बंगाल में दुर्गा पूजा के 400 करोड़ के सरकारी अनुदान पर संकट! शुभेंदु अधिकारी की एक घोषणा से सहमीं 44000 कमेटियां

West Bengal Durga Puja: पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी द्वारा धार्मिक अनुदान बंद करने के ऐलान के बाद दुर्गा पूजा कमेटियों में हड़कंप मच गया है. पिछले साल मिले 400 करोड़ रुपए के ग्रांट और सड़क पर पंडाल निर्माण की अनुमति पर अब भी सस्पेंस बरकरार है.

West Bengal Durga Puja: पश्चिम बंगाल की राजनीति और सत्ता परिवर्तन का सीधा असर अब राज्य के सबसे बड़े उत्सव दुर्गा पूजा (Durga Puja) पर भी पड़ता दिख रहा है. मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी द्वारा राज्य में धार्मिक आधार पर दिये जाने वाले सरकारी भत्तों और खैरात को पूरी तरह बंद करने की घोषणा के बाद, बंगाल की छोटी और मध्यम बजट वाली पूजा कमेटियों के होश उड़ गये हैं.

4 महीने बाद है बंगाल का सबसे बड़ा उत्सव

महज 4 महीने बाद होने वाले इस महा-उत्सव को लेकर कोलकाता सहित पूरे सूबे के पूजा आयोजक भारी अनिश्चितता और असमंजस के भंवर में फंसे हैं. उनको अब समझ नहीं आ रहा कि उन्हें इस साल सरकार की तरफ से वित्तीय मदद मिलेगी या नहीं.

अतिक्रम विरोधी अभियान से भी बढ़ी टेंशन

इसके अलावा, राज्य सरकार द्वारा हाल ही में चलाये गये अतिक्रमण विरोधी अभियानों और सड़कों पर नमाज पढ़ने पर लगायी गयी पाबंदियों के बाद, सड़कों और गलियों में बनने वाले पंडालों की अनुमति को लेकर भी पूजा कमेटियों में भारी खौफ और बेचैनी है.

इसे भी पढ़ें : दुर्गा पूजा में 32 हजार करोड़ रुपये से अधिक का होता है कारोबार

शुभेंदु सरकार का ‘नो रिलिजियस हैंडआउट फॉर्मूला’

ममता बनर्जी सरकार के दौरान वर्ष 2018 में पूजा कमेटियों को 10,000 रुपए की मामूली आर्थिक सहायता से शुरू हुआ यह सफर पिछले साल यानी वर्ष 2025 तक बढ़कर 1.1 लाख रुपए प्रति कमेटी तक पहुंच गया था. पूजा कमेटियों को इस ग्रांट पर सरकारी खजाने से 400 करोड़ से अधिक का भुगतान किया गया. बिजली बिल में 80 फीसदी की भारी छूट, फायर लाइसेंस फीस और केएमसी टैक्स माफी को जोड़कर बड़े पंडालों को करीब 2 लाख रुपए तक का अप्रत्यक्ष फायदा मिलता था.

बंगाल की खबरें पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

44,000 मोहल्ला पूजा पर सीधी मार

फोरम फॉर दुर्गोत्सव के उपाध्यक्ष साश्वत बोस ने इस गंभीर स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा- राज्य की कुल 45,000 सामुदायिक पूजा में से लगभग 44,000 कमेटियों का कुल बजट 10 लाख से कम होता है. इन छोटी कमेटियों के लिए सरकारी अनुदान उनके कुल बजट का 20 से 40 प्रतिशत तक होता है. अगर यह मदद रुकी, तो महंगाई के इस दौर में उनके लिए आयोजन करना असंभव हो जायेगा.

सड़कों पर पंडाल लगाने पर कड़े नियम का डर

आर्थिक संकट के साथ-साथ आयोजकों के सामने दूसरी सबसे बड़ी चुनौती पंडालों की भौगोलिक स्थिति को लेकर खड़ी हो गयी है. हाल ही में नयी सरकार ने राज्य भर में सड़कों को खाली कराने और सार्वजनिक स्थानों से अवैध अतिक्रमण हटाने की मुहिम शुरू की है. इसके साथ ही सड़कों पर शुक्रवार की नमाज रोके जाने के प्रशासनिक फैसले के बाद, पूजा आयोजक असमंजस में हैं कि क्या उन्हें सड़कों और संकरी गलियों में पंडाल बनाने की अनुमति मिलेगी.

इसे भी पढ़ें : दुर्गा पूजा से पहले बंगाल में 24,500 शिक्षकों को सरकारी नौकरी, 7,500 को मार्च तक मिलेगा नियुक्ति पत्र, ममता की बड़ी घोषणा

हाईकोर्ट की गाइडलाइंस का पालन

कलकत्ता हाईकोर्ट ने पहले ही कई बार सख्त निर्देश दिये हैं कि पूजा पंडालों के कारण आम जनता और यातायात को पूरी तरह ठप नहीं किया जा सकता. पुराने नियमों के मुताबिक, पंडाल के दोनों तरफ कम से कम 20 फीट की सड़क यातायात और आपातकालीन वाहनों (एम्बुलेंस और फायर ब्रिगेड) के लिए खाली छोड़नी अनिवार्य है. संकरी सड़कों पर दो-तिहाई हिस्सा खुला रखना होता है. आयोजकों को डर है कि इस बार पुलिस इन नियमों को लेकर कोई ढील नहीं देगी.

West Bengal Durga Puja: किससे गुहार लगाएं आयोजक?

दुर्गोत्सव के आयोजन को लेकर प्रशासनिक स्तर पर भी एक बड़ा शून्य पैदा हो गया है, जिसने आयोजकों की नींद उड़ा दी है. कोलकाता के एक मशहूर और भारी भीड़ खींचने वाले पूजा पंडाल के मुख्य आयोजक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि ममता बनर्जी के शासनकाल में केवल एक ही व्यक्ति (ममता) सारे फैसले लेती थीं. हम सीधे उनसे संपर्क कर लेते थे. नयी सरकार में अभी तक सूचना और सांस्कृतिक मामलों (Information & Cultural Affairs) के मंत्रियों को विभागों का औपचारिक बंटवारा नहीं हुआ है.

80,000 करोड़ की पूजा इकोनॉमी को लग सकता है झटका

फोरम फॉर दुर्गोत्सव के संस्थापक पार्थ घोष के मुताबिक, बंगाल में दुर्गा पूजा के आसपास का पूरा कारोबार लगभग 75,000 से 80,000 करोड़ रुपए का है. यह राज्य की कुल जीडीपी (GDP) का 5 प्रतिशत है. बड़े और कॉरपोरेट बजट वाले करीब 500 पूजा आयोजकों का कहना है कि वे तो बिना सरकारी मदद के भी स्पॉन्सरशिप के दम पर अपना बजट संभाल लेंगे, लेकिन छोटे क्लबों के बजट रुकने से पंडाल बनाने वाले मजदूरों, मूर्तिकारों (कुम्हारों), ढाकियों (ढोल बजाने वालों) और स्थानीय छोटे दुकानदारों की कमाई पर बहुत बुरा असर पड़ेगा.

इसे भी पढ़ें

Durga Puja 2020: पश्चिम बंगाल में मां दुर्गा का दर्शन करना मना है, हर पूजा पंडाल ‘कंटेंनमेंट जोन’, हाइकोर्ट का आदेश

कोरोना वायरस को बताया महिषासुर राक्षस, दुर्गा पूजा समितियों ने प्रवासी कामगारों की दिक्कतों को बनाया विषय

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

Published by: Mithilesh Jha

मिथिलेश झा PrabhatKhabar.com में पश्चिम बंगाल राज्य प्रमुख (State Head) के रूप में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार हैं. उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 30 वर्षों से अधिक का व्यापक अनुभव है. उनकी रिपोर्टिंग राजनीति, सामाजिक मुद्दों, जलवायु परिवर्तन, नवीकरणीय ऊर्जा, कृषि और अन्य समसामयिक विषयों पर केंद्रित रही है, जिससे वे क्षेत्रीय पत्रकारिता में एक विश्वसनीय और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित हुए हैं. अनुभव : पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार में 3 दशक से अधिक काम करने का अनुभव है. वर्तमान भूमिका : प्रभात खबर डिजिटल (prabhatkhabar.com) में पश्चिम बंगाल के स्टेट हेड की भूमिका में हैं. वे डिजिटल न्यूज कवर करते हैं. तथ्यात्मक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता को प्राथमिकता देते हैं. वर्तमान में बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 पर पूरी तरह से फोकस्ड हैं. भौगोलिक विशेषज्ञता : उनकी रिपोर्टिंग का मुख्य फोकस पश्चिम बंगाल रहा है, साथ ही उन्होंने झारखंड और छत्तीसगढ़ की भी लंबे समय तक ग्राउंड-लेवल रिपोर्टिंग की है, जो उनकी क्षेत्रीय समझ और अनुभव को दर्शाता है. मुख्य विशेषज्ञता (Core Beats) : उनकी पत्रकारिता निम्नलिखित महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्रों में गहरी विशेषज्ञता को दर्शाती है :- राज्य राजनीति और शासन : झारखंड और पश्चिम बंगाल की राज्य की राजनीति, सरकारी नीतियों, प्रशासनिक निर्णयों और राजनीतिक घटनाक्रमों पर निरंतर और विश्लेषणात्मक कवरेज. सामाजिक मुद्दे : आम जनता से जुड़े सामाजिक मुद्दों, जनकल्याण और जमीनी समस्याओं पर केंद्रित रिपोर्टिंग. जलवायु परिवर्तन और नवीकरणीय ऊर्जा : पर्यावरणीय चुनौतियों, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और रिन्यूएबल एनर्जी पहलों पर डेटा आधारित और फील्ड रिपोर्टिंग. डाटा स्टोरीज और ग्राउंड रिपोर्टिंग : डेटा आधारित खबरें और जमीनी रिपोर्टिंग उनकी पत्रकारिता की पहचान रही है. विश्वसनीयता का आधार (Credibility Signal) : तीन दशकों से अधिक की निरंतर रिपोर्टिंग, विशेष और दीर्घकालिक कवरेज का अनुभव तथा तथ्यपरक पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्धता ने मिथिलेश झा को पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत के लिए एक भरोसेमंद और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित किया है.

Read More

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >