अनुसार ट्राई ने एयरटेल से सेवा गुणवत्ता से जुड़े आंकड़े और तकनीकी स्पष्टीकरण मांगे हैं. नियामक यह जानना चाहता है कि नेटवर्क स्लाइसिंग के जरिए कुछ ग्राहकों को प्राथमिकता देने से बाकी 5जी यूजर्स के अनुभव में कोई गिरावट तो नहीं आती.
फिलहाल शुरुआती समीक्षा में कोई गंभीर समस्या सामने नहीं आई है. ट्राई का मानना है कि अभी तक उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह प्लान इंटरनेट पर समान व्यवहार के सिद्धांत के खिलाफ नहीं दिखता. फिर भी अंतिम निष्कर्ष विस्तृत तकनीकी जांच के बाद ही सामने आएगा.
Net Neutrality पर क्यों उठे सवाल?
नेट न्यूट्रैलिटी का मूल सिद्धांत यह कहता है कि इंटरनेट सेवा प्रदाता सभी यूजर्स और सभी ऑनलाइन सेवाओं के साथ समान व्यवहार करें. किसी विशेष ग्राहक, ऐप या सेवा को अनुचित लाभ नहीं मिलना चाहिए.
एयरटेल के नए प्लान के सामने आने के बाद कुछ पक्षों ने आशंका जताई कि यदि कुछ ग्राहकों को प्राथमिकता दी जाएगी तो सामान्य उपभोक्ताओं की इंटरनेट स्पीड या नेटवर्क क्वाॅलिटी प्रभावित हो सकती है. इसी वजह से यह मामला रेगुलेटरी जांच के दायरे में आया.
संसदीय समिति ने भी मांगा जवाब
संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़ी संसद की स्थायी समिति ने भी इस विषय को गंभीरता से लिया है. समिति ने मई में दूरसंचार विभाग और ट्राई से इस तरह की सेवाओं के प्रभाव पर जानकारी मांगी थी. समिति की चिंता यह है कि कहीं ऐसी योजनाएं करोड़ों प्रीपेड ग्राहकों के लिए उपलब्ध समान इंटरनेट सेवा के सिद्धांत को कमजोर न कर दें.
एयरटेल ने समिति के सामने अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि उसकी नई सेवा नेट न्यूट्रैलिटी का उल्लंघन नहीं करती और न ही अन्य ग्राहकों की सेवा गुणवत्ता को प्रभावित करती है.
Jio ने भी उठाए सवाल
इस मुद्दे पर रिलायंस जियो ने भी अपनी राय रखी है. कंपनी का कहना है कि ऐसी सेवाओं को बड़े स्तर पर लागू करने से पहले संबंधित प्राधिकरणों द्वारा नेट न्यूट्रैलिटी के सभी पहलुओं की गहन जांच की जानी चाहिए. जियो का मानना है कि भविष्य में इस तरह की तकनीकों के लिए स्पष्ट नियामकीय दिशा-निर्देश जरूरी होंगे.
फिलहाल ट्राई की शुरुआती रिपोर्ट एयरटेल के लिए सकारात्मक संकेत जरूर लेकर आई है, लेकिन अंतिम फैसला विस्तृत तकनीकी मूल्यांकन के बाद ही सामने आयेगा. आने वाले समय में यह मामला भारत में 5जी नेटवर्क प्रबंधन और नेट न्यूट्रैलिटी के भविष्य को भी प्रभावित कर सकता है.
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