दैनिक वेतनभोगी और कैजुअल कर्मचारियों को भी ग्रेच्युटी अधिनियम में शामिल करना होगा : हाइकोर्ट

पश्चिम बंगाल ग्रेच्युटी भुगतान नियम, 1973 के नियम 10 के तहत एक आवेदन दायर किया और अपनी 34 साल की निरंतर सेवा के लिए ग्रेच्युटी के रूप में 1.3 लाख रुपये का भुगतान करने के लिए कहा.

कोलकाता. कलकत्ता हाइकोर्ट की जस्टिस शम्पा दत्त (पॉल) की सिंगल जज बेंच ने मेदिनीपुर जिला सेवा-सह-विपणन एवं औद्योगिक सहकारी संघ लिमिटेड के एक पूर्व कर्मचारी को ग्रेच्युटी देने की अनुमति दे दी. न्यायालय ने माना कि संघ ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम, 1972 की धारा 1(3)(सी) के दायरे में आता है. न्यायालय ने माना कि 34 वर्ष की सेवा के बाद इन देय राशियों से इनकार करना अनुचित श्रम व्यवहार है. गौरतलब है कि रेजाउल हक नामक कर्मचारी मेदिनीपुर जिला सेवा-सह-विपणन एवं औद्योगिक सहकारी संघ लिमिटेड के साथ एक सामान्य सहायक और कैशियर के रूप में काम कर रहे थे. वे 1974 में शामिल हुए और 2009 में मैनेजर के पद से सेवानिवृत्त हुए. इसके बाद, उन्होंने पश्चिम बंगाल ग्रेच्युटी भुगतान नियम, 1973 के नियम 10 के तहत एक आवेदन दायर किया और अपनी 34 साल की निरंतर सेवा के लिए ग्रेच्युटी के रूप में 1.3 लाख रुपये का भुगतान करने के लिए कहा. नियंत्रण प्राधिकरण ने एक अनुकूल आदेश पारित किया और नियोक्ता को 2.1 लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया. संघ ने इस आदेश को चुनौती देते हुए कलकत्ता उच्च न्यायालय के समक्ष एक रिट याचिका दायर की, जिस पर सुनवाई करते हुए हाइकोर्ट ने कहा कि अधिनियम के दस्तावेजों को गलत साबित करने का भार नियोक्ता पर है, क्योंकि अधिकांश प्रासंगिक अभिलेख उनके पास हैं.

न्यायालय ने माना कि 34 वर्षों से अधिक समय तक सेवा करने वाले कर्मचारी को ग्रेच्युटी देने से इनकार करना अन्यायपूर्ण था. इस प्रकार, न्यायालय ने अपीलीय आदेश को बरकरार रखा और रिट याचिका को खारिज कर दिया.

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Published by: Ganesh mahto

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